प्राचीन भारत में समाज दो मुख्य रूपों में बँटा हुआ था - ग्रामीण जीवन और नगरीय जीवन। गाँवों में किसान, पशुपालक और कारीगर रहते थे, जबकि शहरों में राजा, व्यापारी, सैनिक, पुरोहित तथा विभिन्न प्रकार के कारीगर निवास करते थे। यह अध्याय हमें बताता है कि गाँवों और शहरों का जीवन कैसा था, करों की व्यवस्था कैसे चलती थी और व्यापार किस प्रकार होता था।
प्राचीन ग्रंथों और अभिलेखों से हमें पता चलता है कि उस काल में व्यापार अत्यधिक विकसित था। व्यापारी उत्तरापथ और दक्षिणापथ नामक मार्गों से होकर दूर-दराज के प्रदेशों से व्यापार करते थे। बंदरगाहों से विदेशी व्यापार भी होता था। पुहार (कावेरी का मुहाना) उस काल का प्रसिद्ध बंदरगाह था। इस अध्याय में हम इन सब पहलुओं का अध्ययन करेंगे।
प्राचीन गाँवों में किसान खेती करते थे और उन्हें फसल का एक हिस्सा राजा को कर के रूप में देना पड़ता था। तमिलनाडु के किसानों को 'करीबा' और 'रोय्यक' नामक कर देना पड़ता था। उत्तरी भारत में किसानों को 'भाग' और 'भोग' जैसे कर देने होते थे। कुछ गाँव ऐसे भी थे, जहाँ केवल कारीगर रहते थे, जैसे अढ़ाईकोट - जहाँ केवल बढ़ई रहते थे।
गाँवों में महिलाएँ भी खेती और पशुपालन के काम में सक्रिय भूमिका निभाती थीं। वे बीज बोने, खेतों की निराई करने और फसल काटने में सहायता करती थीं। किसान अपनी फसल से अधिशेष उपज को बाजार में बेचते थे। कुछ किसान ब्राह्मणों को भूमि दान देते थे। कई बार किसानों को उपज के अलावा व्यापारियों से ऋण भी लेना पड़ता था।
शहरों में राजाओं के महल, मंदिर, बाजार तथा विभिन्न प्रकार के कारीगरों की दुकानें होती थीं। कुछ नगर बहुत प्रसिद्ध थे - जैसे मथुरा, अहिच्छत्र, भृकुच्छ (बड़ौच) और कांधार। इन नगरों की सड़कें व्यापार से भरी रहती थीं और यहाँ विभिन्न भाषाओं के लोग मिलते थे। कुछ नगर सिक्के बनाने के लिए प्रसिद्ध थे, तो कुछ सुंदर वस्त्र और आभूषणों के लिए।
कुछ नगर धार्मिक केंद्र भी थे। मथुरा बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिंदू धर्म तीनों का महत्वपूर्ण केंद्र था। कुछ नगर तीर्थ स्थल थे, जहाँ लोग दर्शन के लिए आते थे। भारत में स्थित ऐसे नगरों के नाम हमें प्राचीन ग्रंथों से मिलते हैं। कौशांबी और पाटलिपुत्र भी बड़े नगर थे।
व्यापारी अपनी वस्तुओं को दूर-दूर के स्थानों पर बेचते थे। उन्हें बहुत सारी वस्तुओं की जानकारी होती थी। कुछ व्यापारी रेशम, मसाले और सुंदर कपड़ों का व्यापार करते थे। व्यापारियों के समूह को 'श्रेणी' कहा जाता था। श्रेणी के प्रमुख को 'श्रेष्ठी' कहा जाता था। श्रेणियाँ व्यापार के नियम निर्धारित करती थीं और राजाओं को कर देती थीं।
व्यापारी देश के भीतर और बाहर दोनों जगह व्यापार करते थे। रोमन साम्राज्य के साथ भी व्यापार होता था। भारतीय व्यापारी भारत से रेशम, कपास, मसाले और मोती ले जाते थे। बदले में वे सोना और चाँदी लाते थे। रोमन साम्राज्य से आने वाले सिक्कों को 'रोमन दिनारी' कहा जाता था, जिनमें चाँदी और सोना होता था।
भारत में व्यापार के दो प्रमुख मार्ग थे - उत्तरापथ और दक्षिणापथ। उत्तरापथ उत्तर भारत का व्यापार मार्ग था, जो तक्षशिला जैसे नगरों से होकर गुजरता था। दक्षिणापथ दक्षिण भारत का व्यापार मार्ग था। इन मार्गों पर व्यापारी अपने बैलगाड़ियों और ऊँटों के काफिलों से व्यापार करते थे। इन्हीं मार्गों से होकर धार्मिक विचार, कला और भाषाएँ भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचती थीं।
भारत के समुद्री तटों पर कई बंदरगाह थे, जिनसे विदेशी व्यापार होता था। इनमें सबसे प्रसिद्ध बंदरगाह था 'पुहार', जो कावेरी नदी के मुहाने पर स्थित था। पुहार एक प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र था। पुहार में विभिन्न देशों के व्यापारी और नाविक मिलते थे।
भारत के व्यापारी अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के पार देशों के साथ व्यापार करते थे। वे यमन, ओमान, फारस (ईरान), रोम और दक्षिण-पूर्व एशिया तक जाते थे। भारतीय सूती कपड़े, मसाले, हाथीदाँत और रेशम विदेशों में बहुत लोकप्रिय थे। बदले में भारत में सोना, चाँदी, घोड़े, शराब और काँच की वस्तुएँ आती थीं। भारत में मिले रोमन सिक्के इस व्यापार के प्रमाण हैं।
प्राचीन भारत में व्यापार के लिए मुद्राओं का उपयोग होता था। मौर्य काल में तांबे और चाँदी के सिक्के चलते थे। गुप्त काल में चाँदी और सोने के सिक्के बनाए गए। व्यापारी वस्तुओं की कीमत चुकाने के लिए सिक्कों का उपयोग करते थे। कुछ क्षेत्रों में लोग वस्तु विनिमय (बार्टर) भी करते थे, जिसमें एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु दी जाती थी।
| नगर | विशेषता |
|---|---|
| मथुरा | तीनों धर्मों का केंद्र |
| अहिच्छत्र | प्रमुख नगर |
| भृकुच्छ (बड़ौच) | बंदरगाह नगर |
| कांधार | व्यापारिक नगर |
| पुहार | कावेरी के मुहाने पर बंदरगाह |
| क्षेत्र | कर |
|---|---|
| तमिलनाडु | करीबा, रोय्यक |
| उत्तरी भारत | भाग, भोग |
| किसान | फसल का हिस्सा |
| व्यापारी | व्यापार कर |
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्रेणी | व्यापारियों का समूह |
| श्रेष्ठी | श्रेणी का प्रमुख |
| उत्तरापथ | उत्तर का व्यापार मार्ग |
| दक्षिणापथ | दक्षिण का व्यापार मार्ग |
| रोमन दिनारी | रोमन चाँदी/सोने के सिक्के |
यह अध्याय दर्शाता है कि प्राचीन भारत के गाँव, शहर और व्यापार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे। गाँवों के किसान अनाज उगाते थे, कारीगर सामान बनाते थे और व्यापारी उन्हें शहरों तक पहुँचाते थे। व्यापार मार्गों और बंदरगाहों ने भारत को विदेशों से जोड़ा। उत्तरापथ, दक्षिणापथ और पुहार जैसे बंदरगाहों से व्यापार फलता-फूलता था। यह अध्याय हमें बताता है कि आर्थिक गतिविधियों का विकास ही सभ्यता की प्रगति का आधार होता है और व्यापार केवल वस्तुओं का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि विचारों और संस्कृतियों के आदान-प्रदान का भी माध्यम था।