'आजीविका' का अर्थ है जीवन निर्वाह का साधन, यानी वह काम जिससे लोग अपना जीवन चलाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के आजीविका के साधन विविध होते हैं। कुछ लोग खेती करते हैं, कुछ मछली पकड़ते हैं, कुछ पशुपालन करते हैं और कुछ कुटीर उद्योग चलाते हैं। ग्रामीण जीवन मुख्यतः कृषि और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।
इस अध्याय में हम तमिलनाडु के कलपट्टु गाँव का उदाहरण लेकर ग्रामीण जीवन की विविधता को समझेंगे। वहाँ मछुआरे, किसान और पशुपालक रहते हैं। हम जानेंगे कि विभिन्न परिवार अपनी आजीविका कैसे कमाते हैं और उनके सामने कौन सी समस्याएँ होती हैं।
कलपट्टु तमिलनाडु के तट पर स्थित एक गाँव है, जहाँ के अधिकांश लोग मछली पकड़ने का काम करते हैं। श्रीरामलिंगम एक मछुआरा है, जो समुद्र में जाकर मछलियाँ पकड़ता है। वह अपनी लकड़ी की नाव और जालों से मछली पकड़ता है। मछली पकड़ने के लिए वह अपने परिवार के सदस्यों की मदद लेता है।
मछुआरों का जीवन कठिन होता है। वे सुबह जल्दी समुद्र में जाते हैं और कई घंटे मछली पकड़ते हैं। जब मछली कम मिलती है, तो उन्हें कम आय होती है। मछुआरे मछली को बाजार में बेचते हैं, लेकिन कई बार मछली बिकती नहीं है और बची हुई मछली खराब हो जाती है। बड़ी नावों वाले मछुआरों को अधिक आय होती है, क्योंकि वे अधिक मछलियाँ पकड़ सकते हैं।
कलपट्टु में थम्बी नाम का एक युवक रहता है, जिसके पास अपनी ज़मीन नहीं है। वह दूसरों की ज़मीन पर मज़दूर के रूप में काम करता है। ऐसे किसान, जिनके पास अपनी ज़मीन नहीं होती और दूसरों के खेतों में काम करते हैं, 'भूमिहीन मज़दूर' कहलाते हैं।
भूमिहीन मज़दूरों की आय निश्चित नहीं होती। वे केवल उन दिनों में काम करते हैं जब खेतों में काम होता है। फसल बोने और काटने के समय उन्हें काम मिलता है, लेकिन बाकी समय वे बेरोज़गार रहते हैं। थम्बी जैसे भूमिहीन मज़दूरों की आय बहुत कम होती है और उन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण करने में कठिनाई होती है। महिलाएँ भी खेतों में मज़दूरी करती हैं, लेकिन उन्हें पुरुषों से कम मज़दूरी मिलती है।
कलपट्टु गाँव में सुक़िया नाम की महिला रहती है, जो अपने घर पर ही कुटीर उद्योग चलाती है। वह चक्की चलाकर अनाज पीसती है और आटा बनाकर बेचती है। ऐसे छोटे उद्योग, जो घर पर ही परिवार के सदस्यों द्वारा चलाए जाते हैं, 'कुटीर उद्योग' कहलाते हैं।
सुक़िया की आय उसके ग्राहकों पर निर्भर करती है। कई बार उसे अधिक काम मिलता है, तो कई बार कम। कुटीर उद्योगों में काम करने वालों की आय स्थिर नहीं होती। फिर भी, ऐसे उद्योग ग्रामीण महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनसे वे अपने परिवार की आय में योगदान दे सकती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन है। कई परिवार गाय, भैंस, बकरी और मुर्गी पालते हैं। गायों और भैंसों का दूध बेचकर वे अपनी आय अर्जित करते हैं। कुछ लोग दूध को सहकारी समितियों में बेचते हैं, जबकि कुछ सीधे गाँव में बेचते हैं।
पशुपालन का लाभ यह है कि यह पूरे वर्ष आय देता है, जबकि खेती से आय केवल फसल के समय मिलती है। पशुओं से दूध, खाद और यहाँ तक कि बैलगाड़ी (परिवहन के लिए) भी मिलती है। इसलिए कई ग्रामीण परिवार खेती के साथ-साथ पशुपालन भी करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका से जुड़ी अनेक समस्याएँ हैं:
इन समस्याओं के समाधान के लिए सरकार किसानों को ऋण, सिंचाई सुविधाएँ, बीमा और उचित मूल्य की व्यवस्था करती है।
| साधन | व्यक्ति/समूह | विवरण |
|---|---|---|
| मछली पकड़ना | मछुआरे (श्रीरामलिंगम) | समुद्र में मछली पकड़ना |
| खेती | किसान (थम्बी) | फसलें उगाना |
| कुटीर उद्योग | सुक़िया | घर पर चक्की चलाना |
| पशुपालन | पशुपालक | दूध और पशु उत्पाद |
| समस्या | विवरण |
|---|---|
| मौसम निर्भरता | वर्षा न होने पर फसल खराब |
| भूमिहीनता | अपनी ज़मीन नहीं होना |
| बेरोज़गारी | मौसमी काम में कमी |
| कम आय | अनिश्चित और कम आय |
| नाम | कार्य |
|---|---|
| श्रीरामलिंगम | मछुआरा |
| थम्बी | भूमिहीन किसान (मज़दूर) |
| सुक़िया | कुटीर उद्योग (चक्की) |
ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका विविध और जटिल है। मछुआरे, किसान, पशुपालक और कुटीर उद्योग चलाने वाले - सभी अपनी-अपनी मेहनत से जीवन चलाते हैं। कलपट्टु गाँव का उदाहरण दिखाता है कि लोग प्राकृतिक संसाधनों पर किस प्रकार निर्भर हैं। भूमिहीनता, मौसम, बेरोज़गारी और कम आय जैसी समस्याएँ ग्रामीण जीवन को कठिन बनाती हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए सरकार और समाज दोनों को प्रयास करने होंगे। ग्रामीण आजीविका का सम्मान करना और उसमें सुधार करना हमारे देश की प्रगति के लिए आवश्यक है।