यह अध्याय हमें प्राचीन भारत की कला और ज्ञान की समृद्ध विरासत के बारे में बताता है। प्राचीन भारतीयों ने अद्भुत इमारतें (जैसे स्तूप और मंदिर), सुंदर चित्र (जैसे अजंता की गुफाओं के चित्र) और महान पुस्तकें (जैसे संस्कृत साहित्य और तमिल संगम कविताएँ) हमें दीं। इन सबके अध्ययन से हमें उस युग के कौशल, विश्वास और विचारों के बारे में जानकारी मिलती है।
इमारतों, चित्रों और पुस्तकों का निर्माण केवल कला नहीं था, बल्कि यह समाज की मान्यताओं और तकनीकी ज्ञान का प्रतिबिंब था। स्तूप धार्मिक स्मारक थे, मंदिर पूजा के स्थान थे और पुस्तकें ज्ञान का भंडार। इस अध्याय में हम इन तीनों क्षेत्रों की प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन करेंगे।
'स्तूप' का अर्थ है 'टीला' या 'गोलाकार स्मारक'। स्तूप बौद्ध धर्म से जुड़े प्राचीन स्मारक हैं, जिनमें बुद्ध के या उनके महत्वपूर्ण अनुयायियों के अवशेष रखे जाते थे। सबसे प्रसिद्ध स्तूप सांची (मध्य प्रदेश) में स्थित है। सांची का स्तूप बहुत बड़ा है और इसके चारों ओर सुंदर नक्काशीदार द्वार हैं।
स्तूप बनाने की प्रथा अशोक के समय से शुरू हुई। अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को रखने के लिए कई स्तूप बनवाए। बाद में अन्य बौद्ध शासकों और अमीर व्यापारियों ने भी स्तूप बनवाए। स्तूप के शीर्ष पर एक छत्री (छतरी) होती थी। स्तूप बनाने में ईंटों और पत्थरों का उपयोग होता था। सांची के स्तूप के चारों ओर बनी 'तोरण' (प्रवेश द्वार) अपनी सुंदर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं।
आंध्र प्रदेश के अमरावती में भी एक प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप है। अमरावती का स्तूप अपनी सुंदर पत्थर की नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। इस स्तूप की दीवारों पर बुद्ध के जीवन से जुड़े दृश्य उकेरे गए हैं। इन नक्काशियों से हमें बौद्ध धर्म के प्रसार और उस युग की कला के बारे में जानकारी मिलती है।
प्राचीन भारत में मंदिरों का निर्माण भी बड़े पैमाने पर हुआ। मंदिर पूजा के स्थान थे। कुछ मंदिर चट्टानों को काटकर बनाए गए, तो कुछ ईंटों और पत्थरों से। महाबलीपुरम के मंदिर चट्टानों को काटकर बनाए गए हैं, जो अपनी मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध हैं। सबसे प्राचीन मंदिर मिट्टी और ईंटों से बनाए जाते थे, जैसे भितरगाँव का मंदिर (उत्तर प्रदेश)।
मंदिर निर्माण का कार्य विशेषज्ञों द्वारा किया जाता था। इन विशेषज्ञों को 'सिल्पकार' (वास्तुकार) कहा जाता था। वे मंदिरों की योजना बनाते थे और विभिन्न प्रकार की इमारतों का निर्माण करते थे। मंदिर बनाने की कला के ज्ञान से हमें पता चलता है कि उस समय के लोगों के पास उन्नत गणित, ज्यामिति और निर्माण तकनीक का ज्ञान था।
प्राचीन इमारतें विभिन्न सामग्रियों से बनाई जाती थीं। कुछ इमारतें ईंटों से, कुछ पत्थरों से और कुछ लकड़ी से बनाई जाती थीं। स्तूप और मंदिर प्रायः पत्थरों से बनाए जाते थे। ईंटों का उपयोग भी प्रचलित था। भितरगाँव का मंदिर ईंटों से बना है।
इमारतों में मूर्तियाँ भी स्थापित की जाती थीं। बुद्ध की मूर्तियाँ और विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाई जाती थीं। कुछ मूर्तियाँ बहुत बड़ी होती थीं, जैसे करली की गुफा में स्थित बुद्ध की विशाल मूर्ति। इमारतों की दीवारों पर नक्काशी (carving) और चित्र भी बनाए जाते थे।
चित्रकला का सबसे सुंदर उदाहरण अजंता की गुफाओं (महाराष्ट्र) में मिलता है। अजंता की गुफाएँ चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं। इन गुफाओं की दीवारों पर बने चित्र विश्व प्रसिद्ध हैं। ये चित्र बौद्ध धर्म से जुड़े हैं और इनमें बुद्ध के जीवन के दृश्य तथा जातक कथाओं के प्रसंग दर्शाए गए हैं।
अजंता के चित्र अत्यंत रंगीन और जीवंत हैं। इनमें जानवरों, पौधों, लोगों और महलों के चित्र हैं। चित्रों में गहरे रंगों का उपयोग किया गया है। चित्रकारों ने रंग भरने से पहले दीवार पर चूने की परत चढ़ाई, जिसे 'प्राइमर' कहते हैं। फिर उस पर रंग लगाए गए। ये चित्र बताते हैं कि उस युग के चित्रकार कितने कुशल थे।
अजंता के चित्रों में पहले रेखाएँ खींची जाती थीं, फिर रंग भरे जाते थे। रंग बनाने के लिए खनिज पदार्थों का उपयोग होता था। गहरे रंगों का विशेष उपयोग होता था। चित्रों में प्राकृतिक दृश्यों और मानवीय भावनाओं को बड़ी बारीकी से दर्शाया गया है। ये चित्र आज भी सुरक्षित हैं, जो उस युग की उन्नत चित्रकला का प्रमाण हैं।
प्राचीन भारत में पुस्तकों का लेखन संस्कृत, तमिल, प्राकृत और पालि भाषाओं में हुआ। संस्कृत में सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ महाभारत और रामायण हैं। महाभारत विश्व की सबसे लंबी कविताओं में से एक है, जिसे व्यास ने रचा। रामायण की रचना वाल्मीकि ने की। इनके अलावा मनुस्मृति जैसे ग्रंथ भी लिखे गए।
दक्षिण भारत में तमिल कवियों ने संगम साहित्य की रचना की। इसके अलावा 'थिरुक्कुरल' नामक तमिल ग्रंथ भी लिखा गया, जिसमें जीवन के आदर्शों का वर्णन है। प्राचीन पुस्तकों के लेखन के लिए ताड़पत्र और भोजपत्र का उपयोग होता था। ज्ञान को संरक्षित करने के लिए इन पांडुलिपियों को मंदिरों और मठों में सुरक्षित रखा जाता था।
प्राचीन भारत में 'ब्राह्मी' लिपि का उपयोग होता था। धीरे-धीरे ब्राह्मी लिपि से देवनागरी लिपि का विकास हुआ, जिसका उपयोग आज हिंदी, संस्कृत आदि भाषाओं में होता है। गुप्त काल में लेखन कला और साहित्य का विशेष विकास हुआ। कालिदास जैसे महान कवियों ने गुप्त काल में अपनी रचनाएँ लिखीं।
| स्मारक | प्रकार | स्थान |
|---|---|---|
| सांची का स्तूप | बौद्ध स्तूप | मध्य प्रदेश |
| अमरावती का स्तूप | बौद्ध स्तूप | आंध्र प्रदेश |
| महाबलीपुरम के मंदिर | चट्टानी मंदिर | तमिलनाडु |
| भितरगाँव का मंदिर | ईंटों का मंदिर | उत्तर प्रदेश |
| अजंता की गुफाएँ | चित्रों वाली गुफाएँ | महाराष्ट्र |
| रचना | भाषा | लेखक/रचयिता |
|---|---|---|
| महाभारत | संस्कृत | व्यास |
| रामायण | संस्कृत | वाल्मीकि |
| थिरुक्कुरल | तमिल | तिरुवल्लुवर |
| संगम साहित्य | तमिल | तमिल कवि |
| कला | उदाहरण |
|---|---|
| मूर्तिकला | बुद्ध की विशाल मूर्ति (करली) |
| चित्रकला | अजंता की गुफाओं के चित्र |
| वास्तुकला | स्तूप, मंदिर |
| लेखन कला | ताड़पत्र पर पांडुलिपियाँ |
इमारतें, चित्र और किताबें प्राचीन भारतीय समाज की आत्मा का प्रतिबिंब हैं। सांची और अमरावती के स्तूप बौद्ध धर्म के प्रसार को दर्शाते हैं, महाबलीपुरम और भितरगाँव के मंदिर वास्तुकला की उन्नति को, और अजंता के चित्र चित्रकला की सुंदरता को। महाभारत, रामायण, संगम साहित्य और थिरुक्कुरल जैसी रचनाएँ ज्ञान का अमूल्य भंडार हैं। यह अध्याय हमें बताता है कि कला और ज्ञान किसी भी सभ्यता की सबसे स्थायी धरोहर होते हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते रहते हैं।