इतिहास को समझने के लिए हमें साहित्यिक स्रोतों (किताबें) और पुरातात्विक स्रोतों (कब्रें) दोनों का अध्ययन करना होता है। यह अध्याय हमें बताता है कि सबसे प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद हमें उस समय के समाज, परिवार, भाषा और विचारों के बारे में क्या बताती है, तथा दक्षिण भारत की बड़े पत्थरों से बनी कब्रें (मेगालिथ) उस युग के लोगों की मान्यताओं और जीवन की क्या जानकारी देती हैं।
ऋग्वेद विश्व की सबसे प्राचीन पुस्तकों में से एक है, जिसकी रचना लगभग 3,500 वर्ष पूर्व हुई। यह संस्कृत भाषा में लिखा गया है। दूसरी ओर, दक्षिण भारत में मिले कब्रिस्तानों और विशाल पत्थरों के स्मारक हमें मृतकों को दफनाने की प्रथा और उस युग के लोगों की सामाजिक स्थिति के बारे में बताते हैं। इन दोनों स्रोतों को मिलाकर हम अतीत की एक समृद्ध तस्वीर प्राप्त करते हैं।
'ऋग्वेद' शब्द दो भागों से बना है - 'ऋक' का अर्थ है 'स्तुति या प्रशंसा' और 'वेद' का अर्थ है 'ज्ञान'। ऋग्वेद में देवताओं की स्तुति के मंत्र (सूक्त) संग्रहीत हैं। इसमें लगभग 1,028 सूक्त हैं, जो दस 'मंडलों' में बँटे हुए हैं। यह मौखिक परंपरा से पीढ़ी-दर-पीढ़ी पढ़ा और सुनाया जाता रहा, इसीलिए इसे 'श्रुति' कहा जाता है।
ऋग्वेद की रचना सिंधु तथा उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र (वर्तमान अफगानिस्तान और पाकिस्तान) में हुई थी। ऋग्वेद के तीन महत्वपूर्ण भाग होते हैं - छंद (पद्य), मंत्र और अनुवाक। वेदों की रचना करने वाले विद्वानों को 'ऋषि' कहा जाता था। ऋग्वेद को याद करने और सुनाने के लिए छात्र गुरुकुलों में शिक्षा ग्रहण करते थे।
ऋग्वेद से हमें उस युग के समाज के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। उस समय के समाज में चार समूह थे - ब्राह्मण (धार्मिक अनुष्ठान करने वाले), क्षत्रिय (योद्धा और शासक), वैश्य (किसान, पशुपालक और व्यापारी) तथा शूद्र (सेवा करने वाले)। ये सभी समूह 'वर्ण' कहलाते थे। हालाँकि, बच्चे का वर्ण जन्म के आधार पर निर्धारित होना निश्चित नहीं था।
ऋग्वेद में राजाओं का चुनाव सभा (समिति) द्वारा किया जाता था। राजा का प्रमुख कार्य युद्ध में लोगों की रक्षा करना था। वैदिक लोग गाय, बैल, घोड़ा, बकरी जैसे पशुओं को महत्व देते थे। गाय को 'घीवाली' कहा जाता था। युद्धों में राजा के नेतृत्व में सेनाएँ लड़ती थीं और विजित पशुओं तथा वस्तुओं का बँटवारा होता था।
ऋग्वेद में 'कुल' शब्द का अर्थ है परिवार। जो लोग एक साथ रहते थे और एक ही गोत्र के थे, वे एक कुल में रहते थे। 'गोत्र' का अर्थ है एक ही पुरखे (पूर्वज) से उत्पन्न समूह। ऋग्वेद के समय में अंतर्विवाह (एक ही गोत्र के भीतर विवाह) वर्जित माना जाता था। लोग अपने गोत्र के बाहर विवाह करते थे।
परिवार में महिलाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। कुछ महिलाएँ ऋषि (विद्वान) बनकर सूक्तों की रचना करती थीं। इनमें विश्ववारा, घोष, लोपामुद्रा, काकी और इतरा का उल्लेख मिलता है। पुत्रियाँ यज्ञ में भाग ले सकती थीं। यह दर्शाता है कि वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा और धार्मिक अधिकार प्राप्त थे।
ऋग्वेद की एक कथा हमें बताती है कि इतरा नाम की एक महिला एक गरीब घर से थी। जब इतरा के पुत्र के जन्म के बाद उसके पति ने उसे और उसके बेटे को घर से बाहर कर दिया, तब इतरा ने अपने बेटे की सहायता की। बाद में वह बेटा एक महान विद्वान (ऋषि) बना। यह कथा दर्शाती है कि विद्वान बनने के लिए जन्म से अधिक प्रयास और अवसर महत्वपूर्ण होते थे।
दक्षिण भारत में लौह युग के काल में लोग अपने मृतकों को बड़े पत्थरों के स्मारकों के नीचे दफनाते थे। इन बड़े पत्थरों से बने स्मारकों को 'मेगालिथ' कहते हैं। 'मेगा' का अर्थ है 'बड़ा' और 'लिथ' का अर्थ है 'पत्थर'। मेगालिथ कई प्रकार के होते हैं - कुछ मकान के समान होते हैं, कुछ बड़े पत्थरों को खड़ा करके बनाए जाते हैं, और कुछ पत्थरों की अंगूठी के रूप में होते हैं।
दक्षिण भारत के आदिचनल्लूर (तमिलनाडु) स्थल में मेगालिथ के कई कब्रिस्तान मिले हैं, जहाँ लगभग 100 कब्रें हैं। इसके अलावा मेहरगढ़ (पश्चिमी एशिया की सीमा पर), ब्रह्मगिरि (कर्नाटक) और इनामगाँव (दक्षिण महाराष्ट्र) जैसे स्थलों पर भी कब्रें मिली हैं। दक्षिण भारत के ये मेगालिथिक कब्रिस्तान विश्व की सबसे पुरानी कब्रगाहों में से हैं।
कब्रों की खुदाई में मिलने वाली वस्तुओं से हमें मृतक के जीवन की जानकारी मिलती है। कब्रों में मिट्टी के बर्तन, लोहे के औज़ार, काँसे के दर्पण, मोती तथा ताबीज मिले हैं। यदि किसी कब्र में अधिक वस्तुएँ मिलती हैं, तो अनुमान लगाया जाता है कि मृतक धनी या प्रतिष्ठित व्यक्ति था। इस प्रकार कब्रें हमें उस युग के सामाजिक भेदभाव और संपदा के वितरण के बारे में बताती हैं।
ब्रह्मगिरि (कर्नाटक) की कब्रों में सोने की वस्तुएँ मिली हैं, जबकि इनामगाँव (दक्षिण महाराष्ट्र) में कब्रें बनाने की प्रथा में परिवर्तन देखने को मिलता है। आदिचनल्लूर में कई कब्रों में एक साथ मृतकों को दफनाने के प्रमाण हैं। दक्षिण भारत के ये कब्रिस्तान हमें मृत्यु से जुड़ी मान्यताओं और समाज के स्तरीकरण की जानकारी देते हैं।
| वर्ण | मुख्य कार्य |
|---|---|
| ब्राह्मण | धार्मिक अनुष्ठान करना, वेदों का अध्ययन |
| क्षत्रिय | युद्ध करना, राज्य की रक्षा |
| वैश्य | कृषि, पशुपालन और व्यापार |
| शूद्र | सेवा करना |
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| भाषा | प्राचीन संस्कृत |
| सूक्तों की संख्या | लगभग 1,028 |
| मंडलों की संख्या | 10 |
| रचना क्षेत्र | सिंधु और सहायक नदियों का क्षेत्र |
| रचना काल | लगभग 3,500 वर्ष पूर्व |
| स्थल | क्षेत्र |
|---|---|
| आदिचनल्लूर | तमिलनाडु |
| ब्रह्मगिरि | कर्नाटक |
| इनामगाँव | दक्षिण महाराष्ट्र |
| मेहरगढ़ | पाकिस्तान (बलूचिस्तान) |
किताबें और कब्रें अतीत के दो अलग-अलग पहलू उजागर करती हैं। ऋग्वेद हमें भाषा, समाज, वर्ण व्यवस्था, परिवार और महिलाओं की स्थिति के बारे में बताता है, जबकि मेगालिथिक कब्रें दक्षिण भारत के लौह युग के लोगों की मान्यताओं, सामाजिक स्तरीकरण और भौतिक संपदा की जानकारी देती हैं। इन स्रोतों का अध्ययन करके हम समझ सकते हैं कि प्राचीन समाज अपनी विश्वासों और संस्कृति के साथ कितना समृद्ध था। यह अध्याय इतिहासकारों की उस पद्धति को सिखाता है जिसमें विभिन्न स्रोतों को मिलाकर अतीत का पुनर्निर्माण किया जाता है।