इतिहास का अर्थ है 'घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन'। यह हमें बताता है कि हमारे पूर्वज कैसे रहते थे, वे क्या खाते थे, किस-किस चीज का उपयोग करते थे तथा समय के साथ उनके जीवन में किस प्रकार परिवर्तन आया। यह अध्याय इतिहास के अध्ययन की मूल पद्धति पर केंद्रित है, अर्थात हम अतीत के बारे में 'क्या, कब, कहाँ और कैसे' जानते हैं।
इतिहासकार उन वस्तुओं का अध्ययन करते हैं जो लोगों ने सैकड़ों और हजारों वर्ष पूर्व बनाई या उपयोग में लाईं। इन्हें 'पुरावशेष' या 'अवशेष' कहते हैं। इसके अलावा उन लिखित दस्तावेजों का भी अध्ययन किया जाता है जिन्हें 'अभिलेख', 'पांडुलिपियाँ' या 'साहित्यिक स्रोत' कहते हैं। इन सबकी सहायता से ही इतिहासकार अतीत की पहेली को सुलझाते हैं।
अतीत के बारे में जानने के लिए इतिहासकार मुख्यतः दो प्रकार के स्रोतों पर निर्भर करते हैं, अर्थात् भौतिक स्रोत (पुरातात्विक स्रोत) और लिखित स्रोत (साहित्यिक स्रोत)। भौतिक स्रोतों में प्राचीन सिक्के, बर्तन, औजार, मकानों के अवशेष, आभूषण तथा अन्य वस्तुएँ शामिल हैं। लिखित स्रोतों में पत्थर की शिलाओं पर खुदे अभिलेख, ताड़पत्र और भोजपत्र पर लिखी पांडुलिपियाँ, तथा किताबें शामिल हैं।
'पुरातत्व' वह विज्ञान है जिसके द्वारा पुरानी वस्तुओं की खुदाई करके उनका अध्ययन किया जाता है। जब पुरातत्वविद् खुदाई करते हैं, तो उन्हें मिट्टी के बर्तन, ईंटें, हड्डियाँ, अनाज के दाने तथा अन्य वस्तुएँ मिलती हैं। इन वस्तुओं की सहायता से हम समझ सकते हैं कि लोग किस प्रकार का भोजन करते थे, वे किन जानवरों का पालन करते थे, उनके व्यापार कैसे होते थे और उनकी कलात्मक समझ कैसी थी।
वैज्ञानिकों ने पुरानी वस्तुओं की आयु जानने के लिए विशेष तरीके खोजे हैं। इनमें से एक प्रसिद्ध विधि 'रेडियोकार्बन (कार्बन-14) डेटिंग' है, जिसके द्वारा जैविक पदार्थों, जैसे हड्डी, लकड़ी, कोयला आदि की आयु ज्ञात की जाती है। कार्बन-14 की मात्रा जीवन काल में स्थिर रहती है, परंतु जीव की मृत्यु के बाद यह निश्चित दर से घटने लगती है। इस घटी हुई मात्रा को मापकर वैज्ञानिक वस्तु की उम्र का अनुमान लगाते हैं।
'इतिहास' शब्द का शाब्दिक अर्थ है - 'ऐसा ही हुआ था' (इति + ह + आस = इतिहास)। संस्कृत में इसे 'इतिहास' और कुछ अन्य भाषाओं में 'हिस्ट्री' कहा जाता है। पुराने जमाने में लोग अपने अनुभव और ज्ञान को मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सुनाते थे। इस प्रकार की परंपरा को 'मौखिक परंपरा' कहते हैं। वेद, उपनिषद, पुराण, महाकाव्य (रामायण और महाभारत) तथा स्मृतियाँ प्राचीन साहित्यिक स्रोत हैं।
आरंभ में लोगों ने नदियों के किनारे बस्तियाँ बसाईं। जब कृषि और पशुपालन का विकास हुआ, तो लोगों का जीवन स्थायी होने लगा और बड़े-बड़े क्षेत्र बनने लगे। इन क्षेत्रों को 'जनपद' कहा जाने लगा। गंगा की घाटी में अनेक जनपद विकसित हुए। जनपद शब्द का अर्थ है वह क्षेत्र जहाँ लोग अपनी जड़ें जमाकर बस गए हों।
प्राचीन काल में लोग उन जगहों के पास बसते थे जहाँ पानी, जंगल और उपजाऊ भूमि उपलब्ध थी। नदी के किनारे, तालाबों और कुओं के पास तथा जंगल के समीप बस्तियाँ बसती थीं। उदाहरण के लिए, सिंधु घाटी सभ्यता के नगर सिंधु नदी के किनारे बसे थे। प्राचीन लोग खाने के लिए शिकार करते थे, फल-फूल तथा जड़ें बीनते थे। बाद में उन्होंने अनाज उगाना और पशुओं को पालना सीखा। वे गेहूँ, चावल, जौ, मटर, दालें तथा मांस-मछली भी खाते थे। पेय पदार्थों में दूध और उससे बने पदार्थ प्रमुख थे।
ईसा पूर्व लगभग छठी शताब्दी के आसपास मध्य गंगा की घाटी में लोगों का जीवन तेजी से बदलने लगा। यहाँ चावल की खेती और लोहे के औज़ारों के उपयोग से उत्पादन बढ़ा। गाँवों से बड़े-बड़े नगर उभरने लगे। राजाओं ने कर वसूलना शुरू किया और सेनाएँ रखने लगे। जो जनपद शक्तिशाली होते गए, वे 'महाजनपद' बन गए। पाटलिपुत्र, कौशाम्बी, राजगृह आदि इसी काल के प्रमुख नगर थे। इन क्षेत्रों की खुदाई से मिले अवशेष बताते हैं कि वहाँ कुम्हार, लोहार, बढ़ई आदि अनेक प्रकार के कारीगर रहते थे।
अभिलेख वे शिलालेख हैं जो पत्थर, धातु या ईंट की पट्टियों पर खुदे होते हैं। ये राजाओं, शासकों तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा अपनी उपलब्धियाँ, आदेश या दान-पुण्य की जानकारी देने के लिए लिखवाए जाते थे। सबसे प्रसिद्ध अभिलेख अशोक के हैं, जो चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के हैं। अभिलेखों को पढ़ने के लिए वैज्ञानिकों को 'ब्राह्मी' और 'खरोष्ठी' जैसी प्राचीन लिपियों को समझना पड़ा। इनमें ब्राह्मी लिपि को जेम्स प्रिंसेप नामक विद्वान ने पढ़ा, जिससे अशोक के अभिलेखों को समझना संभव हुआ।
पांडुलिपियाँ हाथ से लिखी गई पुस्तकें होती हैं, जो प्रायः ताड़पत्र (ताड़ के पेड़ की पत्तियों) या भोजपत्र (भोज के पेड़ की छाल) पर लिखी जाती थीं। ये दक्षिण भारत के मंदिरों, मठों, पुस्तकालयों तथा घरों में सुरक्षित रखी गईं। इन पांडुलिपियों का उपयोग बहुत सावधानी से करना पड़ता है, क्योंकि ये बहुत पुरानी और नाजुक होती हैं। पांडुलिपियों में आमतौर पर धार्मिक विषय, राजाओं के जीवन, चिकित्सा, खगोलशास्त्र आदि की जानकारी मिलती है।
पांडुलिपियों को नमी, कीड़ों और फफूंद से बचाने के लिए विशेष देखभाल की जाती है। इन्हें पढ़ने वाले विद्वान 'संग्रहालयों' और 'अभिलेखागारों' (Archives) में रखते हैं। आजकल पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जा रहा है, ताकि ये बहुमूल्य धरोहर सुरक्षित रहें और शोधार्थी इन्हें आसानी से पढ़ सकें।
पुस्तकों और साहित्यिक रचनाओं से हमें लोगों के विचार, मान्यताएँ, धर्म, रीति-रिवाज, समाज की संरचना तथा राजाओं की गतिविधियों के बारे में जानकारी मिलती है। वेद, पुराण, जातक कथाएँ, बौद्ध-जैन ग्रंथ, अर्थशास्त्र, मेगस्थनीज द्वारा लिखित 'इंडिका' तथा संगम साहित्य आदि प्रमुख प्राचीन ग्रंथ हैं। मेगस्थनीज यूनान का एक राजदूत था, जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था। 'इंडिका' में उसने भारतीय समाज और शासन की विस्तृत जानकारी दी है। इन सभी स्रोतों की सावधानीपूर्वक तुलना करके ही इतिहासकार अतीत का सही चित्र प्रस्तुत करते हैं।
| स्रोत का प्रकार | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| पुरातात्विक स्रोत | खुदाई से मिली वस्तुएँ | सिक्के, बर्तन, औजार, ईंटें, आभूषण |
| लिखित स्रोत | खुदी या लिखी हुई सामग्री | अभिलेख, पांडुलिपियाँ, पुस्तकें |
| साहित्यिक स्रोत | ग्रंथों में वर्णित सामग्री | वेद, पुराण, जातक कथाएँ, इंडिका |
| मौखिक स्रोत | पीढ़ी दर पीढ़ी सुनी गई कहानियाँ | लोककथाएँ, गाथाएँ, गीत |
| स्थल | नदी/स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| मोहनजोदड़ो | सिंधु नदी के किनारे | सिंधु घाटी सभ्यता का प्रमुख नगर |
| कौशाम्बी | यमुना नदी के किनारे | महाजनपद का प्रमुख नगर |
| पाटलिपुत्र | गंगा नदी के किनारे | मौर्य साम्राज्य की राजधानी |
| राजगृह | बिहार का क्षेत्र | मगध की प्रारंभिक राजधानी |
| विधि | प्रयोग क्षेत्र |
|---|---|
| रेडियोकार्बन डेटिंग (C-14) | हड्डी, लकड़ी, कोयला जैसे जैविक पदार्थ |
| स्तरीकरण (Stratigraphy) | मिट्टी की परतों के क्रम से वस्तुओं की कालक्रमिक स्थिति |
इतिहास के अध्ययन में 'क्या, कब, कहाँ और कैसे' प्रश्न हमें अतीत की ओर ले जाते हैं। पुरातात्विक स्रोतों की खुदाई, अभिलेखों का पठन, पांडुलिपियों की सुरक्षा और साहित्यिक ग्रंथों का अध्ययन - इन सबके समन्वय से ही हम प्राचीन समाज को समझ पाते हैं। यह अध्याय न केवल हमें हमारी सभ्यता की यात्रा से जोड़ता है, बल्कि इतिहासकार की पद्धति का आधार भी देता है। इस अध्याय की अवधारणाएँ आगे के सभी अध्यायों की नींव हैं, इसलिए इन्हें पूरी तरह समझना आवश्यक है।