मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में कई वंशों और साम्राज्यों का उदय हुआ। इनमें सबसे महत्वपूर्ण गुप्त वंश था, जिसने लगभग 1700 वर्ष पूर्व (चौथी शताब्दी ई.) अपनी स्थापना की। गुप्त काल को भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है, क्योंकि इस काल में विज्ञान, कला और साहित्य का अत्यधिक विकास हुआ। इसके अलावा दक्षिण भारत में चालुक्य और पल्लव वंश भी शक्तिशाली बने।
यह अध्याय हमें नए साम्राज्यों और राज्यों के उदय, उनके शासकों और उनकी शासन व्यवस्था के बारे में बताता है। हम चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय जैसे महान गुप्त शासकों के साथ-साथ पुलकेशिन द्वितीय (चालुक्य) और नरसिंहवर्मन (पल्लव) जैसे दक्षिण भारतीय शासकों के बारे में भी जानेंगे।
गुप्त वंश की स्थापना लगभग 1700 वर्ष पूर्व (चौथी शताब्दी ई.) में हुई। गुप्त शासकों ने मगध क्षेत्र से शासन आरंभ किया। चंद्रगुप्त (चंद्रगुप्त प्रथम) ने गुप्त साम्राज्य की नींव रखी और अपने विवाह से शक्तिशाली लिच्छवि वंश से संबंध स्थापित किया। गुप्त काल में मौर्य साम्राज्य की तरह ही केंद्रीय शासन व्यवस्था थी।
गुप्त वंश का सबसे महान शासक समुद्रगुप्त था, जिसने अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तर से दक्षिण तक किया। समुद्रगुप्त के बाद चंद्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें 'विक्रमादित्य' के नाम से भी जाना जाता है) शासक बना। उसने विशाल साम्राज्य का शासन संभाला। गुप्त साम्राज्य का केंद्र पाटलिपुत्र और बाद में अयोध्या था।
गुप्त काल के इतिहास के बारे में हमें 'प्रयाग प्रशस्ति' से महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। यह अभिलेख इलाहाबाद (प्रयाग) में स्थित अशोक के स्तंभ पर उकेरा गया है। इसे 'इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख' भी कहा जाता है। प्रशस्ति का अर्थ है 'प्रशंसा लेख'। इस अभिलेख में राजा की प्रशंसा में लिखा गया विवरण होता है।
प्रयाग प्रशस्ति को समुद्रगुप्त के दरबारी कवि और मंत्री 'हरिषेण' ने लिखा था। इस अभिलेख में समुद्रगुप्त की विजयों और उनके शासन की विस्तृत जानकारी है। समुद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए अनेक युद्ध लड़े। प्रयाग प्रशस्ति से हमें पता चलता है कि समुद्रगुप्त एक महान योद्धा था, जिसे 'कविराज' (कवियों का राजा) भी कहा जाता था।
प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत के कई राज्यों को जीता और अपने साम्राज्य में मिला लिया। दक्षिण भारत के कुछ शासकों को उसने पराजित कर उन्हें अपना मित्र बना लिया। कुछ राज्य केवल कर देने वाले बन गए। इस प्रकार समुद्रगुप्त ने लगभग पूरे भारत पर अपना प्रभाव स्थापित किया।
गुप्त काल में शासन व्यवस्था केंद्रीय थी, जिसमें राजा सर्वोच्च अधिकारी था। राजा की सहायता के लिए मंत्री होते थे। साम्राज्य को प्रांतों में बाँटा गया था, जिन्हें 'भुक्ति' कहा जाता था। प्रांतों का शासन राजकुमार या अधिकारी देखते थे। गाँवों का प्रबंधन ग्राम प्रमुखों द्वारा होता था।
गुप्त शासक कर वसूलते थे। किसानों को अपनी फसल का हिस्सा कर के रूप में देना पड़ता था। इसके अलावा व्यापारियों और अन्य लोगों से भी कर लिया जाता था। गुप्त काल में भूमि की देखभाल और सिंचाई की व्यवस्था होती थी। सम्राट अक्सर मंदिरों, ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान देते थे। इस दान के साथ दी गई भूमि पर कर नहीं लगता था।
मौर्य और गुप्त साम्राज्यों के अलावा भारत में अन्य कई वंशों का भी उदय हुआ, जिन्होंने अपने राज्य स्थापित किए। दक्षिण भारत में चालुक्य और पल्लव वंश शक्तिशाली थे। चालुक्य वंश का प्रमुख शासक पुलकेशिन द्वितीय था, जिसने लगभग 1400 वर्ष पहले (सातवीं शताब्दी ई.) शासन किया। उसने उत्तर भारत के शासकों को पराजित कर अपनी शक्ति बढ़ाई। चालुक्य राज्य का केंद्र वातापी (बादामी) था।
पल्लव वंश का शासन दक्षिण-पूर्व भारत (तमिलनाडु) में था। पल्लव शासक नरसिंहवर्मन ने पल्लव राज्य का विस्तार किया। पल्लवों ने कई मंदिरों का निर्माण किया, जिनमें महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) के मंदिर प्रसिद्ध हैं। पल्लव और चालुक्य शासकों के बीच अक्सर युद्ध होते रहते थे। इन दोनों वंशों ने दक्षिण भारत की कला और वास्तुकला को समृद्ध किया।
गुप्त काल के बाद भी कई छोटे-बड़े राज्य बने। इनमें शिलादित्य और यशोधर्मन (मालवा) जैसे शासक शामिल थे। यशोधर्मन ने हूणों को पराजित कर भारत की रक्षा की। इन राज्यों की अपनी-अपनी सेनाएँ, कर व्यवस्था और संस्कृति थी। इस प्रकार भारत में अनेक साम्राज्यों और राज्यों का सह-अस्तित्व था।
| शासक | मुख्य योगदान |
|---|---|
| चंद्रगुप्त प्रथम | वंश की नींव, लिच्छवि से संबंध |
| समुद्रगुप्त | साम्राज्य का विस्तार, कविराज |
| चंद्रगुप्त द्वितीय | विक्रमादित्य, विशाल साम्राज्य |
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थान | इलाहाबाद (प्रयाग) में अशोक के स्तंभ पर |
| लेखक | हरिषेण (समुद्रगुप्त के दरबारी) |
| विषय | समुद्रगुप्त की विजयें और प्रशंसा |
| प्रशस्ति का अर्थ | प्रशंसा लेख |
| वंश | प्रमुख शासक | केंद्र |
|---|---|---|
| चालुक्य | पुलकेशिन द्वितीय | वातापी (बादामी) |
| पल्लव | नरसिंहवर्मन | दक्षिण-पूर्व भारत |
नए साम्राज्य और राज्यों के अध्ययन से हमें पता चलता है कि मौर्य साम्राज्य के बाद भी भारत में राजनीतिक शक्ति का विकास जारी रहा। गुप्त वंश ने भारत को एक सशक्त और समृद्ध साम्राज्य दिया, जिसे स्वर्ण युग कहा गया। समुद्रगुप्त की विजयों का वर्णन प्रयाग प्रशस्ति में मिलता है। दक्षिण में चालुक्य और पल्लवों ने कला और मंदिर निर्माण को बढ़ावा दिया। इन वंशों ने न केवल राजनीतिक शक्ति बल्कि संस्कृति, वास्तुकला और ज्ञान के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया। यह अध्याय भारत के विविध और गौरवशाली इतिहास को समझने में सहायक है।