हमारी पृथ्वी की सतह कहीं पर समतल है, तो कहीं पर ऊँची-नीची। कहीं विशाल पर्वत खड़े हैं, तो कहीं हरे-भरे मैदान फैले हैं। कहीं ऊपर से समतल पठार दिखाई देते हैं, तो कहीं पर्वतों के बीच सँकरी घाटियाँ। पृथ्वी की सतह पर बने इन सभी प्राकृतिक आकारों को 'स्थलरूप' (Landforms) कहते हैं। यह अध्याय हमें पृथ्वी की सतह के प्रमुख स्थलरूपों - पर्वत, पठार, मैदान और घाटियों - तथा उनके निर्माण की प्रक्रियाओं के बारे में विस्तार से बताता है।
स्थलरूपों का निर्माण निरंतर चलने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाओं का परिणाम है। पृथ्वी के भीतर कार्य करने वाले बलों को 'आंतरिक बल' (Endogenic Forces) कहते हैं, जैसे भूकंप, ज्वालामुखी और टेक्टोनिक प्लेटों की गति। इन बलों के कारण पृथ्वी की सतह ऊपर उठती है, झुकती है और टूटती है। दूसरी ओर, पृथ्वी की सतह पर कार्य करने वाले बलों को 'बाह्य बल' (Exogenic Forces) कहते हैं, जैसे नदियाँ, वायु, हिमनद और समुद्र की लहरें। ये बल सतह को काटते, घिसते और समतल करते हैं।
भारत में स्थलरूपों की अद्भुत विविधता देखने को मिलती है। उत्तर में विश्व का सबसे ऊँचा वलित पर्वत 'हिमालय' है, मध्य और दक्षिण में 'दक्कन का पठार' फैला है, जबकि हिमालय के दक्षिण में 'गंगा का विशाल मैदान' स्थित है। इन्हीं स्थलरूपों के कारण हमारे देश में जलवायु, वनस्पति, कृषि और मानव जीवन में विविधता पाई जाती है।
पृथ्वी की सतह का निर्माण करने वाली ऊँची-नीची बनावटों को स्थलरूप कहते हैं। स्थलरूप एक-जैसे नहीं होते; वे आकार, ऊँचाई और उनके बनने की प्रक्रिया के आधार पर भिन्न होते हैं। पृथ्वी की सतह पर कुछ स्थलरूप बहुत ऊँचे होते हैं, जैसे पर्वत; कुछ ऊपर से समतल होते हैं, जैसे पठार; कुछ बहुत समतल और चौड़े होते हैं, जैसे मैदान; तथा कुछ दो ऊँचाइयों के बीच दबे होते हैं, जैसे घाटियाँ।
स्थलरूप न तो स्थायी हैं और न ही अपरिवर्तनीय। वे लाखों वर्षों की अवधि में धीरे-धीरे बदलते रहते हैं। पर्वतों का कटाव, नदियों द्वारा तलछट का निक्षेपण और ज्वालामुखियों का विस्फोट - ये सभी प्रक्रियाएँ पृथ्वी की सतह के आकार को निरंतर परिवर्तित करती रहती हैं। स्थलरूपों का अध्ययन भूगोल का महत्वपूर्ण भाग है, क्योंकि मानव जीवन का स्थलरूपों से गहरा संबंध है। लोगों की आजीविका, उनकी बस्तियाँ और उनकी गतिविधियाँ काफी हद तक स्थलरूपों पर निर्भर करती हैं।
पृथ्वी की सतह का वह ऊँचा भाग, जो आस-पास की भूमि से बहुत ऊँचा होता है, 'पर्वत' कहलाता है। पर्वतों का शिखर (Top) नुकीला होता है और उनके ढलान (Slopes) खड़े होते हैं। आमतौर पर 600 मीटर से अधिक ऊँची भूमि को पर्वत कहा जाता है। पृथ्वी की सतह का लगभग 27 प्रतिशत भाग पर्वतों से ढका हुआ है। पर्वत प्रायः एक श्रृंखला या पर्वतमाला के रूप में पाए जाते हैं, जैसे हिमालय, एल्प्स और एंडीज़।
पर्वतों को उनके निर्माण के आधार पर तीन प्रकारों में बाँटा जाता है। पहले, 'वलित पर्वत' (Fold Mountains) - ये तब बनते हैं जब पृथ्वी की भूपर्पटी की परतें टकराती हैं और दबाव से मुड़कर वलन का रूप ले लेती हैं। हिमालय, एल्प्स और यूराल इसके उदाहरण हैं। दूसरे, 'ब्लॉक पर्वत' (Block Mountains) - ये तब बनते हैं जब भूपर्पटी में दरार (भ्रंश) पड़ती है और कोई ब्लॉक ऊपर उठ जाता है, जैसे वोसजेस और राइन पर्वत। तीसरे, 'ज्वालामुखी पर्वत' (Volcanic Mountains) - ये पृथ्वी के भीतर से निकले पिघले लावा के जमने से बनते हैं, जैसे किलिमंजारो और माउंट फुजी।
पर्वतों का मानव जीवन में बहुत महत्व है। पर्वत वर्षा का कारण बनते हैं, क्योंकि वे वायु की दिशा बदलकर बादलों को रोकते हैं। वे नदियों का उद्गम स्थल होते हैं, जिनसे मैदानी क्षेत्रों को जल मिलता है। पर्वतों से खनिज, वन और औषधीय पौधे प्राप्त होते हैं। पर्वतीय क्षेत्र पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं, और खेती सीढ़ीदार ढलानों (टेरासिंग) पर की जाती है। कश्मीर घाटी और उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में पर्वतों ने विशेष सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन विकसित किया है।
पृथ्वी की सतह का वह ऊँचा भाग, जो ऊपर से समतल होता है, परंतु चारों ओर से ढालों से घिरा होता है, 'पठार' कहलाता है। पठार पर्वतों की तुलना में कम ऊँचे होते हैं, परंतु मैदानों से ऊँचे होते हैं। पठार की ऊपरी सतह 'टेबललैंड' के समान समतल दिखाई देती है। कुछ पठार पर्वतों के साथ-साथ स्थित होते हैं, तो कुछ नदियों और हिमनदों द्वारा कटे हुए होते हैं। तिब्बत का पठार विश्व का सबसे ऊँचा पठार है।
भारत में दक्कन का पठार सबसे प्रसिद्ध है, जो भारतीय प्रायद्वीप के अधिकांश भाग में फैला है। यह प्राचीन ज्वालामुखी लावा से निर्मित है और लोहा, कोयला, मैंगनीज आदि खनिजों से भरपूर है। छोटानागपुर पठार कोयले के खनन के लिए विश्व प्रसिद्ध है। पठारों पर खनिजों की प्रचुरता के कारण ही बड़ी संख्या में खदानें पाई जाती हैं।
पठारों का महत्व अनेक दृष्टियों से है। पठार खनिजों के भंडार हैं, इसलिए इन्हें 'खनिजों का खजाना' भी कहा जाता है। पठारों पर बहने वाली नदियाँ ऊँचाई से गिरकर जलप्रपात बनाती हैं, जिनसे जल-विद्युत उत्पन्न की जाती है। पठारों की समतल सतह पर कृषि और पशुपालन भी किया जाता है। जलप्रपात (झरने) पर्यटकों को आकर्षित करते हैं और सिंचाई एवं बिजली में सहायक होते हैं।
पृथ्वी की सतह का वह समतल, चौड़ा और कम ऊँचाई वाला क्षेत्र, जहाँ न तो ऊँचे पर्वत हों और न ही गहरे गड्ढे, 'मैदान' कहलाता है। मैदान प्रायः नदियों के मार्ग में स्थित होते हैं और इनकी मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है। पृथ्वी की सतह का लगभग 43 प्रतिशत भाग मैदानों से ढका हुआ है। मैदानों को 'मानव सभ्यता का पालना' भी कहा जाता है, क्योंकि विश्व की अधिकांश बस्तियाँ और सभ्यताएँ मैदानों पर ही विकसित हुई हैं।
मैदानों का निर्माण प्रायः नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी और रेत के निक्षेपण (जमाव) से होता है। नदियाँ पर्वतों से गिरकर अपने साथ तलछट लाती हैं और समतल भूमि पर उसे जमा कर देती हैं। इस प्रकार बने उपजाऊ मैदान को 'जलोढ़ मैदान' कहते हैं। गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा निर्मित 'सिंधु-गंगा का मैदान' भारत के सबसे उपजाऊ और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से एक है।
मैदानों का महत्व असाधारण है। मैदानों की उपजाऊ मिट्टी पर बड़ी मात्रा में अनाज और सब्जियाँ उगाई जाती हैं, जिससे देश की खाद्य आपूर्ति होती है। मैदानी क्षेत्र समतल होने के कारण सड़कों, रेलवे और हवाई अड्डों के निर्माण के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं। परिवहन की सुविधा और उपजाऊ भूमि के कारण मैदानों पर जनसंख्या बहुत घनी होती है। उद्योग, व्यापार और बाजार भी मैदानों में ही अधिक विकसित होते हैं।
दो ऊँचे स्थलरूपों - जैसे पर्वतों या पहाड़ियों - के बीच स्थित नीची भूमि को 'घाटी' (Valley) कहते हैं। घाटियाँ प्रायः नदियों और हिमनदों द्वारा बनाई जाती हैं। नदी जब पहाड़ों के बीच से बहती है, तो अपने अपरदन (कटाव) से गहरी और सँकरी घाटी बनाती है। ऐसी घाटियों को 'नदी घाटी' कहते हैं। नदी के मार्ग में पानी मिट्टी और चट्टानों को काटकर साथ ले जाता है, जिससे घाटी धीरे-धीरे गहरी होती जाती है।
हिमनद (ग्लेशियर) से बनी घाटियाँ 'हिमनद घाटियाँ' कहलाती हैं। हिमनद जब धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, तो वे चट्टानों को घिसकर घाटी को U आकार देते हैं। इसके विपरीत, नदी द्वारा बनी घाटी V आकार की होती है। हिमालय में 'कश्मीर घाटी' और 'कुल्लू घाटी' हिमनद घाटियों के प्रमुख उदाहरण हैं। हिमनद घाटियाँ अत्यंत सुंदर और उपजाऊ होती हैं, इसलिए वहाँ फलों के बाग और बस्तियाँ पाई जाती हैं।
घाटियाँ मानव जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं। घाटियों में नदियाँ बहती हैं, जो जल और उपजाऊ मिट्टी प्रदान करती हैं। घाटियाँ पर्वतों के बीच आवागमन के प्राकृतिक मार्ग होती हैं, इसलिए सड़कें और रेलमार्ग प्रायः घाटियों से होकर गुजरते हैं। घाटियों की सुरम्य सुंदरता पर्यटन को बढ़ावा देती है। भारत के कई प्रसिद्ध पर्यटन स्थल, जैसे कश्मीर, मनाली और लेह, घाटियों में ही स्थित हैं।
स्थलरूपों का निर्माण दो प्रकार के बलों द्वारा होता है - आंतरिक बल और बाह्य बल। आंतरिक बल पृथ्वी के भीतर से कार्य करते हैं। इनमें टेक्टोनिक प्लेटों की गति, भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट शामिल हैं। जब प्लेटें आपस में टकराती हैं, तो भूपर्पटी की परतें मुड़कर वलित पर्वत बनाती हैं। जब भूपर्पटी में दरार पड़ती है, तो कुछ ब्लॉक ऊपर उठकर ब्लॉक पर्वत बनाते हैं। लावा के फूटने से ज्वालामुखी पर्वत बनते हैं। इस प्रकार आंतरिक बल पृथ्वी की सतह को ऊँचा और ऊबड़-खाबड़ बनाते हैं।
बाह्य बल पृथ्वी की सतह पर कार्य करते हैं। नदियाँ, वायु, हिमनद, समुद्र की लहरें और भूमिगत जल बाह्य बलों के मुख्य साधन हैं। ये बल तीन मुख्य क्रियाएँ करते हैं - अपरदन (Erosion), अपक्षय (Weathering) और निक्षेपण (Deposition)। अपरदन में बहता जल, वायु या हिमनद चट्टानों को तोड़कर बहा ले जाता है। निक्षेपण में यह मलबा किसी समतल स्थान पर जमा हो जाता है। इसी प्रक्रिया से घाटियाँ और मैदान बनते हैं। इस प्रकार बाह्य बल ऊँची सतह को समतल करते हैं और नए नीचे के स्थलरूप बनाते हैं।
आंतरिक और बाह्य बलों का कार्य निरंतर चलता रहता है। पर्वतों को बनाने का काम मुख्यतः आंतरिक बल करते हैं, जबकि उन्हें समतल करने का काम बाह्य बल। नदियाँ मैदान बनाती हैं, हिमनद घाटियाँ बनाते हैं और वायु रेगिस्तानों में रेत के टीले बनाती है। समुद्र की लहरें तटों पर स्थलरूप बनाती हैं। इस प्रकार पृथ्वी की सतह पर लाखों वर्षों से स्थलरूपों का निर्माण और विनाश चक्र चलता रहता है।
| स्थलरूप | मुख्य विशेषता | ऊँचाई | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| पर्वत | नुकीला शिखर, खड़े ढलान | 600 मीटर से अधिक | हिमालय |
| पठार | ऊपर समतल, चारों ओर ढाल | पर्वत से कम, मैदान से अधिक | दक्कन का पठार |
| मैदान | समतल, चौड़ा, उपजाऊ | बहुत कम | गंगा का मैदान |
| घाटी | दो ऊँचाइयों के बीच नीची भूमि | परिवर्तनशील | कश्मीर घाटी |
| प्रकार | निर्माण की प्रक्रिया | उदाहरण |
|---|---|---|
| वलित पर्वत | भूपर्पटी की परतों के वलन से | हिमालय, एल्प्स, यूराल |
| ब्लॉक पर्वत | भ्रंश से ऊपर उठे ब्लॉक से | वोसजेस, राइन |
| ज्वालामुखी पर्वत | लावा के जमने से | किलिमंजारो, माउंट फुजी |
| बल | साधन | मुख्य क्रिया | बनने वाले स्थलरूप |
|---|---|---|---|
| आंतरिक बल | टेक्टोनिक प्लेट, भूकंप, ज्वालामुखी | सतह को ऊँचा करना | पर्वत, पठार |
| बाह्य बल | नदी, वायु, हिमनद, लहरें | अपरदन और निक्षेपण | मैदान, घाटियाँ |
प्रमुख स्थलरूप - पर्वत, पठार, मैदान और घाटियाँ - पृथ्वी की सतह की मूल बनावट हैं। इनका निर्माण आंतरिक और बाह्य बलों की सतत क्रियाओं से होता है। पर्वत ऊँचे शिखरों वाले होते हैं, पठार ऊपर से समतल होते हैं, मैदान समतल और उपजाऊ होते हैं, जबकि घाटियाँ पर्वतों के बीच की नीची भूमि होती हैं। ये स्थलरूप न केवल पृथ्वी को सुंदर बनाते हैं, बल्कि मानव जीवन, कृषि, परिवहन, खनन और पर्यटन को भी प्रभावित करते हैं। भारत में हिमालय, दक्कन का पठार और गंगा का मैदान इस विविधता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। स्थलरूपों को समझना भूगोल की नींव है, क्योंकि यही हमें बताता है कि हमारा देश और हमारी पृथ्वी किस प्रकार बनी है।