पृथ्वी अपने अस्तित्व के आरंभ से ही गतिशील है। यह लगातार दो प्रकार की गतियाँ करती है - अपनी धुरी पर चक्कर लगाना (घूर्णन) और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना (परिक्रमण)। पृथ्वी की ये गतियाँ ही दिन-रात, ऋतुओं के परिवर्तन और समय की अवधारणा के लिए जिम्मेदार हैं।
यदि पृथ्वी गतिशील नहीं होती, तो पृथ्वी का एक भाग हमेशा अंधकार में और दूसरा हमेशा प्रकाश में रहता। सूर्य की ओर मुख करने वाला भाग गर्म और विपरीत भाग अत्यंत ठंडा हो जाता। पृथ्वी की गतियाँ ही इस असंतुलन को रोकती हैं और जीवन को संभव बनाती हैं। इस अध्याय में हम पृथ्वी की दोनों गतियों और उनके प्रभावों का अध्ययन करेंगे।
पृथ्वी का अपनी धुरी पर चक्कर लगाना 'घूर्णन' कहलाता है। पृथ्वी की धुरी एक काल्पनिक रेखा है, जो उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक होकर पृथ्वी के केंद्र से गुजरती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर लगभग 24 घंटे में पूरा करती है, जिसे एक दिन कहते हैं।
घूर्णन के कारण ही पृथ्वी पर दिन और रात होते हैं। पृथ्वी का वह भाग जो सूर्य की ओर होता है, वहाँ दिन होता है और विपरीत भाग में रात। पृथ्वी के घूमने के कारण सूर्य पूर्व में उगता है और पश्चिम में अस्त होता है। वास्तव में सूर्य घूमता नहीं, बल्कि पृथ्वी घूमती है।
पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना 'परिक्रमण' कहलाता है। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगभग 365 दिन 6 घंटे (365¼ दिन) में पूरा करती है, जिसे एक वर्ष कहते हैं। इसी पूर्ण वर्ष के आधार पर कैलेंडर (पंचांग) बनाया जाता है।
पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर का मार्ग 'कक्षा' (Orbit) कहलाता है। यह कक्षा पूर्णतः गोलाकार नहीं, बल्कि अंडाकार (Elliptical) है। सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की यह यात्रा लगभग 30 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से होती है। चार वर्षों में 6+6+6+6 = 24 घंटे बनते हैं, इसलिए हर चौथे वर्ष में फरवरी में एक अतिरिक्त दिन जोड़ा जाता है। ऐसे वर्ष को 'लीप वर्ष' कहते हैं।
पृथ्वी की धुरी कक्षा के तल (लंबवत रेखा) से 23.5° झुकी हुई है। यही झुकाव ऋतुओं के परिवर्तन का मुख्य कारण है। यदि पृथ्वी की धुरी झुकी नहीं होती, तो पूरे वर्ष एक ही तरह का मौसम रहता और ऋतुओं का कोई परिवर्तन नहीं होता।
पृथ्वी के अक्ष का झुकाव हमेशा एक ही दिशा में स्थिर रहता है। परिक्रमण के दौरान कभी उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुकता है, तो कभी दक्षिणी गोलार्ध। जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुका होता है, तो वहाँ गर्मी होती है, और जब दक्षिणी गोलार्ध झुका होता है, तो उत्तरी गोलार्ध में सर्दी होती है। इसी प्रकार दोनों गोलार्धों में ऋतुओं का परिवर्तन होता है।
वर्ष में दो ऐसे अवसर आते हैं जब सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती हैं। इन दिनों दिन और रात की अवधि बराबर (लगभग 12 घंटे) होती है। इन दिनों को 'विषुव' (Equinox) कहते हैं।
विषुव के दिन सूर्य सीधे भूमध्य रेखा के ऊपर होता है और पूरी पृथ्वी पर दिन-रात बराबर होते हैं।
'अयनांत' (Solstice) वे दिन होते हैं जब सूर्य कर्क रेखा या मकर रेखा के ठीक ऊपर होता है और दिन-रात की अवधि सबसे अधिक भिन्न होती है।
उत्तरी ध्रुव पर लगभग 6 महीने का दिन और 6 महीने की रात होती है। जब उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है, तो वहाँ लगातार दिन रहता है, और जब वह सूर्य से दूर झुका होता है, तो लगातार रात रहती है।
| गति | विवरण | समय |
|---|---|---|
| घूर्णन (Rotation) | अपनी धुरी पर चक्कर | लगभग 24 घंटे |
| परिक्रमण (Revolution) | सूर्य के चारों ओर चक्कर | 365¼ दिन |
| तिथि | घटना | प्रभाव |
|---|---|---|
| 21 मार्च | वसंत विषुव | दिन-रात बराबर |
| 21 जून | ग्रीष्म अयनांत | उत्तरी गोलार्ध में सबसे लंबा दिन |
| 23 सितंबर | शरद विषुव | दिन-रात बराबर |
| 22 दिसंबर | शीत अयनांत | उत्तरी गोलार्ध में सबसे छोटा दिन |
| गति | प्रभाव |
|---|---|
| घूर्णन | दिन और रात का होना |
| परिक्रमण + अक्ष का झुकाव | ऋतुओं का परिवर्तन |
| अक्ष का झुकाव | 23.5° का झुकाव |
पृथ्वी की दोनों गतियाँ - घूर्णन और परिक्रमण - पृथ्वी पर जीवन का आधार हैं। घूर्णन से दिन-रात होते हैं और परिक्रमण, अक्ष के झुकाव के साथ मिलकर ऋतुओं का परिवर्तन करती है। विषुव और अयनांत के दिन इन गतियों के विशेष बिंदु हैं। इन सबको समझने से हमें यह ज्ञान होता है कि प्रकृति के नियम कितने सटीक और सुनियोजित हैं। पृथ्वी की गतियाँ ही हमें दिन-रात, वर्ष और ऋतुओं की अवधारणा देती हैं, जिन पर हमारा संपूर्ण जीवन आधारित है।