प्राचीन भारत में व्यापारी, राजा और तीर्थयात्री - ये तीन समूह लोगों के जीवन को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। व्यापारी व्यापार के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ते थे, राजा राज्यों का संचालन करते थे और तीर्थयात्री धार्मिक स्थलों की यात्रा करके धार्मिक विचारों का प्रसार करते थे। यह अध्याय इन तीनों समूहों की गतिविधियों पर केंद्रित है।
इस अध्याय में हम चीनी तीर्थयात्रियों - फाहियान, ह्वेन त्सांग और इत्सिंग के भारत आगमन का अध्ययन करेंगे। साथ ही, दक्षिण भारत के संगम साहित्य, मुवेंदर (तीन महान शासकों) और उनके राज्यों के बारे में भी जानेंगे। यह अध्याय हमें बताता है कि धर्म और व्यापार किस प्रकार आपस में जुड़े हुए थे।
तीर्थयात्री वे लोग होते हैं, जो अपने धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं। प्राचीन काल में भारत दुनिया भर के धर्मों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान था। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण चीन और अन्य देशों के लोग बौद्ध तीर्थ स्थलों की यात्रा के लिए भारत आते थे। बुद्ध के जीवन से जुड़े स्थान जैसे लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर प्रमुख तीर्थ स्थल थे।
तीर्थयात्री भारत की यात्रा करके अपने देश लौटते थे और भारत के बारे में जानकारी लिखते थे। इनमें से कुछ तीर्थयात्रियों की लिखी किताबें आज भी हमें उस समय के भारत के बारे में बहुमूल्य जानकारी देती हैं। ये यात्रा वृत्तांत हमें उस युग के समाज, धर्म और जीवन की झलक दिखाते हैं।
भारत आने वाले सबसे प्रसिद्ध चीनी तीर्थयात्री फाहियान थे, जो लगभग 1600 वर्ष पहले (चौथी-पाँचवीं शताब्दी ई.) भारत आए। उन्होंने भारत की यात्रा करके अपने अनुभवों को 'फा-क्यो-किंग' नामक पुस्तक में लिखा। उन्होंने बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को चीन में फैलाने के लिए बौद्ध ग्रंथों को चीन ले जाने का प्रयास किया।
इनके बाद ह्वेन त्सांग (सातवीं शताब्दी ई.) भारत आए, जो सबसे प्रसिद्ध चीनी तीर्थयात्री माने जाते हैं। ह्वेन त्सांग ने भारत में लगभग 15 वर्ष बिताए और कई विश्वविद्यालयों, जैसे नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। उन्होंने बौद्ध ग्रंथों को चीनी भाषा में अनुवाद किया। इत्सिंग भी एक प्रसिद्ध चीनी तीर्थयात्री थे, जिन्होंने भारत का अध्ययन किया और बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद किया।
चीनी तीर्थयात्री भारत क्यों आते थे? इसका मुख्य कारण बुद्ध के जन्म, ज्ञान और निर्वाण से जुड़े स्थानों की यात्रा करना और बौद्ध ग्रंथों को प्राप्त करना था। वे पवित्र ग्रंथों की प्रतियाँ बनाकर अपने देश ले जाते थे ताकि चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार हो सके।
बुद्ध की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए बौद्ध अनुयायियों ने अनेक स्थानों पर 'विहार' (मठ) और 'चैत्य' (पूजा स्थल) बनाए। विहार वे स्थान थे जहाँ भिक्षु रहते थे और ध्यान करते थे। चैत्य ऐसे पूजा स्थल थे, जिनमें बुद्ध या अन्य बौद्ध देवताओं की पूजा की जाती थी।
प्रारंभ में बुद्ध की मूर्तियाँ नहीं बनाई जाती थीं, बल्कि उनके चरण चिह्नों (पदचिह्न) की पूजा होती थी। बाद में लोग बुद्ध की मूर्तियाँ बनाने लगे। कुछ मूर्तियाँ बहुत बड़ी होती थीं, जैसे करली की गुफा में स्थित बुद्ध की विशाल मूर्ति। बौद्ध भिक्षुओं के रहने और ध्यान करने के लिए गुफाओं में भी विहार बनाए गए, जैसे अजंता और एलोरा की गुफाएँ।
दक्षिण भारत के इतिहास के बारे में हमें 'संगम साहित्य' से जानकारी मिलती है। संगम का अर्थ है 'सभा' या 'संगठन'। तमिल कवियों की सभाओं में रची गई कविताएँ 'संगम साहित्य' कहलाती हैं। इन कविताओं से हमें प्राचीन तमिल समाज, राजाओं और व्यापार के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलता है।
दक्षिण भारत में तीन प्रमुख राज्य थे - चोल, पांड्य और चेर। इन तीनों राजवंशों को 'मुवेंदर' कहा जाता था, जिसका अर्थ है 'तीन महान शासक'। चोल राज्य का केंद्र कावेरी नदी की घाटी थी, पांड्य राज्य का केंद्र मदुरै और चेर राज्य का केंद्र केरल का तटीय क्षेत्र था। इन राज्यों में धनी व्यापारी रहते थे और यहाँ से बहुमूल्य वस्तुएँ बनाई जाती थीं।
संगम साहित्य में 'मगलार' शब्द का उल्लेख मिलता है, जिसका अर्थ है 'बेहतरीन वस्तुएँ बनाने वाले लोग'। ये कुशल कारीगर थे, जो उत्कृष्ट वस्तुएँ बनाते थे। वे उच्च स्तर की कला और शिल्प में निपुण थे। 'अरहट्ट' प्राचीन भारत में व्यापार करने वाले व्यापारियों का नाम था, जो विभिन्न प्रदेशों से वस्तुएँ लाकर बेचते थे।
प्राचीन भारत में व्यापार और धर्म गहराई से जुड़े हुए थे। व्यापारी व्यापार के लिए यात्रा करते थे, जबकि तीर्थयात्री धर्म के लिए। दोनों एक ही मार्गों पर चलते थे, इसलिए वे अक्सर साथ-साथ यात्रा करते थे। व्यापार मार्गों पर बौद्ध मठ और विहार बनाए गए, जहाँ तीर्थयात्री और व्यापारी दोनों रुक सकते थे। धार्मिक विचार व्यापार के माध्यम से भी फैलते थे। इस प्रकार व्यापार और धर्म ने मिलकर भारत को अन्य देशों से जोड़ा।
| तीर्थयात्री | काल | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| फाहियान | लगभग 1600 वर्ष पूर्व | यात्रा वृत्तांत 'फा-क्यो-किंग' लिखा |
| ह्वेन त्सांग | सातवीं शताब्दी ई. | नालंदा में अध्ययन, ग्रंथों का अनुवाद |
| इत्सिंग | बाद का काल | बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन और अनुवाद |
| राज्य | केंद्र |
|---|---|
| चोल | कावेरी नदी की घाटी |
| पांड्य | मदुरै |
| चेर | केरल का तटीय क्षेत्र |
| स्थल | प्रकार |
|---|---|
| विहार | भिक्षुओं के रहने का स्थान |
| चैत्य | पूजा स्थल |
| करली की गुफा | बुद्ध की विशाल मूर्ति |
| अजंता-एलोरा | गुफाओं में विहार |
व्यापारी, राजा और तीर्थयात्री प्राचीन भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन के तीन स्तंभ थे। तीर्थयात्रियों जैसे फाहियान और ह्वेन त्सांग ने भारत की यात्रा करके बौद्ध धर्म का प्रसार किया और भारत के बारे में मूल्यवान जानकारी दी। दक्षिण भारत के मुवेंदर राज्यों ने व्यापार और कला को बढ़ावा दिया। संगम साहित्य उस युग के जीवन का आईना है। यह अध्याय दर्शाता है कि भारत प्राचीन काल में धर्म, व्यापार और ज्ञान का महत्वपूर्ण केंद्र था, जहाँ से विचार समस्त विश्व में फैलते थे।