Comprehensive theory, key formulas, diagrams, and memory aids for संख्या पद्धतियाँ.
कंप्यूटर केवल दो अंकों — 0 और 1 — को समझता है। इसलिए कंप्यूटर में संख्याओं को प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न संख्या पद्धतियों का उपयोग किया जाता है। संख्या पद्धति वह विधि है जिसके द्वारा संख्याओं को लिखा और पढ़ा जाता है। मनुष्य दशमलव (Decimal) पद्धति का उपयोग करता है, जबकि कंप्यूटर द्विआधारी (Binary) पद्धति का। इस अध्याय में हम चार मुख्य संख्या पद्धतियों — दशमलव, द्विआधारी, अष्टक और षोडश आधारी — तथा उनके आपसी रूपांतरण को विस्तार से सीखेंगे।
किसी भी संख्या पद्धति के तीन मुख्य तत्व होते हैं:
द्विआधारी संख्या के प्रत्येक अंक (बिट) को उसके स्थान के अनुसार 2 की घात से गुणा करके जोड़ते हैं।
उदाहरण: 1011₂ को दशमलव में बदलें।
1×2³ + 0×2² + 1×2¹ + 1×2⁰ = 8 + 0 + 2 + 1 = 11
अतः 1011₂ = 11₁₀
दशमलव संख्या को 2 से बार-बार भाग देते हैं और शेष (Remainder) को नीचे से ऊपर की ओर लिखते हैं।
उदाहरण: 13₁₀ को द्विआधारी में बदलें।
13 ÷ 2 = 6, शेष 1 6 ÷ 2 = 3, शेष 0 3 ÷ 2 = 1, शेष 1 1 ÷ 2 = 0, शेष 1
नीचे से ऊपर शेष लिखने पर: 1101₂
अतः 13₁₀ = 1101₂
द्विआधारी अंकों को दाईं ओर से तीन-तीन के समूह में बाँटते हैं और प्रत्येक समूह को अष्टक में बदलते हैं।
उदाहरण: 101110₂ → दाएँ से तीन-तीन: 101 | 110 → 5 | 6 → 56₈
द्विआधारी अंकों को दाईं ओर से चार-चार के समूह में बाँटते हैं।
उदाहरण: 10111110₂ → 1011 | 1110 → B | E → BE₁₆
द्विआधारी संख्याओं का जोड़ निम्नलिखित चार नियमों के अनुसार किया जाता है: 0 + 0 = 0, 1 + 0 = 1, 0 + 1 = 1 और 1 + 1 = 10 (यहाँ 0 लिखते हैं और 1 आगे 'कैरी' होता है)।
उदाहरण: 101₂ + 011₂ = 1000₂।
1 + 1 = 10, अतः दाईं ओर से जोड़ने पर 1+1=0 लिखते हैं और 1 कैरी होता है; आगे भी इसी प्रकार योग करने पर अंतिम परिणाम 1000₂ प्राप्त होता है। इसी प्रकार द्विआधारी घटाव में 1 - 1 = 0, 1 - 0 = 1, 0 - 0 = 0 होता है। द्विआधारी अंकगणित कंप्यूटर की ALU (अंकगणितीय तर्क इकाई) में होने वाली सभी गणनाओं का आधार है।
दशमलव संख्या 30 को अष्टक में बदलने के लिए 30 को 8 से बार-बार भाग देते हैं: 30 ÷ 8 = 3, शेष 6; 3 ÷ 8 = 0, शेष 3। शेष को नीचे से ऊपर लिखने पर 36₈ प्राप्त होता है। इसी प्रकार, दशमलव 30 को षोडश आधारी में बदलने के लिए 30 ÷ 16 = 1, शेष 14; 14 को अक्षर E से लिखा जाता है, अतः परिणाम 1E₁₆ होता है। इससे स्पष्ट होता है कि वही 'भाग और शेष' की विधि हर आधार पर लागू होती है, केवल भाजक (Divisor) बदल जाता है — 2 के स्थान पर 8 या 16। यदि शेष 10 से बड़ा हो, तो षोडश आधारी में उसे A से F तक के अक्षरों से लिखते हैं। इस विधि का बार-बार अभ्यास करने से रूपांतरण सहज और शीघ्र हो जाता है।
| दशमलव | द्विआधारी | अष्टक | षोडश आधारी |
|---|---|---|---|
| 0 | 0 | 0 | 0 |
| 1 | 1 | 1 | 1 |
| 2 | 10 | 2 | 2 |
| 3 | 11 | 3 | 3 |
| 4 | 100 | 4 | 4 |
| 5 | 101 | 5 | 5 |
| 6 | 110 | 6 | 6 |
| 7 | 111 | 7 | 7 |
| 8 | 1000 | 10 | 8 |
| 9 | 1001 | 11 | 9 |
| 10 | 1010 | 12 | A |
| 11 | 1011 | 13 | B |
| 12 | 1100 | 14 | C |
| 13 | 1101 | 15 | D |
| 14 | 1110 | 16 | E |
| 15 | 1111 | 17 | F |
| पद्धति | आधार | प्रयुक्त अंक | उपयोग |
|---|---|---|---|
| दशमलव | 10 | 0 से 9 | मानव गणना |
| द्विआधारी | 2 | 0, 1 | कंप्यूटर |
| अष्टक | 8 | 0 से 7 | द्विआधारी को छोटा करना |
| षोडश आधारी | 16 | 0-9, A-F | मेमोरी एड्रेस, रंग |
| इकाई | मान |
|---|---|
| 1 बिट | 0 या 1 |
| 1 बाइट | 8 बिट |
| 1 KB | 1024 बाइट |
| 1 MB | 1024 KB |
| 1 GB | 1024 MB |
| 1 TB | 1024 GB |
| रूपांतरण | विधि |
|---|---|
| द्विआधारी → दशमलव | 2 की घात से गुणा कर जोड़ें |
| दशमलव → द्विआधारी | 2 से भाग देकर शेष लिखें |
| द्विआधारी → अष्टक | तीन-तीन बिट के समूह |
| द्विआधारी → षोडश आधारी | चार-चार बिट के समूह |
graph TD
A["संख्या पद्धतियाँ"] --> B["दशमलव (आधार 10)"]
A --> C["द्विआधारी (आधार 2)"]
A --> D["अष्टक (आधार 8)"]
A --> E["षोडश आधारी (आधार 16)"]
C --> F["कंप्यूटर की भाषा"]
F --> G["बिट = 0 या 1"]
G --> H["8 बिट = 1 बाइट"]
H --> I["1024 बाइट = 1 KB"]
A --> J["रूपांतरण विधियाँ"]
J --> K["द्विआधारी → दशमलव"]
J --> L["दशमलव → द्विआधारी"]
J --> M["द्विआधारी → अष्टक"]
J --> N["द्विआधारी → षोडश आधारी"]
संख्या पद्धतियाँ कंप्यूटर विज्ञान की आधारशिला हैं। कंप्यूटर द्विआधारी भाषा में कार्य करता है, जबकि मनुष्य दशमलव में। रूपांतरण विधियों को समझकर हम दोनों के बीच संबंध स्थापित कर सकते हैं। अष्टक और षोडश आधारी पद्धतियाँ द्विआधारी संख्याओं को संक्षिप्त रूप में लिखने में सहायक होती हैं। इस ज्ञान का उपयोग आगे प्रोग्रामिंग और कंप्यूटर मेमोरी की समझ में होगा।