"आश्रम का अनुमानित व्यय" कक्षा सात की पुस्तक वसंत भाग-दो का उन्नीसवाँ पाठ है। यह पाठ महात्मा गांधी के लेखन से संकलित है, जिसमें उन्होंने अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना से पहले उसके अनुमानित खर्च का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है। गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद सन् 1915 में भारत आए थे और उन्होंने अहमदाबाद में आश्रम स्थापित करने का निर्णय लिया था। इस पाठ में उस आश्रम को चलाने के लिए आवश्यक सामान, औज़ार और खर्च का हिसाब-किताब दिया गया है।
इस पाठ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गांधी जी ने कोई भी कार्य शुरू करने से पहले उसकी हर छोटी-बड़ी आवश्यकता का अनुमान लगाया है। उन्होंने आश्रम में कितने लोग रहेंगे, कितने मेहमान आएँगे, खेती के लिए कितनी ज़मीन चाहिए, कितनी पुस्तकें रखनी हैं, बढ़ई और मोची के औज़ार कौन-से चाहिए, रसोई का सामान कितना होगा — सब कुछ लिखा है। यह उनकी सूझ-बूझ और ईमानदारी का प्रमाण है।
इस पाठ का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को यह सिखाना है कि किसी भी काम को शुरू करने से पहले उसकी योजना और हिसाब-किताब बनाना चाहिए। गांधी जी सादा जीवन और ईमानदारी के प्रतीक थे। उनका यह पाठ हमें मितव्ययिता (कम खर्च में काम चलाना), सादगी और पारदर्शिता की शिक्षा देता है।
इस पाठ के रचयिता महात्मा गांधी हैं, जिन्हें पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी है। उनका जन्म सन् 1869 में गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। वे भारत के राष्ट्रपिता कहे जाते हैं। उन्होंने भारत को अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर अद्वितीय संघर्ष किया। उनका पूरा जीवन सत्य, अहिंसा, सादगी और सेवा का उदाहरण है।
महात्मा गांधी ने अपने जीवन में अनेक आश्रमों की स्थापना की, जिनमें साबरमती आश्रम और सेवाग्राम विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उनका मानना था कि आश्रम ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ लोग सादा जीवन जीकर सेवा, सत्य और स्वावलंबन की शिक्षा प्राप्त करें। वे आश्रम के हर खर्च का पारदर्शी हिसाब रखते थे। उनकी आत्मकथा "सत्य के प्रयोग" और अन्य लेखन में यही ईमानदारी झलकती है।
गांधी जी का लेखन उनके जीवन-दर्शन का प्रतिबिंब है। वे हमेशा सरल भाषा में गहरी बातें लिखते थे। "आश्रम का अनुमानित व्यय" जैसा पाठ दिखाता है कि वे हर काम को कितनी गंभीरता और सूक्ष्मता से करते थे। उनका यह पाठ हमें ज़िम्मेदारी, योजना और मितव्ययिता की सीख देता है।
पाठ की शुरुआत में गांधी जी आश्रम में रहने वाले लोगों की संख्या का अनुमान लगाते हैं। वे बताते हैं कि आरंभ में आश्रम में चालीस लोग होंगे और कुछ समय में यह संख्या पचास हो जाने की संभावना है। हर महीने औसतन दस अतिथियों के आने की संभावना है। अतिथियों में तीन या पाँच सपरिवार होंगे, इसलिए स्थान की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि परिवार वाले अलग रह सकें और शेष एक साथ।
इसके बाद गांधी जी आश्रम की भौतिक आवश्यकताओं का वर्णन करते हैं। वे चाहते हैं कि आश्रम में तीन रसोईघर हों और मकान कुल पचास हज़ार वर्ग फुट क्षेत्रफल में बने, तभी सभी लोगों के रहने की जगह होगी। इसके अलावा कम से कम तीन हज़ार पुस्तकें रखने लायक पुस्तकालय और अलमारियाँ होनी चाहिए। खेती के लिए कम से कम पाँच एकड़ ज़मीन चाहिए, जिसमें तीस लोग काम कर सकें।
गांधी जी खेती, बढ़ईगिरी और मोची के औज़ारों का विस्तृत ब्योरा देते हैं। खेती के लिए कुदालियाँ, फावड़े और खुरपे चाहिए। बढ़ईगिरी के लिए हथौड़े, बसूले, छेनियाँ, रंदे, आरियाँ और संड़ासियाँ चाहिए। इनके अलावा मोची के औज़ार भी चाहिए। गांधी जी अनुमान लगाते हैं कि इन सब पर कुल पाँच रुपये का खर्च आएगा, जबकि रसोई के आवश्यक सामान पर एक सौ पचास रुपये खर्च होंगे।
गांधी जी खाने के खर्च का भी अनुमान लगाते हैं। वे प्रति व्यक्ति दस रुपये मासिक खाने का खर्च लगाते हैं। उनका अनुमान है कि वर्ष में औसतन पचास लोगों का खाने का खर्च छह हज़ार रुपये आएगा, जो पहले वर्ष में निकालना कठिन होगा। वे यह भी सुझाव देते हैं कि यदि अहमदाबाद की जनता या सरकार पूरे आश्रम के एक वर्ष के खर्च का बोझ उठाए तो आश्रम की स्थापना आसान हो जाएगी। वे बताते हैं कि उन्होंने यह अनुमान जल्दी में तैयार किया है, इसलिए कुछ मदें छूट भी सकती हैं। इस प्रकार पाठ में गांधी जी की योजना-निर्माण की क्षमता और मितव्ययिता स्पष्ट झलकती है।
पाठ का मूलभाव सादगी, मितव्ययिता और योजना-निर्माण का महत्व है। गांधी जी दिखाते हैं कि किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले उसकी पूरी योजना बनानी चाहिए और उसका हिसाब-किताब तैयार करना चाहिए। उन्होंने आश्रम के हर छोटे-बड़े सामान का अनुमान लगाया — सुई से लेकर बैलगाड़ी तक। यह उनकी सूक्ष्म सोच और ज़िम्मेदारी का प्रमाण है।
पाठ का संदेश है कि हमें अपने जीवन में मितव्ययिता अपनानी चाहिए। गांधी जी सादा जीवन और ऊँचे विचार में विश्वास करते थे। आश्रम के खर्च का अनुमान लगाते समय उन्होंने अनावश्यक खर्च से बचने की कोशिश की। यह हमें सिखाता है कि हमें अपनी आय के अनुसार खर्च करना चाहिए, फिज़ूलखर्ची से बचना चाहिए और हर पैसे का सदुपयोग करना चाहिए।
पाठ का एक और महत्वपूर्ण संदेश है पारदर्शिता और ईमानदारी। गांधी जी ने आश्रम के खर्च का हिसाब खुले तौर पर प्रस्तुत किया और यह भी स्वीकार किया कि जल्दबाज़ी में बनाए अनुमान में कुछ मदें छूट सकती हैं। यह ईमानदारी हमें सिखाती है कि अपने काम में पारदर्शी रहना चाहिए और अपनी गलतियों को स्वीकारना चाहिए। इसी से विश्वास और सम्मान मिलता है।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पाठ का नाम | आश्रम का अनुमानित व्यय |
| लेखक | महात्मा गांधी |
| स्थान | अहमदाबाद (साबरमती आश्रम) |
| विधा | व्यावहारिक निबंध |
| आरंभिक सदस्य | 40 लोग (बाद में 50) |
| मेहमान (औसतन) | प्रति माह 10 |
| ज़मीन | कम से कम 5 एकड़ (खेती) |
| खाने का खर्च | 10 रुपये प्रति व्यक्ति मासिक |
| मूलभाव | सादगी, मितव्ययिता, योजना |
| आवश्यकता | विवरण |
|---|---|
| रसोईघर | 3 |
| मकान का क्षेत्रफल | 50,000 वर्ग फुट |
| पुस्तकालय | कम से कम 3,000 पुस्तकें |
| खेती की ज़मीन | कम से कम 5 एकड़ |
| औज़ार | खेती, बढ़ईगिरी, मोची के औज़ार |
| वाहन | बैलगाड़ी (स्टेशन से सामान लाने के लिए) |
| भाव | पाठ में चित्रण |
|---|---|
| सादगी | सादा जीवन, आवश्यक सामान ही |
| मितव्ययिता | हर मद का अनुमान और नियंत्रण |
| योजना | काम से पहले ब्यौरा तैयार करना |
| पारदर्शिता | हिसाब खुले तौर पर रखना |
"आश्रम का अनुमानित व्यय" पाठ हमें योजना, सादगी और मितव्ययिता की महत्वपूर्ण शिक्षा देता है। महात्मा गांधी ने इस पाठ में दिखाया है कि किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले उसकी हर छोटी-बड़ी आवश्यकता का अनुमान लगाना कितना आवश्यक है। उनकी यह सूक्ष्म सोच, ईमानदारी और पारदर्शिता हमें सिखाती है कि जीवन में आय और व्यय का संतुलन बनाए रखना चाहिए। सादा जीवन और ऊँचे विचार का यह सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह पाठ विद्यार्थियों में ज़िम्मेदारी, सोच-समझकर काम करने और आत्मनिर्भरता के गुणों का विकास करता है।