"दादी माँ" कक्षा सात की पुस्तक वसंत भाग-दो का दूसरा पाठ है। यह एक मार्मिक और भावनात्मक कहानी है, जिसमें लेखक ने अपने बचपन की मीठी और दर्दभरी यादों को सँजोया है। कहानी दादी माँ के अपार स्नेह, त्याग और बलिदान को प्रस्तुत करती है। लेखक का बचपन दादी माँ की गोद में बीता, क्योंकि उनके माता-पिता पढ़ाई के कारण दूर रहते थे। दादी माँ ने ही लेखक को पाला-पोसा, खिलाया-पिलाया और उसकी पढ़ाई का भी बंदोबस्त किया।
कहानी का सबसे हृदयस्पर्शी पहलू यह है कि जब लेखक पिता के साथ शहर चला गया और अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गया, तो वह दादी माँ से दूर होता गया। दादी माँ बुज़ुर्ग हो रही थीं, पर लेखक के पास उनकी सेवा करने का समय नहीं था। जब दादी माँ की मृत्यु का समाचार मिला, तो लेखक के मन में पछतावा और आत्मग्लानि उमड़ आई। इस कहानी के माध्यम से लेखक यह संदेश देना चाहते हैं कि हमें अपने बुज़ुर्गों का सम्मान करना चाहिए और उनकी सेवा का अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।
कहानी की भाषा सरल, प्रवाहमयी और भावनात्मक है। इसमें बचपन की स्मृतियों का ऐसा जीवंत चित्रण है कि पाठक स्वयं को उसी परिवेश में महसूस करने लगता है। दादी माँ का रूप, उनका प्रेम और उनका संघर्ष हर पाठक के हृदय को छू जाता है।
इस कहानी के लेखक शिवप्रसाद सिंह हैं, जो अपने साहित्यिक नाम शिवा से विख्यात हैं। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में सन् 1928 के आसपास हुआ था। वे हिंदी के लोकप्रिय कहानीकार और उपन्यासकार हैं। उनकी कहानियाँ मुख्यतः ग्रामीण जीवन, पारिवारिक रिश्तों और मानवीय भावनाओं पर केंद्रित रहती हैं। उनकी भाषा में क्षेत्रीय बोलियों की मिठास और लोक-संस्कृति की झलक मिलती है।
शिवप्रसाद सिंह की प्रमुख रचनाओं में "कस्बे की मौत", "तितली", "नंगे पाँव", "साँझ ढले" और "पकौड़ी" जैसी रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। उन्हें उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उनकी कहानियों की विशेषता है कि वे सामान्य घटनाओं से गहरे मानवीय सत्य को उजागर करती हैं। "दादी माँ" भी उनकी उसी शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें परिवार और ममता का कोमल चित्रण है।
लेखक अपनी कहानियों में आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग करते हैं, जिससे उनकी रचनाएँ अत्यधिक सजीव और विश्वसनीय लगती हैं। उनका निधन सन् 2004 में हुआ, पर उनकी कहानियाँ आज भी पाठकों के हृदय में जीवित हैं।
कहानी की शुरुआत लेखक के बचपन की यादों से होती है। लेखक बताते हैं कि जब वे केवल दो वर्ष के थे, तब उनके माता-पिता उन्हें दादी माँ के पास छोड़कर शहर चले गए थे। तब से लेखक का पालन-पोषण दादी माँ ने ही किया। दादी माँ उन्हें रात में नहलातीं, खाना खिलातीं और कहानियाँ सुनाकर सुलाती थीं। बारिश के दिनों में जब लेखक का स्कूल छूटता था, तो दादी माँ स्वयं उसे लेने आती थीं।
जब लेखक पाँचवीं कक्षा में आया, तो स्कूल में पढ़ाई कठिन हो गई। दादी माँ ने स्वयं पढ़ना सीखा ताकि वे लेखक को पढ़ा सकें। उन्होंने रात-रात भर जागकर लेखक को सिखाया। दादी माँ की इस मेहनत और त्याग का लेखक पर गहरा प्रभाव पड़ा। लेखक की पढ़ाई में उन्नति हुई और दादी माँ बहुत प्रसन्न थीं।
कुछ समय बाद लेखक के पिता उसे लेने आए, क्योंकि उनकी नौकरी बदल गई थी। लेखक दादी माँ से दूर शहर चला गया। शहर में नई पढ़ाई, नए दोस्तों और नई ज़िंदगी में लेखक दादी माँ को भूलता गया। माँ-पिता के साथ रहते हुए उसे धीरे-धीरे दादी माँ की सेवा करने का समय ही नहीं मिला। कहानी के अंत में दादी माँ की मृत्यु का समाचार आता है। लेखक का मन पछतावे से भर जाता है कि उसने दादी माँ के प्रेम का बदला नहीं चुकाया और उनकी सेवा का अवसर गँवा दिया।
कहानी का मुख्य संदेश है कि हमें अपने बुज़ुर्गों का आदर और प्रेम करना चाहिए। जो हमें पालता है, उसका हम पर सबसे बड़ा उपकार होता है। सेवा का अवसर मिले तो उसे गँवाना नहीं चाहिए, क्योंकि वह समय लौटकर नहीं आता।
कहानी का मूलभाव दादी माँ के अपार स्नेह, त्याग और बलिदान का चित्रण है। लेखक दिखाते हैं कि दादी माँ ने बिना किसी स्वार्थ के अपने पोते के लिए सब कुछ किया — उसका पालन, पोषण और शिक्षा। दादी माँ ने पोते की पढ़ाई के लिए स्वयं अक्षर सीखे, जो उनके त्याग और प्रेम की पराकाष्ठा है। यह दर्शाता है कि माँ के समान ही दादी माँ का स्नेह भी निःस्वार्थ और महान होता है।
कहानी का संदेश है कि बुज़ुर्गों की सेवा करना हमारा कर्तव्य है। लेखक को पछतावा है कि पिता के साथ शहर चलकर वे दादी माँ से दूर हो गए और उनकी सेवा नहीं कर सके। यह पछतावा हमें यह सिखाता है कि जब तक मौका मिले, अपनों की सेवा करनी चाहिए। बाद में पछताने से कुछ नहीं मिलता।
कहानी का एक और महत्वपूर्ण संदेश यह है कि पारिवारिक रिश्तों में दूरी नहीं आने देनी चाहिए। शहर और पढ़ाई की व्यस्तता के कारण लेखक धीरे-धीरे दादी माँ से दूर होता गया। यह बताता है कि जीवन की व्यस्तता में हमें अपने बुज़ुर्गों और रिश्तेदारों के साथ समय बिताना चाहिए, क्योंकि यही जीवन के सच्चे सुख हैं।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पाठ का नाम | दादी माँ |
| लेखक | शिवप्रसाद सिंह (शिवा) |
| विधा | कहानी (संस्मरणात्मक) |
| मुख्य पात्र | लेखक (पोता) और दादी माँ |
| कहानी का विषय | दादी माँ का स्नेह, त्याग और बलिदान |
| मूलभाव | बुज़ुर्गों की सेवा ही सच्चा कर्तव्य है |
| संदेश | अपनों से दूर न हों, सेवा का अवसर न गँवाएँ |
| गुण | उदाहरण (कार्य) |
|---|---|
| स्नेह | पोते को रात में नहलाना और खिलाना |
| त्याग | अपना समय पोते की देखभाल में लगाना |
| लगन | पोते को पढ़ाने के लिए स्वयं पढ़ना सीखना |
| धैर्य | बारिश में पोते को लेने स्कूल जाना |
| निःस्वार्थ प्रेम | बिना किसी प्रत्युपकार की चाह के सब कुछ करना |
| भाव | कहानी में चित्रण |
|---|---|
| ममता | दादी माँ का पोते के प्रति अगाध प्रेम |
| त्याग | पोते के लिए स्वयं अक्षर सीखना |
| पछतावा | दादी माँ की मृत्यु पर सेवा न कर पाने का दुख |
| कर्तव्य | बुज़ुर्गों की सेवा करना सीखना |
"दादी माँ" कहानी हमें सिखाती है कि पारिवारिक रिश्तों और बुज़ुर्गों का सम्मान ही जीवन का सच्चा आधार है। शिवप्रसाद सिंह ने अपनी इस कहानी में दादी माँ के स्नेह, त्याग और बलिदान का ऐसा मार्मिक चित्रण किया है कि हर पाठक की आँखें भर आती हैं। कहानी का अंत हमें यह सिखाता है कि सेवा का अवसर मिलने पर उसे टालना नहीं चाहिए, क्योंकि एक बार बीत जाने पर वह कभी लौटकर नहीं आता। दादी माँ जैसे प्रेम और त्याग से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हम अपने परिवार के बुज़ुर्गों का हमेशा आदर करें और उनके जीवन को सुखद बनाएँ।