"कंचा" कक्षा सात की पुस्तक वसंत भाग-दो का बारहवाँ पाठ है। यह शरद जोशी द्वारा लिखा गया एक व्यंग्यात्मक-संस्मरणात्मक निबंध है। इस निबंध में लेखक अपने बचपन की एक प्रिय स्मृति - कंचों के खेल - का वर्णन करते हैं। कंचा एक छोटा-सा काँच का गोला होता है, जिसे बच्चे खेलते थे। लेखक के बचपन में कंचा खेलना बच्चों का सबसे लोकप्रिय खेल था। लेकिन आज के बच्चों की दुनिया से यह खेल गायब हो गया है। इसी अंतर को दिखाते हुए लेखक पुरानी और नई पीढ़ी के जीवन-मूल्यों पर व्यंग्य करते हैं।
इस निबंध में लेखक ने कंचों के खेल की पूरी दुनिया को सजीव कर दिया है। कंचे के प्रकार, उनके मोल, खेलने के तरीके, जीतने-हारने का हिसाब - सब कुछ उन्होंने बड़ी रोचकता से वर्णित किया है। उनके बचपन में कंचे खरीदने के लिए पैसे की जुगाड़, नीम के पेड़ के नीचे खेलने का आनंद और जीते हुए कंचों का मूल्य - ये सारी यादें पाठक को भी अपने बचपन में ले जाती हैं।
निबंध का व्यंग्य इस बात पर है कि आज के बच्चों के पास महँगे खिलौने तो हैं, पर उनमें वह खुशी नहीं है जो कंचों के खेल में थी। लेखक यह दिखाना चाहते हैं कि सच्चा आनंद वस्तुओं के मोल में नहीं, बल्कि खेलने के आनंद और मेहनत से मिली वस्तु में होता है। यह निबंध बचपन की मासूमियत और उसके खो जाने की पीड़ा को व्यक्त करता है।
इस निबंध के लेखक शरद जोशी हैं। उनका जन्म सन् 1931 में उज्जैन में हुआ था। वे हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्य-लेखक, नाटककार और संपादक थे। उनकी लेखनी में समाज, राजनीति और जीवन की विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य है, साथ ही मानवीय संवेदनाओं का गहरा चित्रण भी। उनकी रचनाओं में हास्य और गंभीरता का अद्भुत संतुलन है।
शरद जोशी की प्रमुख रचनाओं में "मेरा उपन्यास", "बातचीत", "लक्ष्य", "एक सच्चा घर" और "सादी जिंदगी की गाड़ी" जैसी रचनाएँ शामिल हैं। वे अपने व्यंग्य निबंधों के लिए विशेष रूप से लोकप्रिय हैं। उनकी लेखनी ने दूरदर्शन के लोकप्रिय धारावाहिक "मुंगेरीलाल के हसीन सपने" के लिए भी पटकथाएँ लिखीं। उन्हें पद्मश्री सहित अनेक सम्मान मिले। उनका निधन सन् 1991 में हुआ।
शरद जोशी की लेखन-शैली की विशेषता यह है कि वे सामान्य विषय से शुरू करके समाज की गहरी सच्चाइयों तक पहुँचते हैं। "कंचा" में उन्होंने एक बच्चों के खेल के माध्यम से पीढ़ियों के बीच बदलते जीवन-मूल्यों पर गहरा व्यंग्य किया है। उनका हास्य कभी अपमानजनक नहीं होता, बल्कि सोचने पर मजबूर करता है।
निबंध की शुरुआत में लेखक अपने बचपन में कंचों के खेल की चर्चा करते हैं। वे बताते हैं कि उनके समय में कंचा बच्चों का सबसे महत्वपूर्ण खेल था। हर बच्चे की जेब में कंचों का एक थैला होता था। कंचे अलग-अलग रंगों और आकारों के होते थे - कुछ बड़े, कुछ छोटे, कुछ पारदर्शी और कुछ रंगीन। हर कंचे का अपना मोल होता था। कुछ कंचे इतने दुर्लभ होते थे कि उन्हें "लाल" या "नीला" जैसे खास नामों से पुकारा जाता था।
लेखक कंचों के खेल के नियम बताते हैं। बच्चे ज़मीन पर एक गड्ढा खोदते थे और उसमें कंचे डालकर खेलते थे। जो बच्चा अपने कंचे से दूसरे बच्चे के कंचे को छूकर गड्ढे से बाहर निकालता था, वह उस कंचे को जीत लेता था। इस खेल में कौशल और निशाने की सटीकता की ज़रूरत होती थी। लेखक को इस खेल में काफी दक्षता हासिल थी, इसलिए उनकी जेब में हमेशा ढेर सारे कंचे रहते थे।
लेखक बताते हैं कि कंचे खरीदने के लिए उन्हें अपनी मेहनत से पैसे जोड़ने पड़ते थे। कभी वे घर के छोटे-मोटे काम करके पैसे कमाते थे, तो कभी अपनी पुरानी चीज़ें बेचकर। मेहनत से जोड़े गए पैसों से खरीदे गए कंचों का मोल उनके लिए बहुत बड़ा होता था। कंचे खो जाने पर या हार जाने पर उन्हें बहुत दुख होता था।
निबंध के अंत में लेखक वर्तमान समय की ओर मुड़ते हैं और बताते हैं कि आज के बच्चे कंचे नहीं खेलते। उनके पास महँगे खिलौने, वीडियो गेम और कंप्यूटर हैं, पर कंचों जैसे खेल का आनंद उन्हें कहाँ? लेखक इस बदलाव पर व्यंग्य करते हैं कि आज की पीढ़ी ने खेलों की सादगी और उनमें छिपा आनंद खो दिया है। इस प्रकार यह निबंध बचपन की यादों और बदलते समय का सुंदर चित्रण है।
निबंध का मूलभाव बचपन की मासूमियत और बदलते जीवन-मूल्यों पर व्यंग्य है। लेखक दिखाते हैं कि उनके बचपन के कंचों जैसे साधारण खेलों में कितना आनंद और सीख थी। मेहनत से जोड़े पैसों से खरीदा गया कंचा बच्चे को मेहनत, संयम और मूल्यों की समझ सिखाता था। आज के महँगे खिलौनों में वह सब नहीं है। लेखक यह दिखाना चाहते हैं कि सच्ची खुशी साधारण चीज़ों में होती है।
निबंध का संदेश है कि हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत और खेलों की सादगी को नहीं भूलना चाहिए। कंचा जैसा खेल न केवल मनोरंजन था, बल्कि उससे कौशल, मेहनत और ईमानदारी की शिक्षा मिलती थी। लेखक यह सुझाव देते हैं कि आज के बच्चों को भी ऐसे पारंपरिक खेल खेलने चाहिए, जिनसे उनमें शारीरिक और मानसिक विकास हो और वे प्रकृति व दोस्तों के साथ समय बिताएँ।
निबंध का एक और महत्वपूर्ण संदेश है कि जीवन में वस्तुओं का मोल नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी भावनाएँ महत्वपूर्ण होती हैं। लेखक के लिए उनका एक साधारण कंचा किसी महँगे खिलौने से अधिक मूल्यवान था, क्योंकि उसमें उसकी मेहनत और आनंद जुड़ा था। यह हमें सिखाता है कि चीज़ों की कीमत उनके दाम से नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी यादों और प्रेम से तय होती है।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पाठ का नाम | कंचा |
| लेखक | शरद जोशी |
| विधा | संस्मरणात्मक व्यंग्य निबंध |
| केंद्रीय विषय | बचपन का कंचा खेल |
| मूलभाव | बचपन की मासूमियत की याद |
| व्यंग्य का लक्ष्य | आधुनिक खिलौनों में आनंद की कमी |
| संदेश | पारंपरिक खेलों और मूल्यों को न भूलो |
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| कंचे के प्रकार | बड़े, छोटे, रंगीन, पारदर्शी |
| खेल की विधि | गड्ढा बनाकर कंचे छूना |
| कौशल | निशाने की सटीकता |
| जीत का नियम | विपक्षी का कंचा गड्ढे से निकालना |
| कंचों का मोल | मेहनत से जुटाए पैसों से खरीदना |
| भाव | निबंध में चित्रण |
|---|---|
| आनंद | साधारण कंचों के खेल में सच्चा सुख |
| मेहनत | पैसों की जुगाड़ और उसकी सीख |
| पुरानी यादें | बचपन की मीठी स्मृतियाँ |
| बदलता समय | आधुनिक खिलौनों में वह खुशी नहीं |
"कंचा" निबंध हमें बचपन की मासूमियत और सरल खेलों के महत्व की याद दिलाता है। शरद जोशी ने कंचों के खेल के माध्यम से यह दिखाया है कि सच्चा आनंद महँगी चीज़ों में नहीं, बल्कि मेहनत से मिली चीज़ों और दोस्तों के साथ बिताए समय में होता है। यह निबंध हमें सिखाता है कि हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक खेलों और जीवन के सरल मूल्यों को नहीं भूलना चाहिए। आज के तकनीकी युग में यह निबंध विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि यह हमें खेल, मेहनत और मानवीय रिश्तों के सच्चे आनंद की ओर ले जाता है।