"खानपान की बदलती तस्वीर" कक्षा सात की पुस्तक वसंत भाग-दो का चौदहवाँ पाठ है। यह एक विचारोत्तेजक निबंध है, जिसमें लेखक ने हमारे देश में बदलती खान-पान की आदतों का वर्णन किया है। निबंध में बताया गया है कि पहले के समय में लोग घर का बना सादा और पौष्टिक भोजन करते थे, जिसमें ज्वार, बाजरा, मक्का, दाल और सब्ज़ियाँ शामिल थीं। लेकिन आज के समय में लोग फास्ट फूड, बर्गर, पिज़्ज़ा, नूडल्स और कोल्ड ड्रिंक्स को अधिक पसंद करने लगे हैं। यह बदलाव हमारे स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बन गया है।
इस निबंध में लेखक ने खानपान की बदलती तस्वीर के कारणों और उसके परिणामों पर चर्चा की है। पहले के भोजन में शुद्धता और पौष्टिकता होती थी, जबकि आज का भोजन अधिक तला-भुना, मीठा और मिलावटी हो गया है। इसके कारण मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और अन्य बीमारियाँ बढ़ रही हैं। लेखक चाहते हैं कि हम अपने पारंपरिक और स्वस्थ भोजन की ओर लौटें।
यह निबंध विद्यार्थियों को स्वस्थ भोजन के महत्व को समझाता है। यह हमें सिखाता है कि भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर को पोषण देने के लिए होता है। हमें अपने खानपान में संतुलन बनाए रखना चाहिए और मिलावटी तथा अस्वस्थ भोजन से बचना चाहिए। इसी कारण यह निबंध आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है।
इस निबंध के लेखक लीलाधर मंडलोई हैं। उनका जन्म सन् 1942 में मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में हुआ था। वे हिंदी के प्रसिद्ध लेखक, कवि और पत्रकार हैं। उनकी लेखनी में आम जन-जीवन, संस्कृति, सामाजिक समस्याओं और बदलते समय के प्रभावों का गहरा चित्रण मिलता है। वे अपनी सरल और सजीव लेखनी से पाठकों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
लीलाधर मंडलोई की प्रमुख रचनाओं में "एक पेड़ सबूत है", "कितनी मानवीय है दूसरी दुनिया", "जो देश में हो रहा है" जैसे निबंध-संग्रह शामिल हैं। वे हिंदी साहित्य में अपने स्तंभों और निबंधों के लिए जाने जाते हैं। उनकी लेखनी में ग्रामीण जीवन की सादगी और उसकी संस्कृति के प्रति गहरा प्रेम दिखाई देता है। उन्होंने अपने लेखों में पर्यावरण, संस्कृति और सामाजिक चेतना के विषयों को स्थान दिया है।
लेखक की लेखन-शैली की विशेषता है कि वे अपने अनुभवों और सामान्य जीवन की घटनाओं से गहरे सामाजिक सवाल उठाते हैं। "खानपान की बदलती तस्वीर" में भी उन्होंने हमारी बदलती जीवनशैली और खान-पान की आदतों के माध्यम से स्वास्थ्य और संस्कृति से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।
निबंध की शुरुआत में लेखक अपने बचपन की खान-पान की यादों का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि पहले के समय में घर में ज्वार, बाजरा, मक्का की रोटी और दाल-सब्ज़ी बनती थी। भोजन सादा होता था, पर पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होता था। घर का बना खाना शुद्ध और सुरक्षित होता था। लोग अपने क्षेत्र के मौसमी अनाज और सब्ज़ियों का उपयोग करते थे।
लेखक आगे बताते हैं कि आज के समय में यह तस्वीर बदल गई है। आज के बच्चे और युवा बर्गर, पिज़्ज़ा, नूडल्स, चाउमीन और कोल्ड ड्रिंक्स को अधिक पसंद करते हैं। फास्ट फूड की दुकानें हर मोहल्ले में खुल गई हैं। लोग घर का खाना छोड़कर बाहर का खाना पसंद करने लगे हैं। विदेशी व्यंजनों का चलन बढ़ गया है। यह बदलाव भारत के पारंपरिक खानपान से हटकर है।
इस बदलाव के कारणों पर लेखक चर्चा करते हैं। बाज़ारवाद, विज्ञापन, विदेशी संस्कृति का प्रभाव और शहरी जीवन की भागदौड़ के कारण लोग स्वस्थ भोजन की ओर ध्यान नहीं दे पाते। विज्ञापन फास्ट फूड को आकर्षक तरीके से प्रस्तुत करते हैं, जिससे बच्चे उनकी ओर आकर्षित होते हैं। इसके साथ ही मिलावट की समस्या भी बढ़ी है - खाने की वस्तुओं में मिलावट होने से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
निबंध के अंत में लेखक अपने विचार व्यक्त करते हैं कि हमें अपने पारंपरिक और स्वस्थ भोजन की ओर लौटना चाहिए। संतुलित आहार ही शरीर को स्वस्थ रखता है। हमें मौसमी अनाज, फल-सब्ज़ियाँ और घर का बना भोजन अधिक करना चाहिए। फास्ट फूड और मिलावटी खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए। इस प्रकार निबंध स्वस्थ खानपान की ओर लौटने का संदेश देता है।
निबंध का मूलभाव बदलते खानपान के दुष्प्रभावों और स्वस्थ आहार के महत्व को उजागर करना है। लेखक दिखाते हैं कि हमारे पारंपरिक भोजन की जगह फास्ट फूड और मिलावटी खाद्य पदार्थों ने ले ली है। यह बदलाव हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, क्योंकि इससे मोटापा और कई बीमारियाँ बढ़ रही हैं। लेखक हमें हमारे पौष्टिक और पारंपरिक भोजन की ओर लौटने की सलाह देते हैं।
निबंध का संदेश है कि स्वस्थ भोजन ही स्वस्थ जीवन का आधार है। घर का बना सादा भोजन, मौसमी फल-सब्ज़ियाँ और संतुलित आहार शरीर को आवश्यक पोषण देते हैं। हमें अपने खानपान में संतुलन बनाए रखना चाहिए। फास्ट फूड और जंक फूड का प्रयोग कम से कम करना चाहिए, क्योंकि यह स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाते हैं।
निबंध का एक और महत्वपूर्ण संदेश है कि हमें मिलावट से सावधान रहना चाहिए। आज के समय में खाद्य पदार्थों में मिलावट बढ़ गई है, जो सेहत के लिए हानिकारक है। इसलिए हमें शुद्ध और सुरक्षित भोजन का चयन करना चाहिए। साथ ही हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर - पारंपरिक भोजन - को भी बचाए रखना चाहिए, क्योंकि यही हमारी पहचान और सेहत दोनों का आधार है।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पाठ का नाम | खानपान की बदलती तस्वीर |
| लेखक | लीलाधर मंडलोई |
| विधा | विचारात्मक निबंध |
| केंद्रीय विषय | बदलती खान-पान की आदतें |
| पुराना भोजन | ज्वार-बाजरा, दाल-सब्ज़ी, घर का खाना |
| नया भोजन | बर्गर, पिज़्ज़ा, नूडल्स, कोल्ड ड्रिंक्स |
| मूलभाव | स्वस्थ आहार का महत्व |
| संदेश | पारंपरिक और संतुलित भोजन अपनाओ |
| पहलू | पुराना खानपान | नया खानपान |
|---|---|---|
| भोजन का प्रकार | घर का बना सादा भोजन | फास्ट फूड, बाहर का खाना |
| पौष्टिकता | अधिक पौष्टिक | कम पौष्टिक |
| शुद्धता | शुद्ध और सुरक्षित | मिलावट की संभावना |
| स्वास्थ्य पर प्रभाव | लाभकारी | हानिकारक (मोटापा, बीमारियाँ) |
| भाव | निबंध में चित्रण |
|---|---|
| स्वास्थ्य | संतुलित आहार से शरीर स्वस्थ रहता है |
| पोषण | मौसमी अनाज, फल-सब्ज़ियों का महत्व |
| सावधानी | मिलावट और जंक फूड से बचना |
| संस्कृति | पारंपरिक भोजन हमारी पहचान |
"खानपान की बदलती तस्वीर" निबंध हमें हमारे बदलते खान-पान और उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रति सचेत करता है। लीलाधर मंडलोई ने इस निबंध में दिखाया है कि हमारे पारंपरिक और पौष्टिक भोजन की जगह फास्ट फूड और मिलावटी खाद्य पदार्थों ने ले ली है, जो हमारी सेहत के लिए हानिकारक है। यह निबंध हमें संतुलित आहार, शुद्ध भोजन और अपनी सांस्कृतिक विरासत की ओर लौटने की सीख देता है। स्वस्थ भोजन ही स्वस्थ जीवन का आधार है - यही इस निबंध का शाश्वत संदेश है, जो आज के युवा वर्ग के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है।