"रहीम के दोहे" कक्षा सात की पुस्तक वसंत भाग-दो का ग्यारहवाँ पाठ है। इस पाठ में कवि अब्दुर्रहीम खानखाना के कुछ प्रसिद्ध दोहे संकलित हैं, जो जीवन के व्यावहारिक ज्ञान, नीति और आचरण से संबंधित हैं। रहीम के दोहे सरल भाषा में गहरी बातें कहते हैं। उनके दोहों में प्रेम, नम्रता, मान-सम्मान, परोपकार और जीवन-व्यवहार की शिक्षा मिलती है। ये दोहे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने सैकड़ों वर्ष पहले थे।
रहीम के दोहों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी और सत्यता है। वे कठिन दार्शनिकता से दूर रहकर जीवन के सीधे-सादे सत्य को सरल शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए, वे कहते हैं कि प्रेम का धागा टूटने पर मत फेंको, क्योंकि तुरंत जुड़ने पर भी उसमें गाँठ रह जाती है। यह छोटा-सा दोहा हमें रिश्तों के नाज़ुक पहलू को समझाता है।
इस पाठ का उद्देश्य विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों और अच्छे आचरण का विकास करना है। रहीम के दोहे हमें नम्रता, विनम्रता, परोपकार और बड़ों के प्रति सम्मान की शिक्षा देते हैं। ये दोहे हमारी प्राचीन संस्कृति और जीवन-मूल्यों का अनमोल खजाना हैं।
इन दोहों के रचयिता अब्दुर्रहीम खानखाना हैं। उनका जन्म सन् 1556 में लाहौर में हुआ था। वे मुगल सम्राट अकबर के दरबार के प्रमुख नवरत्नों में से एक थे। उनके पिता बैरम खान अकबर के संरक्षक थे। रहीम को "खानखाना" की उपाधि मिली। वे उर्दू, फारसी और हिंदी तीनों भाषाओं के ज्ञाता थे। हिंदी में उन्होंने जो दोहे लिखे, वे आज भी लोक-जीवन में लोकप्रिय हैं।
रहीम की प्रमुख रचनाओं में "रहीम दोहावली" और "बरवै नायिका भेद" शामिल हैं। उनके दोहे जीवन-दर्शन, नीति और व्यवहार की शिक्षा देते हैं। उनकी दानशीलता के लिए एक प्रसिद्ध कहावत है - "दे दिया रहीमन दीन्हि..." वे अपने जीवन में भी वैसा ही आचरण करते थे जैसा उनके दोहों में कहते हैं। इसीलिए उनके दोहे और उनका जीवन दोनों प्रेरणादायक हैं।
रहीम एक दानी और परोपकारी व्यक्ति थे। उनके दोहों में मानवीय मूल्यों की गहरी समझ झलकती है। वे कहते हैं कि वृक्ष फल और नदी जल वहीं देते हैं जहाँ वे रहते हैं, अर्थात जीवन में परोपकार और सहयोग की भावना होनी चाहिए। उनकी यह सीख आज भी हमारा मार्गदर्शन करती है।
पाठ में रहीम के कुछ चुनिंदा दोहे दिए गए हैं, जिनका आशय इस प्रकार है। पहला दोहा प्रेम के नाज़ुक रिश्ते से संबंधित है। रहीम कहते हैं कि प्रेम का धागा कभी टूटने मत दो। यदि धागा टूट जाए तो चाहे उसे तुरंत ही जोड़ दिया जाए, फिर भी उसकी गाँठ पड़ जाती है। यानी प्रेम के संबंध में एक बार दरार पड़ने पर वह बातों से तो जुड़ सकता है, पर मन में गाँठ रह ही जाती है। इसलिए प्रेम का रिश्ता बचाकर रखना चाहिए।
दूसरे दोहे में रहीम परोपकार की बात करते हैं। वे कहते हैं कि वृक्ष अपने फल कहीं दूर नहीं बल्कि उसी स्थान पर देता है जहाँ वह खड़ा होता है। नदी भी अपना जल उसी स्थान के लोगों को देती है जहाँ वह बहती है। इसका अर्थ यह है कि सज्जन व्यक्ति अपने पास रहने वालों का ही भला करता है और जिसका सामर्थ्य है, वह पहले अपने आस-पास के लोगों की सहायता करता है।
तीसरे दोहे में रहीम नम्रता और सम्मान की शिक्षा देते हैं। वे कहते हैं कि बड़े लोगों के सामने छोटों को अपमानित नहीं करना चाहिए। छोटे लोग अपमान सह लेते हैं, पर बड़ों का आदर-सम्मान बनाए रखना चाहिए। इसी प्रकार पानी के महत्व के दोहे में वे कहते हैं कि बिना पानी के सब कुछ सूना है - बात, मान और गंगा सब पानी के बिना अधूरे हैं, अर्थात नम्रता और मानवता रखने वाला व्यक्ति ही सम्मान पाता है।
पाठ में ऐसे ही अन्य दोहे भी हैं जो जीवन के विभिन्न पक्षों - मान, प्रेम, विनम्रता और परोपकार - पर प्रकाश डालते हैं। रहीम के ये दोहे हमें सिखाते हैं कि जीवन में ऊँचे आचरण, नम्रता और दूसरों के प्रति प्रेम ही सच्ची सफलता है। ये दोहे आज भी हर स्थिति में हमारा मार्गदर्शन करते हैं।
पाठ का मूलभाव जीवन-व्यवहार की नीति और नैतिक मूल्यों की शिक्षा है। रहीम अपने दोहों में प्रेम, नम्रता, परोपकार और मान-सम्मान जैसे गुणों पर बल देते हैं। वे दिखाते हैं कि सुखी और सफल जीवन के लिए केवल धन-संपत्ति नहीं, बल्कि अच्छे आचरण और दूसरों के प्रति सद्भाव आवश्यक है। रहीम के दोहे जीवन का सच्चा दर्शन प्रस्तुत करते हैं।
पाठ का संदेश है कि प्रेम और रिश्तों की रक्षा करनी चाहिए। प्रेम का धागा टूटने पर चाहे जुड़ जाए, पर उसकी गाँठ मन में रह जाती है। इसलिए हमें अपने रिश्तों में कभी ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे प्रेम को ठेस पहुँचे। साथ ही, हमें अपने आस-पास के लोगों का भला करना चाहिए, क्योंकि परोपकार ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
पाठ का एक और महत्वपूर्ण संदेश है नम्रता और विनम्रता का महत्व। रहीम कहते हैं कि जो व्यक्ति नम्र और मानवीय होता है, वही समाज में सम्मान पाता है। बड़ों का आदर और छोटों के प्रति स्नेह ही अच्छे व्यक्ति की पहचान है। इन दोहों का उद्देश्य विद्यार्थियों में अच्छे संस्कार और मूल्यों का विकास करना है।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पाठ का नाम | रहीम के दोहे |
| कवि | अब्दुर्रहीम खानखाना |
| विधा | दोहे (नीति-काव्य) |
| कवि की पहचान | मुगल दरबार के नवरत्न, दानवीर |
| मुख्य विषय | जीवन-व्यवहार, प्रेम, नम्रता, परोपकार |
| मूलभाव | नैतिक मूल्यों की शिक्षा |
| संदेश | प्रेम बचाओ, परोपकार करो, नम्र रहो |
| प्रतीक | अर्थ |
|---|---|
| प्रेम का धागा | नाज़ुक रिश्ता |
| गाँठ | मन में पड़ी दरार |
| वृक्ष/नदी | परोपकारी व्यक्ति |
| पानी | नम्रता, मानवता, मान |
| भाव | दोहे में शिक्षा |
|---|---|
| प्रेम-रक्षा | प्रेम का धागा टूटने मत दो |
| परोपकार | अपने आस-पास के लोगों की सहायता करो |
| नम्रता | विनम्र व्यक्ति ही सम्मान पाता है |
| आदर-सम्मान | बड़ों का आदर करो |
"रहीम के दोहे" पाठ हमें जीवन जीने की सच्ची कला सिखाता है। अब्दुर्रहीम खानखाना ने अपने सरल दोहों में प्रेम, नम्रता, परोपकार और मान-सम्मान जैसे जीवन-मूल्यों को इस सुंदरता से प्रस्तुत किया है कि वे सैकड़ों वर्षों बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं। ये दोहे हमें सिखाते हैं कि प्रेम के रिश्ते को संभालकर रखना चाहिए, परोपकार करना चाहिए और विनम्र रहकर ही सम्मान पाना चाहिए। रहीम के ये दोहे हमारी सांस्कृतिक धरोहर का अनमोल हिस्सा हैं, जो विद्यार्थियों में अच्छे संस्कार और नैतिक मूल्यों का विकास करते हैं।