जब दो आकृतियाँ आकार और माप में हूबहू एक जैसी होती हैं, तो उन्हें सर्वांगसम (Congruent) आकृतियाँ कहते हैं। यदि एक आकृति को काटकर दूसरी के ऊपर रखा जाए और वे बिल्कुल ढक जाएँ, तो वे सर्वांगसम होती हैं। ज्यामिति में सर्वांगसमता का अध्ययन त्रिभुजों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि त्रिभुजों की सर्वांगसमता से ही अनेक गुणधर्म सिद्ध किए जाते हैं। इस अध्याय में हम सर्वांगसम आकृतियों की पहचान, सर्वांगसम त्रिभुजों के नियम (SSS, SAS, ASA, RHS) और सर्वांगसमता का प्रयोग सीखेंगे। सर्वांगसमता का चिह्न '≅' है। दो सर्वांगसम त्रिभुजों में संगत भुजाएँ और संगत कोण बराबर होते हैं।
दो आकृतियाँ सर्वांगसम होती हैं यदि एक आकृति को खिसकाकर (Sliding), घुमाकर (Rotation) या पलटकर (Flipping) दूसरी आकृति के ऊपर रखने पर वे बिल्कुल ढक जाती हैं। इन तीन संक्रियाओं से आकृति का आकार और माप नहीं बदलता। दो समान लंबाई वाले रेखाखंड सर्वांगसम होते हैं, और दो समान माप वाले कोण सर्वांगसम होते हैं। वृत्त, वर्ग, आयत जैसी आकृतियाँ भी सर्वांगसम हो सकती हैं, बशर्ते उनके आकार और माप समान हों।
यदि $\triangle ABC \cong \triangle DEF$ है, तो: - $\angle A = \angle D$, $\angle B = \angle E$, $\angle C = \angle F$ (संगत कोण बराबर) - $AB = DE$, $BC = EF$, $CA = FD$ (संगत भुजाएँ बराबर)
सर्वांगसमता लिखते समय शीर्षों का क्रम महत्वपूर्ण होता है। $\triangle ABC \cong \triangle DEF$ लिखने का अर्थ है कि A की संगतता D से, B की E से और C की F से है। इस क्रम को सही लिखना अनिवार्य है।
किसी त्रिभुज की सर्वांगसमता सिद्ध करने के लिए हमें सभी छह (तीन भुजाएँ और तीन कोण) मापों की आवश्यकता नहीं होती; केवल कुछ निश्चित शर्तें ही पर्याप्त होती हैं।
यदि एक त्रिभुज की तीनों भुजाएँ दूसरे त्रिभुज की तीनों संगत भुजाओं के बराबर हों, तो त्रिभुज सर्वांगसम होते हैं। उदाहरण: $AB = DE$, $BC = EF$, $CA = FD$।
यदि एक त्रिभुज की दो भुजाएँ और उनके बीच का कोण दूसरे त्रिभुज की संगत दो भुजाओं और उनके बीच के कोण के बराबर हों, तो त्रिभुज सर्वांगसम होते हैं। उदाहरण: $AB = DE$, $\angle B = \angle E$, $BC = EF$। ध्यान दें कि कोण दोनों भुजाओं के बीच में होना चाहिए।
यदि एक त्रिभुज के दो कोण और उनके बीच की भुजा दूसरे त्रिभुज के संगत दो कोणों और उनके बीच की भुजा के बराबर हों, तो त्रिभुज सर्वांगसम होते हैं। उदाहरण: $\angle B = \angle E$, $BC = EF$, $\angle C = \angle F$।
समकोण त्रिभुजों के लिए: यदि दो समकोण त्रिभुजों में कर्ण और एक भुजा क्रमशः बराबर हों, तो त्रिभुज सर्वांगसम होते हैं। यह नियम केवल समकोण त्रिभुजों पर लागू होता है।
AAA नियम सर्वांगसमता के लिए मान्य नहीं है। यदि दो त्रिभुजों के सभी संगत कोण बराबर हों, तो त्रिभुज समरूप (Similar) होते हैं, सर्वांगसम नहीं। उदाहरण के लिए, दो अलग-अलग आकार के समबाहु त्रिभुजों के सभी कोण $60°$ होते हैं, परंतु वे सर्वांगसम नहीं होते। इसी प्रकार, SSA (भुजा-भुजा-कोण) भी सर्वांगसमता का मान्य नियम नहीं है।
सर्वांगसमता का उपयोग करके हम कई ज्यामितीय गुण सिद्ध कर सकते हैं: - यदि एक त्रिभुज की दो भुजाएँ बराबर हों (समद्विबाहु त्रिभुज), तो उनके सामने के कोण बराबर होते हैं। - यदि एक त्रिभुज के दो कोण बराबर हों, तो उनके सामने की भुजाएँ बराबर होती हैं। - समांतर चतुर्भुज के विकर्ण परस्पर समद्विभाजित करते हैं (इसे सर्वांगसम त्रिभुजों द्वारा सिद्ध किया जा सकता है)।
उदाहरण के लिए, सिद्ध करना कि समद्विबाहु त्रिभुज में आधार कोण बराबर होते हैं, इसके लिए शीर्ष से आधार पर माध्यिका खींचकर दो त्रिभुजों की SSS सर्वांगसमता सिद्ध की जाती है, और फिर संगत कोणों की समानता प्राप्त होती है।
सर्वांगसमता के प्रश्नों में दिए गए चित्र या सूचना के अनुसार उचित नियम पहचानना होता है। यदि तीन भुजाएँ दी हुई हैं, तो SSS; यदि दो भुजाएँ और बीच का कोण, तो SAS; यदि दो कोण और बीच की भुजा, तो ASA; और यदि समकोण त्रिभुज में कर्ण और एक भुजा, तो RHS लागू होता है। सर्वांगसम त्रिभुजों में संगत भागों की पहचान करके अज्ञात भुजाएँ और कोण ज्ञात किए जाते हैं। शीर्षों का क्रम देखकर संगत भुजाओं का निर्धारण किया जाता है।
| नियम | आवश्यक शर्त | प्रतीक |
|---|---|---|
| SSS | तीनों भुजाएँ बराबर | भुजा-भुजा-भुजा |
| SAS | दो भुजाएँ + बीच का कोण | भुजा-कोण-भुजा |
| ASA | दो कोण + बीच की भुजा | कोण-भुजा-कोण |
| RHS | समकोण + कर्ण + एक भुजा | समकोण-कर्ण-भुजा |
| AAA | केवल समरूपता, सर्वांगसमता नहीं | लागू नहीं |
| संगत कोण | संगत भुजा |
|---|---|
| ∠A = ∠D | AB = DE |
| ∠B = ∠E | BC = EF |
| ∠C = ∠F | CA = FD |
सर्वांगसमता यह सुनिश्चित करती है कि दो आकृतियाँ या त्रिभुज आकार और माप में पूर्णतः एक जैसी हैं। त्रिभुजों की सर्वांगसमता के चार मान्य नियम (SSS, SAS, ASA, RHS) हमें केवल कुछ शर्तों के आधार पर सर्वांगसमता सिद्ध करने की क्षमता देते हैं। यह अवधारणा ज्यामितीय गुणों को सिद्ध करने का आधार है। सर्वांगसमता की दृढ़ समझ आगे के अध्यायों में सममिति और ठोस आकृतियों के अध्ययन में सहायक होती है।