श्रीमद्भगवद्गीता हमारे धर्मग्रंथों में सबसे प्रिय और सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। 'गीता' शब्द का अर्थ है 'गाया हुआ' अर्थात् भगवान द्वारा कहा हुआ गीत। यह महाभारत का एक अंग है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय जब अर्जुन युद्ध करने से मना कर रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उपदेश दिया। यही उपदेश गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गीता में अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं। गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। इसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग - इन तीन मार्गों का वर्णन है। गीता का मूल संदेश है - कर्तव्य का पालन करो, फल की चिंता मत करो। यह पाठ गीता के अर्थ अर्थात् उसके मूल संदेश को सरल भाषा में समझाता है। गीता हमें सिखाती है कि मनुष्य को सदैव अपना कर्तव्य करना चाहिए और जीवन में निराशा कभी नहीं लानी चाहिए।
संस्कृत पाठ: श्रीमद्भगवद्गीता महाभारतस्य अन्तर्गता पवित्रा पुस्तकम् अस्ति। अस्यां ग्रन्थे अष्टादश अध्यायाः सन्ति, सप्तशतानि श्लोकाः च सन्ति।
हिंदी अर्थ: श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के अंतर्गत एक पवित्र ग्रंथ है। इस ग्रंथ में अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं। गीता हमारे प्राचीन ज्ञान का अमूल्य रत्न है जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
संस्कृत पाठ: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
हिंदी अर्थ: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फलों में कभी नहीं। तू कर्म के फल का हेतु (आधार) मत बन और तेरा कर्म न करने में आसक्ति न हो। यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक (2.47) है। इसका अर्थ है कि हमें अपने कर्तव्य का पालन पूरी लगन से करना चाहिए, परन्तु फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।
संस्कृत पाठ: योगः कर्मसु कौशलम्।
हिंदी अर्थ: योग कर्म में कुशलता (निपुणता) है। गीता के अनुसार सच्चा योगी वह है जो अपने कर्म को पूर्णता और कुशलता से करता है। केवल आसन-प्राणायाम ही योग नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य में निपुणता भी योग है।
संस्कृत पाठ: सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।
हिंदी अर्थ: सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर युद्ध के लिए तैयार हो जा, ऐसा करने से तुझे पाप की प्राप्ति नहीं होगी। इस श्लोक में गीता सिखाती है कि मनुष्य को सुख-दुःख में समान रहना चाहिए। सफलता और असफलता में समभाव रखना ही सच्चा साहस है।
संस्कृत पाठ: गीतायां त्रयः मार्गाः वर्णिताः सन्ति - कर्मयोगः, ज्ञानयोगः, भक्तियोगः च। कर्मयोगेण कर्म कुर्वन्, ज्ञानयोगेण आत्मानं जानन्, भक्तियोगेण भगवन्तं प्रति भक्तिं कुर्वन् मनुष्यः मुक्तिं प्राप्नोति।
हिंदी अर्थ: गीता में तीन मार्ग बताए गए हैं - कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। कर्मयोग से कर्म करके, ज्ञानयोग से आत्मा को जानकर और भक्तियोग से भगवान के प्रति भक्ति करके मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है। ये तीनों मार्ग एक-दूसरे के पूरक हैं।
संस्कृत पाठ: कुरुक्षेत्रे युद्धे अर्जुनः निराशः सन् अवदत् - अहं युद्धं न करिष्यामि। तदा भगवान् श्रीकृष्णः अवदत् - हे अर्जुन! निराशा मा कुरु। कर्तव्यं पालय। मम उपदेशं शृणु।
हिंदी अर्थ: कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन निराश होकर बोले - मैं युद्ध नहीं करूँगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - हे अर्जुन! निराशा मत करो। कर्तव्य का पालन करो। मेरा उपदेश सुनो। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन और धर्म का गूढ़ ज्ञान दिया।
संस्कृत पाठ: गीतायाः सन्देशः अस्ति - कर्तव्यं कुरु, फलं न चिन्तय। धैर्यं धारय, निराशां त्यज। सत्यं वद, शुभं कुरु। एवं जीवनं सार्थकं भवति।
हिंदी अर्थ: गीता का संदेश है - कर्तव्य करो, फल की चिंता मत करो। धैर्य धारण करो, निराशा छोड़ो। सत्य बोलो, शुभ करो। इस प्रकार जीवन सार्थक होता है। गीता का यही अर्थ (सार) इस पाठ में समझाया गया है।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | कर्म | कर्मणी | कर्माणि |
| द्वितीया | कर्म | कर्मणी | कर्माणि |
| तृतीया | कर्मणा | कर्मभ्याम् | कर्मभिः |
| चतुर्थी | कर्मणे | कर्मभ्याम् | कर्मभ्यः |
| पञ्चमी | कर्मणः | कर्मभ्याम् | कर्मभ्यः |
| षष्ठी | कर्मणः | कर्मणोः | कर्मणाम् |
| सप्तमी | कर्मणि | कर्मणोः | कर्मसु |
| सम्बोधन | हे कर्म | हे कर्मणी | हे कर्माणि |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मार्गः | मार्गौ | मार्गाः |
| द्वितीया | मार्गम् | मार्गौ | मार्गान् |
| तृतीया | मार्गेण | मार्गाभ्याम् | मार्गैः |
| चतुर्थी | मार्गाय | मार्गाभ्याम् | मार्गेभ्यः |
| पञ्चमी | मार्गात् | मार्गाभ्याम् | मार्गेभ्यः |
| षष्ठी | मार्गस्य | मार्गयोः | मार्गाणाम् |
| सप्तमी | मार्गे | मार्गयोः | मार्गेषु |
| सम्बोधन | हे मार्ग | हे मार्गौ | हे मार्गाः |
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | युनक्तु | युञ्जताम् | युञ्जन्तु |
| मध्यम पुरुष | युङ्क्ष्व | युञ्जाथाम् | युङ्ग्ध्वम् |
| उत्तम पुरुष | युन्जै | युन्जावहै | युन्जामहै |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| श्रीमद्भगवद्गीता | भगवान का गाया गीत | महाभारतस्य | महाभारत का |
| अन्तर्गता | अंतर्गत | पवित्रा | पवित्र |
| अष्टादश | अठारह | अध्यायाः | अध्याय |
| सप्तशतानि | सात सौ | श्लोकाः | श्लोक |
| कर्मणि | कर्म में | अधिकारः | अधिकार |
| फलेषु | फलों में | कदाचन | कभी |
| कर्मफलहेतुः | कर्म के फल का हेतु | सङ्गः | आसक्ति |
| अकर्मणि | कर्म न करने में | योगः | योग |
| कौशलम् | कुशलता | सुखदुःखे | सुख-दुःख |
| समे | समान | लाभालाभौ | लाभ-हानि |
| जयाजयौ | जय-पराजय | युद्धाय | युद्ध के लिए |
| युज्यस्व | तैयार हो जाओ | पापम् | पाप |
| मार्गाः | मार्ग | ज्ञानयोगः | ज्ञानयोग |
| भक्तियोगः | भक्तियोग | मुक्तिम् | मुक्ति |
| निराशः | निराश | करिष्यामि | करूँगा |
| धैर्यम् | धैर्य | सार्थकम् | सार्थक |
गीता महाभारत का एक भाग है जिसे भगवद्गीता या गीता भी कहते हैं। इसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया। गीता के तीन मुख्य मार्ग हैं - कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' है जो कर्तव्यपरायणता की शिक्षा देता है। 'योगः कर्मसु कौशलम्' के अनुसार योग कर्म में कुशलता है। गीता का अर्थ (मूल संदेश) है - कर्तव्य का पालन करो, फल की चिंता न करो, धैर्य रखो और निराशा न करो।
| मार्ग | विधि | फल |
|---|---|---|
| कर्मयोग | निष्काम भाव से कर्म करना | कर्म में कुशलता |
| ज्ञानयोग | आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना | ज्ञान की प्राप्ति |
| भक्तियोग | भगवान में भक्ति | मुक्ति |
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| ग्रंथ | श्रीमद्भगवद्गीता |
| अंतर्गत | महाभारत |
| अध्याय | 18 |
| श्लोक | 700 |
| उपदेशक | भगवान श्रीकृष्ण |
| श्रोता | अर्जुन |
| स्थान | कुरुक्षेत्र |
| श्लोक | भाव |
|---|---|
| कर्मण्येवाधिकारस्ते | कर्म करो, फल की चिंता न करो |
| योगः कर्मसु कौशलम् | योग कर्म में कुशलता है |
| सुखदुःखे समे कृत्वा | सुख-दुःख में समभाव रखो |
गीतायाः अर्थ पाठ श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संदेश को सरल भाषा में समझाता है। गीता महाभारत का पवित्र अंग है जिसमें अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के माध्यम से जीवन जीने की कला सिखाई। गीता का सबसे महत्वपूर्ण श्लोक 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' हमें सिखाता है कि हमें केवल कर्म करने का अधिकार है, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। 'योगः कर्मसु कौशलम्' से योग का सही अर्थ समझ में आता है। गीता का अर्थ है - कर्तव्य का पालन, सुख-दुःख में समभाव और निराशा का त्याग। गीता का यह संदेश आज भी हमारे जीवन का मार्गदर्शन करता है।