'कल्पलतेव विद्या' का अर्थ है - विद्या कल्पलता के समान है। 'कल्पलता' (कल्पवृक्ष) स्वर्ग की वह दिव्य लता (बेल) या वृक्ष है जो मनुष्य की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती है। हमारे धर्म ग्रंथों और पुराणों में कल्पवृक्ष का वर्णन मिलता है। जिस प्रकार कल्पवृक्ष से भक्त की हर कामना पूर्ण हो जाती है, उसी प्रकार विद्या भी मनुष्य की सभी इच्छाओं, आकांक्षाओं और लक्ष्यों को पूर्ण करती है। यह पाठ विद्या की इसी महिमा का वर्णन करता है। विद्या मनुष्य को धन, मान, यश, सुख और अंततः ज्ञान तथा मुक्ति तक पहुँचाती है। संसार में ज्ञान के समान कुछ भी पवित्र नहीं है। जिस व्यक्ति के पास विद्या है, उसके पास सब कुछ है। यह पाठ हमें विद्या के महत्व को समझने और उसे अर्जित करने की प्रेरणा देता है।
संस्कृत पाठ: पुराणेषु कल्पवृक्षस्य वर्णनं विद्यते। सः देवलोके विद्यमानः दिव्यः वृक्षः अस्ति। यः कल्पवृक्षस्य अधः उपविशति, तस्य सर्वाणि मनोरथानि पूर्णानि भवन्ति।
हिंदी अर्थ: पुराणों में कल्पवृक्ष का वर्णन मिलता है। वह देवलोक में स्थित एक दिव्य वृक्ष है। जो कल्पवृक्ष के नीचे बैठता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। कल्पवृक्ष मनोरथ पूर्ण करने वाला स्वर्गीय वृक्ष है।
संस्कृत पाठ: कल्पलतेव विद्या। यथा कल्पवृक्षः मनोरथान् पूरयति, तथा विद्या अपि साधकस्य सर्वान् मनोरथान् पूरयति। विद्यया मनुष्यः धनं, मानं, यशः, ज्ञानं च प्राप्नोति।
हिंदी अर्थ: विद्या कल्पलता के समान है। जिस प्रकार कल्पवृक्ष मनोकामनाओं को पूर्ण करता है, उसी प्रकार विद्या भी साधक की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती है। विद्या से मनुष्य धन, मान, यश और ज्ञान प्राप्त करता है। इस प्रकार विद्या कल्पवृक्ष से भी बढ़कर है क्योंकि कल्पवृक्ष दुर्लभ है, परन्तु विद्या परिश्रम से प्राप्त की जा सकती है।
संस्कृत पाठ: न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रं इह विद्यते। ज्ञानेन मनुष्यः सर्वपापेभ्यः मुच्यते।
हिंदी अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान कुछ भी पवित्र नहीं है। ज्ञान से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। यह श्लोक भगवद्गीता से लिया गया है। जिस प्रकार अग्नि लोहे से मैल को दूर करती है, उसी प्रकार ज्ञान मनुष्य के मन से अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।
संस्कृत पाठ: यथा कल्पवृक्षस्य फलानि सर्वाणि सारयुक्तानि भवन्ति, तथा विद्यायाः फलानि अपि ज्ञानयुक्तानि भवन्ति। विद्या एव मनुष्यस्य परमं मित्रम्।
हिंदी अर्थ: जैसे कल्पवृक्ष के सभी फल सार (सार) से युक्त होते हैं, वैसे ही विद्या के फल भी ज्ञान से युक्त होते हैं। विद्या ही मनुष्य का परम मित्र है। विद्या परिवर्तनशील नहीं है, यह सदैव मनुष्य के साथ रहती है।
संस्कृत पाठ: विद्यां प्राप्य मनुष्यः आत्मनः विकासं करोति, समाजस्य उपकारं करोति, देशस्य उन्नतिं करोति। अतः विद्या सर्वेभ्यः इच्छापूर्तिभ्यः साधनम्।
हिंदी अर्थ: विद्या प्राप्त करके मनुष्य अपना विकास करता है, समाज का उपकार करता है और देश की उन्नति करता है। अतः विद्या सभी इच्छाओं की पूर्ति का साधन है। यही विद्या को कल्पलता के समान बनाता है।
संस्कृत पाठ: अस्माभिः सदा आदरेण विद्या अर्जनीया। आदरं विना विद्या न स्थिरा भवति। सद्गुरुणः सकाशात् ज्ञानं ग्राह्यम्।
हिंदी अर्थ: हमें सदैव आदर के साथ विद्या अर्जन करनी चाहिए। आदर के बिना विद्या स्थिर नहीं रहती। सद्गुरु के पास से ही ज्ञान ग्रहण करना चाहिए। गुरु की सेवा और आदर से ही विद्या सफल होती है।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | कल्पलता | कल्पलते | कल्पलताः |
| द्वितीया | कल्पलताम् | कल्पलते | कल्पलताः |
| तृतीया | कल्पलतया | कल्पलताभ्याम् | कल्पलताभिः |
| चतुर्थी | कल्पलतायै | कल्पलताभ्याम् | कल्पलताभ्यः |
| पञ्चमी | कल्पलतायाः | कल्पलताभ्याम् | कल्पलताभ्यः |
| षष्ठी | कल्पलतायाः | कल्पलतयोः | कल्पलतानाम् |
| सप्तमी | कल्पलतायाम् | कल्पलतयोः | कल्पलतासु |
| सम्बोधन | हे कल्पलते | हे कल्पलते | हे कल्पलताः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मनोरथः | मनोरथौ | मनोरथाः |
| द्वितीया | मनोरथम् | मनोरथौ | मनोरथान् |
| तृतीया | मनोरथेन | मनोरथाभ्याम् | मनोरथैः |
| चतुर्थी | मनोरथाय | मनोरथाभ्याम् | मनोरथेभ्यः |
| पञ्चमी | मनोरथात् | मनोरथाभ्याम् | मनोरथेभ्यः |
| षष्ठी | मनोरथस्य | मनोरथयोः | मनोरथानाम् |
| सप्तमी | मनोरथे | मनोरथयोः | मनोरथेषु |
| सम्बोधन | हे मनोरथ | हे मनोरथौ | हे मनोरथाः |
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | पूरयति | पूरयतः | पूरयन्ति |
| मध्यम पुरुष | पूरयसि | पूरयथः | पूरयथ |
| उत्तम पुरुष | पूरयामि | पूरयावः | पूरयामः |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| कल्पलता | कल्पवृक्ष (इच्छा पूर्ण करने वाली लता) | कल्पवृक्षः | मनोकामना पूर्ण करने वाला स्वर्गीय वृक्ष |
| इव | के समान | यथा | जिस प्रकार |
| तथा | उसी प्रकार | पुराणेषु | पुराणों में |
| देवलोके | देवलोक में | दिव्यः | दिव्य |
| मनोरथान् | मनोकामनाओं को | पूर्णानि | पूर्ण |
| साधकस्य | साधक का | पूरयति | पूर्ण करता है |
| ज्ञानम् | ज्ञान | पवित्रम् | पवित्र |
| सदृशम् | समान | विद्यते | है, विद्यमान है |
| मुच्यते | मुक्त होता है | पापेभ्यः | पापों से |
| फलानि | फल | सारयुक्तानि | सार से युक्त |
| परमम् | उत्तम | मित्रम् | मित्र |
| विकासम् | विकास | उपकारम् | उपकार |
| उन्नतिम् | उन्नति | साधनम् | साधन |
| आदरेण | आदर से | अर्जनीया | अर्जन करने योग्य |
| स्थिरा | स्थिर | सद्गुरुणः | सद्गुरु के |
| ग्राह्यम् | ग्रहण करने योग्य | विद्या | विद्या |
कल्पवृक्ष और विद्या की तुलना करते हुए यह पाठ विद्या की महिमा का वर्णन करता है। कल्पवृक्ष देवलोक में मिलता है, परन्तु विद्या इसी लोक में परिश्रम से प्राप्त की जा सकती है। गीता का श्लोक 'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रम्' ज्ञान की सर्वोच्च पवित्रता को दर्शाता है। विद्या से मनुष्य का विकास, समाज का उपकार और देश की उन्नति होती है। इस पाठ में 'इव' (के समान) का प्रयोग उपमा अलंकार के रूप में हुआ है।
| विशेषता | कल्पवृक्ष | विद्या |
|---|---|---|
| स्थान | देवलोक | इसी लोक में |
| इच्छा पूर्ति | करता है | करती है |
| प्राप्ति | दुर्लभ | परिश्रम से संभव |
| फल | सारयुक्त | ज्ञानयुक्त |
| स्वभाव | पुराणों में वर्णित | जीवन में व्यवहार योग्य |
| क्रम | प्राप्त वस्तु |
|---|---|
| 1 | धन |
| 2 | मान |
| 3 | यश |
| 4 | ज्ञान |
| 5 | सुख |
| नियम | विवरण |
|---|---|
| आदर | आदर के बिना विद्या स्थिर नहीं |
| गुरु सेवा | सद्गुरु से ज्ञान ग्रहण |
| निरंतरता | स्वाध्याय में प्रमाद नहीं |
| प्रयोग | समाज के उपकार में उपयोग |
कल्पलतेव विद्या पाठ विद्या की महिमा को कल्पवृक्ष से जोड़कर समझाता है। जिस प्रकार कल्पवृक्ष मनोकामनाएँ पूर्ण करता है, उसी प्रकार विद्या भी मनुष्य की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती है। विद्या से धन, मान, यश और ज्ञान की प्राप्ति होती है। गीता के अनुसार संसार में ज्ञान के समान कुछ भी पवित्र नहीं है। विद्या का सही उपयोग आत्मविकास, समाज-उपकार और देशोन्नति में होता है। विद्या को आदर और गुरु सेवा के साथ अर्जित करना चाहिए। यह पाठ हमें सिखाता है कि विद्या ही सच्ची कल्पलता है, जो जीवन को सफल और सार्थक बनाती है।