यह पाठ महान विदुषी और समाज सुधारिका पण्डिता रमाबाई सरस्वती के जीवन चरित्र पर आधारित है। पण्डिता रमाबाई का जन्म उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ था। उन्होंने अपनी विद्वता, साहस और समाज सेवा से भारतीय नारियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनकर कार्य किया। वे न केवल महान संस्कृत विदुषी थीं, बल्कि विधवा उत्थान के लिए समर्पित एक महान समाज सेविका भी थीं। उस समय जब स्त्रियों को शिक्षा से दूर रखा जाता था, रमाबाई ने स्वयं घर पर संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, मराठी आदि अनेक भाषाएँ सीखकर यह सिद्ध कर दिया कि स्त्रियाँ किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं। इस पाठ से हमें दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास, समाज सेवा और स्त्री शिक्षा की प्रेरणा मिलती है।
संस्कृत पाठ: पण्डिता रमाबाईसरस्वत्याः जन्म 1858 तमे वर्षे कर्णाटकराज्यस्य मङ्गलूरु नामके नगरे अभवत्।
हिंदी अर्थ: पण्डिता रमाबाई सरस्वती का जन्म सन् 1858 में कर्नाटक राज्य के मंगलूरु नामक नगर में हुआ था।
संस्कृत पाठ: तस्याः पिता अनन्तशास्त्री, माता लक्ष्मीबाई आसीत्। पिता संस्कृतस्य महान् विद्वान् आसीत्।
हिंदी अर्थ: उनके पिता अनन्तशास्त्री और माता लक्ष्मीबाई थीं। उनके पिता संस्कृत के महान विद्वान थे। पिता के सान्निध्य में ही रमाबाई ने बाल्यावस्था में ही संस्कृत भाषा का अध्ययन आरंभ किया।
संस्कृत पाठ: रमाबाई नवमवर्षात् एव संस्कृताध्ययनम् आरब्धवती। एकोनविंशे वर्षे सा संस्कृतं, हिन्दीं, आङ्ग्लं, मराठीं च भाषाः अशिक्षत्।
हिंदी अर्थ: रमाबाई ने नौ वर्ष की आयु से ही संस्कृत का अध्ययन आरंभ कर दिया था। उन्नीसवें वर्ष तक उन्होंने संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी और मराठी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। इस आयु में उन्हें विवाह नहीं हुआ था क्योंकि उनके पिता विवाह के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने अपना जीवन विद्या को समर्पित कर दिया।
संस्कृत पाठ: 1878 तमे वर्षे रमाबाई कलकत्ता नगरस्य पण्डितसभायाः न्यायाधीशानाम् पुरतः विद्वत्तां प्रदर्शितवती। तत्र तस्यै 'पण्डिता' 'सरस्वती' च उपाधी प्रदत्ते।
हिंदी अर्थ: सन् 1878 में रमाबाई ने कलकत्ता (कोलकाता) नगर की पंडित सभा के विद्वान न्यायाधीशों के समक्ष अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया। वहाँ उन्हें 'पण्डिता' और 'सरस्वती' की उपाधियाँ प्रदान की गईं। इस प्रकार उनकी विद्वता का सम्मान सारे भारत में हुआ।
संस्कृत पाठ: 1880 तमे वर्षे रमाबाई इङ्गलैण्डम् अगच्छत्। तत्र सा महाराण्याः विक्टोरियायाः समीपे भारतीयनारीणां दुर्दशां प्रत्यपादयत्।
हिंदी अर्थ: सन् 1880 में रमाबाई इंग्लैंड गईं। वहाँ उन्होंने महारानी विक्टोरिया के समक्ष भारतीय स्त्रियों की दयनीय दशा का वर्णन किया। महारानी उनकी विद्वत्ता से अत्यंत प्रभावित हुईं।
संस्कृत पाठ: तस्मात् पश्चात् सा विधवाभ्यः सहायतायै पुणे नगरे 'मुक्ति मिशन' स्थापितवती। तत्र बालविधवानां आश्रयं, भोजनं, शिक्षां च प्रदाय तासां उत्थानाय अकरोत्।
हिंदी अर्थ: इसके बाद उन्होंने विधवाओं की सहायता के लिए पुणे नगर में 'मुक्ति मिशन' की स्थापना की। वहाँ बाल विधवाओं को आश्रय, भोजन और शिक्षा देकर उनका उत्थान किया। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अभागी स्त्रियों के उद्धार में लगा दिया।
संस्कृत पाठ: 1922 तमे वर्षे पण्डिता रमाबाई दिवंगता। तस्याः समाजसेवा सदा स्मरणीया।
हिंदी अर्थ: सन् 1922 में पण्डिता रमाबाई का निधन हो गया। उनकी समाज सेवा सदैव स्मरणीय रहेगी।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | वर्षम् | वर्षे | वर्षाणि |
| द्वितीया | वर्षम् | वर्षे | वर्षाणि |
| तृतीया | वर्षेण | वर्षाभ्याम् | वर्षैः |
| चतुर्थी | वर्षाय | वर्षाभ्याम् | वर्षेभ्यः |
| पञ्चमी | वर्षात् | वर्षाभ्याम् | वर्षेभ्यः |
| षष्ठी | वर्षस्य | वर्षयोः | वर्षाणाम् |
| सप्तमी | वर्षे | वर्षयोः | वर्षेषु |
| सम्बोधन | हे वर्ष | हे वर्षे | हे वर्षाणि |
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | पठति | पठतः | पठन्ति |
| मध्यम पुरुष | पठसि | पठथः | पठथ |
| उत्तम पुरुष | पठामि | पठावः | पठामः |
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | जायते | जायेते | जायन्ते |
| मध्यम पुरुष | जायसे | जायेथे | जायध्वे |
| उत्तम पुरुष | जाये | जायावहे | जायामहे |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| पण्डिता | विदुषी | जन्म | जन्म |
| तमे वर्षे | उस वर्ष में | कर्णाटकराज्यस्य | कर्नाटक राज्य के |
| मङ्गलूरु | मंगलूरु नगर | अभवत् | हुआ |
| अनन्तशास्त्री | अनंतशास्त्री (पिता) | लक्ष्मीबाई | लक्ष्मीबाई (माता) |
| विद्वान् | विद्वान | नवमवर्षात् | नौ वर्ष की आयु से |
| आरब्धवती | आरंभ किया था | एकोनविंशे | उन्नीसवें |
| संस्कृतम् | संस्कृत | आङ्ग्लम् | अंग्रेजी |
| मराठी | मराठी | अशिक्षत् | सीखा |
| पण्डितसभायाः | पंडित सभा की | न्यायाधीशानाम् | न्यायाधीशों के |
| विद्वत्ताम् | विद्वत्ता | प्रदर्शितवती | दिखाया |
| उपाधी | उपाधियाँ | प्रदत्ते | दी गईं |
| इङ्गलैण्डम् | इंग्लैंड | महाराण्याः | महारानी की |
| विक्टोरियायाः | विक्टोरिया की | दुर्दशाम् | दयनीय दशा |
| प्रत्यपादयत् | वर्णन किया | विधवाभ्यः | विधवाओं को |
| मुक्तिमिशनम् | मुक्ति मिशन | स्थापितवती | स्थापना की |
| आश्रयम् | आश्रय | शिक्षाम् | शिक्षा |
| उत्थानम् | उत्थान | दिवंगता | स्वर्गवासी हुईं |
| स्मरणीया | याद करने योग्य | समाजसेवा | समाज सेवा |
पण्डिता रमाबाई ने अपनी रचना 'शारदा शतक' का अनुवाद करके प्राप्त धन से भी समाज सेवा का कार्य किया। उनके पिता ने उनका विवाह नहीं कराया क्योंकि वे विवाह के पक्ष में नहीं थे। रमाबाई ने विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए भी प्रयास किए। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ निश्चय और परिश्रम से कोई भी कठिन कार्य संभव है। उन्होंने स्त्री शिक्षा को बढ़ावा दिया और अभागी स्त्रियों के उद्धार के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया।
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1858 | मंगलूरु (कर्नाटक) में जन्म |
| बाल्यावस्था | पिता अनन्तशास्त्री से संस्कृत का अध्ययन |
| 9 वर्ष की आयु | संस्कृत अध्ययन का आरंभ |
| 19 वर्ष की आयु | संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, मराठी भाषाओं का ज्ञान |
| 1878 | कोलकाता में पण्डिता सभा में 'पण्डिता' और 'सरस्वती' उपाधि |
| 1880 | इंग्लैंड यात्रा, महारानी विक्टोरिया से भेंट |
| 1883 | पति विपिनबिहारीदास मेधवी का देहांत |
| बाद में | पुणे में 'मुक्ति मिशन' की स्थापना |
| 1922 | निधन |
| व्यक्ति / स्थान | संबंध |
|---|---|
| अनन्तशास्त्री | पिता - संस्कृत विद्वान |
| लक्ष्मीबाई | माता |
| महारानी विक्टोरिया | ब्रिटेन की महारानी |
| मङ्गलूरु | जन्म स्थान (कर्नाटक) |
| कोलकाता | पण्डिता उपाधि दिलाने वाली सभा का स्थान |
| पुणे | मुक्ति मिशन की स्थापना स्थान |
| गुण | उदाहरण |
|---|---|
| विद्वत्ता | 19 वर्ष में चार भाषाओं का ज्ञान |
| साहस | विदेश यात्रा करना, स्त्रियों की दशा बताना |
| दया एवं सेवा | विधवाश्रम की स्थापना |
| समर्पण | पूरा जीवन समाज सेवा में |
पण्डिता रमाबाई सरस्वती उन्नीसवीं शताब्दी की उन महान विभूतियों में से एक थीं जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और समाज सेवा से भारतीय नारियों का नाम रोशन किया। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि स्त्रियाँ भी विद्या, साहस और समाज सेवा में पुरुषों के समकक्ष खड़ी हो सकती हैं। विधवाओं के उत्थान के लिए 'मुक्ति मिशन' की स्थापना करके उन्होंने अनेक अभागी स्त्रियों के जीवन को नई दिशा दी। उनका जीवन आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। हमें उनके आदर्शों को अपनाकर समाज की सेवा और स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देना चाहिए।