सुभाषित शब्द दो शब्दों से बना है - "सु" और "भाषित"। "सु" का अर्थ है अच्छा, सुन्दर और "भाषित" का अर्थ है कहा हुआ वचन या कथन। इस प्रकार सुभाषित का अर्थ है सुन्दर वचन। जो वचन सत्य, सरल, सारगर्भित तथा जीवन को उन्नत बनाने वाले हों, उन्हें सुभाषित कहा जाता है। प्राचीन काल से ही संस्कृत वाङ्मय में सुभाषितों का अक्षय भंडार विद्यमान है। ये सुभाषित विभिन्न ग्रंथों जैसे पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, महाभारत, मनुस्मृति आदि से संकलित हैं। इनमें जीवन की गहन शिक्षाएँ छिपी होती हैं। सुभाषितों का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि व्यक्ति को नीति, धर्म, परोपकार, विद्या, विनय और आचरण की शिक्षा देना है। इस पाठ में संकलित सुभाषित हमें बताते हैं कि मनुष्य को उद्यमी होना चाहिए, विद्या की महिमा को समझना चाहिए, परायी स्त्री को माता के समान मानना चाहिए तथा परोपकार ही मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए। ये सुभाषित हमारे जीवन में आदर्श व्यवहार का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
संस्कृत पाठ: उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।
हिंदी अर्थ: संसार में कार्य केवल उद्यम (परिश्रम) से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने मात्र से नहीं। सोते हुए सिंह के मुँह में अपने आप हिरण नहीं प्रवेश करते। अर्थात् केवल कामना करने से कुछ प्राप्त नहीं होता, इसके लिए कठोर परिश्रम आवश्यक है। यह सुभाषित पञ्चतन्त्र से लिया गया है।
संस्कृत पाठ: विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्।।
हिंदी अर्थ: विद्या मनुष्य को विनय (नम्रता) प्रदान करती है। विनय से मनुष्य योग्यता (पात्रता) प्राप्त करता है। योग्यता से धन की प्राप्ति होती है। धन से धर्म का पालन होता है और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है। इस प्रकार विद्या ही जीवन की सफलता का प्रथम सोपान है। इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि सच्ची विद्या व्यक्ति को नम्र बनाती है, अहंकारी नहीं।
संस्कृत पाठ: मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्। आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।।
हिंदी अर्थ: जो मनुष्य परायी स्त्रियों को माता के समान, पराये धन को मिट्टी के ढेले के समान तथा सभी प्राणियों को अपने समान देखता है, वही सच्चा पण्डित है। इस सुभाषित में व्यक्ति की नैतिकता का वर्णन है। परायी स्त्री के प्रति पवित्र दृष्टि, पराये धन के प्रति लोभ रहित दृष्टि तथा समस्त प्राणियों के प्रति समभाव - ये तीन गुण मनुष्य को पण्डित बनाते हैं।
संस्कृत पाठ: परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः। परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्।।
हिंदी अर्थ: वृक्ष परोपकार के लिए ही फल देते हैं, नदियाँ परोपकार के लिए ही बहती हैं, गायें परोपकार के लिए ही दूध देती हैं और यह शरीर भी परोपकार के लिए ही प्राप्त हुआ है। इस सुभाषित से स्पष्ट है कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य परोपकार है। जैसे वृक्ष, नदी और गाय केवल दूसरों के हित के लिए कार्य करती हैं, वैसे ही मनुष्य को भी परोपकार के लिए अपना जीवन समर्पित करना चाहिए।
संस्कृत पाठ: एक एव सुहृद् धर्मः निधनेऽपि अनुयाति यः। शरीरेण समं नाशं धर्मो न गच्छति धर्मः।।
हिंदी अर्थ: धर्म ही एकमात्र ऐसा सच्चा मित्र है जो मृत्यु के समय भी साथ नहीं छोड़ता। धर्म शरीर के साथ नष्ट नहीं होता। यह शरीर के समान नाशवान नहीं है। इस सुभाषित से हमें यह शिक्षा मिलती है कि संसार के सभी मित्र केवल सुख के समय ही साथ रहते हैं, परन्तु धर्म सदैव हमारे साथ रहता है, इसलिए हमें सदा धर्म का आचरण करना चाहिए। यह सुभाषित महाभारत से लिया गया है।
संस्कृत पाठ: निरक्षरस्य पशोः... (वैकल्पिक विस्तार)
हिंदी अर्थ: इस पाठ में संकलित सभी सुभाषित हमें शिक्षा देते हैं कि हमें सदैव उद्यमी बनना चाहिए, विद्या प्राप्त करनी चाहिए, विनम्र रहना चाहिए, परोपकार करना चाहिए और धर्म का पालन करना चाहिए।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | उद्यमः | उद्यमौ | उद्यमाः |
| द्वितीया | उद्यमम् | उद्यमौ | उद्यमान् |
| तृतीया | उद्यमेन | उद्यमाभ्याम् | उद्यमैः |
| चतुर्थी | उद्यमाय | उद्यमाभ्याम् | उद्यमेभ्यः |
| पञ्चमी | उद्यमात् | उद्यमाभ्याम् | उद्यमेभ्यः |
| षष्ठी | उद्यमस्य | उद्यमयोः | उद्यमानाम् |
| सप्तमी | उद्यमे | उद्यमयोः | उद्यमेषु |
| सम्बोधन | हे उद्यम | हे उद्यमौ | हे उद्यमाः |
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | भवति | भवतः | भवन्ति |
| मध्यम पुरुष | भवसि | भवथः | भवथ |
| उत्तम पुरुष | भवामि | भवावः | भवामः |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| उद्यमेन | परिश्रम से | सिध्यन्ति | सिद्ध होते हैं |
| मनोरथैः | इच्छाओं से | सुप्तस्य | सोते हुए |
| सिंहस्य | सिंह के | मृगाः | हिरण |
| विद्या | शिक्षा, ज्ञान | ददाति | देती है |
| विनयम् | नम्रता | पात्रताम् | योग्यता |
| धनम् | धन, संपत्ति | धर्मम् | धर्म |
| सुखम् | सुख | मातृवत् | माता के समान |
| परदारेषु | परायी स्त्रियों में | लोष्टवत् | मिट्टी के ढेले के समान |
| आत्मवत् | अपने समान | पण्डितः | विद्वान |
| परोपकाराय | दूसरों के उपकार के लिए | फलन्ति | फलते हैं |
| वहन्ति | बहती हैं | दुहन्ति | दूध देती हैं |
| शरीरम् | शरीर | सुहृद् | सच्चा मित्र |
| निधने | मृत्यु के समय | अनुयाति | साथ चलता है |
| नाशम् | नाश | गच्छति | जाता है |
सुभाषितों का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को सच्चे मार्ग पर चलाना है। इन्हें "नीति के गहरे सूत्र" भी कहा जाता है। पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, भर्तृहरि के नीतिशतक आदि ग्रंथों में सुभाषितों का संग्रह मिलता है। सुभाषितों की भाषा सरल और छंदबद्ध होती है, जिससे इन्हें आसानी से कंठस्थ किया जा सकता है।
| श्लोक | मुख्य शिक्षा | स्रोत |
|---|---|---|
| उद्यमेन हि सिध्यन्ति | कार्य उद्यम से होते हैं | पञ्चतन्त्र |
| विद्या ददाति विनयम् | विद्या से विनय, धन, धर्म, सुख | सुभाषित रत्नभाण्डागार |
| मातृवत् परदारेषु | परस्त्री माता, परधन मिट्टी | सुभाषित रत्नभाण्डागार |
| परोपकाराय फलन्ति | जीवन का लक्ष्य परोपकार | प्रसिद्ध सुभाषित |
| एक एव सुहृद् धर्मः | धर्म सच्चा मित्र | महाभारत |
| क्रियापद | धातु | लकार | अर्थ |
|---|---|---|---|
| सिध्यन्ति | सिध् | लट् लकार (वर्तमान) | सिद्ध होते हैं |
| प्रविशन्ति | प्र-विश् | लट् लकार | प्रवेश करते हैं |
| ददाति | दा | लट् लकार | देती है |
| याति | या | लट् लकार | जाता है |
| आप्नोति | आप् | लट् लकार | प्राप्त करता है |
| पश्यति | दृश् | लट् लकार | देखता है |
| शब्द | पर्याय |
|---|---|
| सिंहः | केसरी, मृगेन्द्रः, हरिः |
| वृक्षाः | तरवः, पादपाः, द्रुमाः |
| नद्यः | सरितः, तटिन्यः |
| गावः | धेनवः, गाः |
| धनम् | वित्तम्, द्रविणम् |
सुभाषितानि पाठ हमें जीवन जीने की सच्ची कला सिखाता है। इन सुभाषितों के माध्यम से हम सीखते हैं कि परिश्रम के बिना सफलता संभव नहीं, विद्या ही विनय और योग्यता देती है, परोपकार ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है तथा धर्म ही एकमात्र सच्चा मित्र है। इन प्राचीन विचारों को अपनाकर हम अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकते हैं। ये सुभाषित आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने प्राचीन काल में थे।