स्वावलम्बन शब्द दो शब्दों से बना है - 'स्व' और 'अवलम्बन'। 'स्व' का अर्थ है अपना और 'अवलम्बन' का अर्थ है सहारा। इस प्रकार स्वावलम्बन का अर्थ है अपना सहारा, अर्थात् आत्मनिर्भरता। यह पाठ पञ्चतन्त्र की एक कथा पर आधारित है जिसमें दिखाया गया है कि व्यक्ति को अपने कार्यों में आत्मनिर्भर होना चाहिए और कठिन परिस्थितियों में धैर्य, बुद्धि एवं सहयोग से ही विजय मिलती है। कथा में एक छोटी सी चटका (गौरैया) अपने घोंसले की रक्षा करती है और अपनी बुद्धि तथा अपने मित्रों की सहायता से विशाल हाथी को पराजित करती है। यह कथा हमें सिखाती है कि अपने प्रयत्न से बने कार्य ही सफल होते हैं और छोटे-छोटे जीव मिलकर बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान कर सकते हैं।
संस्कृत पाठ: कस्मिंश्चित् वने एका चटका सह चटकेन निवसति स्म। सा वृक्षस्य शाखायां स्वयं नीडं निर्मितवती।
हिंदी अर्थ: किसी एक वन में एक गौरैया अपने पति (नर गौरैया) के साथ रहती थी। उसने वृक्ष की शाखा पर स्वयं अपना घोंसला बनाया था। इस प्रकार चटका स्वावलम्बी थी - अपना घर स्वयं बनाती थी।
संस्कृत पाठ: एकस्मिन् दिने एकः विशालः हस्ती वृक्षस्य समीपम् आगच्छत्। सः वृक्षं प्रकम्पयामास। तेन नीडं पतितम्, अण्डानि च भग्नानि।
हिंदी अर्थ: एक दिन एक विशाल हाथी वृक्ष के पास आया। उसने वृक्ष को हिला दिया। इससे घोंसला गिर गया और उसके अंडे टूट गए।
संस्कृत पाठ: चटका अतीव दुःखिता अभवत्। सा आत्मानं सान्त्वयति स्म - अहं स्वावलम्बनं कुर्याम्। प्रयत्नेन एव मम नीडं सुरक्षितं भविष्यति।
हिंदी अर्थ: गौरैया अत्यधिक दुखी हो गई। वह स्वयं को सांत्वना देती थी - मैं स्वावलम्बन करूँगी। प्रयत्न करने से ही मेरा घोंसला सुरक्षित रहेगा। उसने हार नहीं मानी और पुनः घोंसला बनाने का निश्चय किया।
संस्कृत पाठ: चटका स्वस्य मित्राणि - काकं, काष्ठकूटं, भ्रमरं, मण्डूकं च आहूय योजनाम् अकरोत्।
हिंदी अर्थ: गौरैया ने अपने मित्रों - कौआ, कठफोड़वा, भौंरा और मेंढक - को बुलाकर एक योजना बनाई।
संस्कृत पाठ: भ्रमरः हस्तिनः कर्णयोः गुञ्जनं करोति। काष्ठकूटः तस्य अक्षिणी चञ्च्वा हन्ति। मण्डूकः गर्तायां शब्दं करोति।
हिंदी अर्थ: भौंरा हाथी के कानों में गूँज पैदा करता है। कठफोड़वा अपनी चोंच से उसकी आँखों को नुकसान पहुँचाता है। मेंढक गड्ढे (कीचड़ वाले स्थान) से आवाज करता है।
संस्कृत पाठ: हस्ती पीडितः सन् गर्तायां पतितः। एवं चटका स्वस्य नीडं पुनः निर्माय स्वावलम्बनेन सुखेन उवास।
हिंदी अर्थ: हाथी पीड़ित होकर गड्ढे में गिर गया। इस प्रकार गौरैया ने पुनः अपना घोंसला बनाया और स्वावलम्बन (आत्मनिर्भरता) के साथ सुखपूर्वक रहने लगी।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | चटका | चटके | चटकाः |
| द्वितीया | चटकाम् | चटके | चटकाः |
| तृतीया | चटकया | चटकाभ्याम् | चटकाभिः |
| चतुर्थी | चटकायै | चटकाभ्याम् | चटकाभ्यः |
| पञ्चमी | चटकायाः | चटकाभ्याम् | चटकाभ्यः |
| षष्ठी | चटकायाः | चटकयोः | चटकानाम् |
| सप्तमी | चटकायाम् | चटकयोः | चटकासु |
| सम्बोधन | हे चटके | हे चटके | हे चटकाः |
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | करोति | कुरुतः | कुर्वन्ति |
| मध्यम पुरुष | करोषि | कुरुथः | कुरुथ |
| उत्तम पुरुष | करोमि | कुर्वः | कुर्मः |
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | पतति | पततः | पतन्ति |
| मध्यम पुरुष | पतसि | पतथः | पतथ |
| उत्तम पुरुष | पतामि | पतावः | पतामः |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| चटका | गौरैया (मादा पक्षी) | चटकः | नर पक्षी |
| निवसति | रहती है | वृक्षस्य | वृक्ष के |
| शाखायाम् | शाखा पर | नीडम् | घोंसला |
| निर्मितवती | बनाया था | हस्ती | हाथी |
| समीपम् | पास | प्रकम्पयामास | हिला दिया |
| पतितम् | गिरा | अण्डानि | अंडे |
| भग्नानि | टूटे | दुःखिता | दुखी |
| अभवत् | हुई | आत्मानम् | स्वयं को |
| सान्त्वयति | सांत्वना देती है | स्वावलम्बनम् | आत्मनिर्भरता |
| प्रयत्नेन | प्रयत्न से | सुरक्षितम् | सुरक्षित |
| काकः | कौआ | काष्ठकूटः | कठफोड़वा |
| भ्रमरः | भौंरा | मण्डूकः | मेंढक |
| योजनाम् | योजना | गुञ्जनम् | गूँज |
| कर्णयोः | कानों में | अक्षिणी | आँखें |
| चञ्च्वा | चोंच से | हन्ति | मारता है |
| गर्तायाम् | गड्ढे में | शब्दम् | आवाज |
| पीडितः | पीड़ित | उवास | रहा |
इस कथा से स्पष्ट होता है कि चटका अपना घोंसला स्वयं बनाती थी, अर्थात् वह स्वावलम्बी थी। परन्तु दुर्भाग्य से हाथी ने उसका घोंसला नष्ट कर दिया। दुखी होकर भी उसने धैर्य नहीं छोड़ा। उसने अपने मित्रों का सहयोग लिया और अपनी बुद्धि से हाथी को गड्ढे में गिरा दिया। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि आत्मनिर्भर व्यक्ति कभी हार नहीं मानता। कठिनाइयाँ चाहे कितनी भी बड़ी हों, बुद्धि और परिश्रम से उन्हें दूर किया जा सकता है। साथ ही मित्रों के सहयोग का महत्व भी इस कथा से स्पष्ट होता है।
| पात्र | प्रकृति | भूमिका |
|---|---|---|
| चटका (गौरैया) | स्वावलम्बी, धैर्यवान | घोंसला बनाती है, योजना बनाती है |
| हस्ती (हाथी) | बलवान, दुर्बुद्धि | घोंसला नष्ट करता है, अंततः गड्ढे में गिरता है |
| काकः | बुद्धिमान मित्र | योजना में सहायक |
| काष्ठकूटः | मित्र | आँखों पर चोंच मारता है |
| भ्रमरः | मित्र | कानों में गूँज पैदा करता है |
| मण्डूकः | मित्र | गड्ढे से आवाज करता है |
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | चटका ने वृक्ष की शाखा पर घोंसला बनाया |
| 2 | हाथी ने वृक्ष हिलाकर घोंसला और अंडे नष्ट किए |
| 3 | चटका दुखी हुई पर धैर्य नहीं खोया |
| 4 | मित्रों के साथ योजना बनाई |
| 5 | भ्रमर, काष्ठकूट, मण्डूक ने योजना पर अमल किया |
| 6 | हाथी गड्ढे में गिरकर मर गया |
| 7 | चटका ने पुनः घोंसला बनाकर सुख से रही |
| धातु | अर्थ | उदाहरण रूप |
|---|---|---|
| कृ | करना | करोति, कुर्वन्ति |
| पत् | गिरना | पतति, पतन्ति |
| निर्मा | बनाना | निर्मितवती |
| हन् | मारना | हन्ति |
| स्था | खड़ा होना | तिष्ठति |
स्वावलम्बनम् पाठ हमें सिखाता है कि आत्मनिर्भरता जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। चटका की तरह हमें भी अपने कार्य स्वयं करने चाहिए और कठिन समय में धैर्य तथा बुद्धि का परिचय देना चाहिए। जो व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है, वह कभी निराश नहीं होता। साथ ही यह कथा मित्रता और सहयोग का महत्व भी दर्शाती है। छोटे-छोटे प्राणियों के सामूहिक प्रयास से भी बड़ा से बड़ा संकट दूर हो सकता है। अतः हमें स्वावलम्बी बनना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर मित्रों का सहयोग भी लेना चाहिए।