'विद्याधन' शब्द दो शब्दों से बना है - 'विद्या' और 'धन'। विद्या का अर्थ है शिक्षा, ज्ञान और धन का अर्थ है संपत्ति। इस प्रकार विद्याधन का अर्थ है विद्या रूपी धन। यह पाठ विद्या की महिमा का वर्णन करता है। विद्या को सबसे बड़ा धन कहा गया है क्योंकि यह ऐसा धन है जिसे न तो चोर चुरा सकते हैं, न राजा छीन सकता है, न भाई-बंधु बाँट सकते हैं और न ही यह किसी पर बोझ बनता है। इसके विपरीत सांसारिक धन लूटा जा सकता है, खर्च होकर समाप्त हो जाता है और विवाद का कारण बनता है। विद्या रूपी धन का व्यय करने पर भी वह घटता नहीं, बल्कि बढ़ता जाता है। विद्या से ही व्यक्ति को मान, यश और सम्मान मिलता है। यह पाठ हमें विद्या अर्जन के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहने की प्रेरणा देता है।
संस्कृत पाठ: न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि। व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।।
हिंदी अर्थ: विद्या रूपी धन को न तो चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाई-बंधु इसे बाँट सकते हैं और न ही यह बोझ का कारण होता है। खर्च करने पर भी यह सदैव बढ़ता ही रहता है। अतः विद्याधन सभी धनों में सर्वश्रेष्ठ (प्रधान) है। इस श्लोक में विद्याधन की पाँच विशेषताएँ बताई गई हैं - चोर नहीं चुरा सकता, राजा नहीं छीन सकता, भाई नहीं बाँट सकते, भार नहीं बनता और खर्च करने पर भी बढ़ता है।
संस्कृत पाठ: क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्। क्षणशस्तु निर्वाणं कणशस्तु धनागमः।।
हिंदी अर्थ: क्षण-क्षण (थोड़ा-थोड़ा करके) विद्या प्राप्त करो और कण-कण (थोड़ा-थोड़ा करके) धन संचय करो। क्षण से कल्याण होता है और कण से धन की प्राप्ति होती है। इस श्लोक से शिक्षा मिलती है कि विद्या और धन अचानक नहीं मिलते, बल्कि धीरे-धीरे निरंतर प्रयास से अर्जित होते हैं।
संस्कृत पाठ: विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्। विद्या निधानं परमं यशस्करम्।
हिंदी अर्थ: विद्या मनुष्य का सबसे बड़ा सौंदर्य (रूप) है और छिपा हुआ धन है। विद्या परम निधान (खज़ाना) है जो यश प्रदान करती है। बाहरी सुंदरता क्षणभंगुर है, परन्तु विद्या का सौंदर्य स्थायी और आदरणीय होता है।
संस्कृत पाठ: लोके धनं नाशवत् भवति, किन्तु विद्या न कदापि नश्यति। धनं चोरैः हार्यम्, विद्या न कुत्रापि हार्यम्।
हिंदी अर्थ: संसार में धन नाशवान् होता है, परन्तु विद्या कभी नष्ट नहीं होती। धन चोरों द्वारा हरण किया जा सकता है, परन्तु विद्या का कहीं भी हरण नहीं हो सकता। इसलिए विद्या ही सबसे सुरक्षित धन है।
संस्कृत पाठ: विद्यया मनुष्यः यशं, मानं, सम्मानं च प्राप्नोति। विद्याहीनः धनवान् अपि समाजे आदरं न प्राप्नोति।
हिंदी अर्थ: विद्या से मनुष्य यश, मान और सम्मान प्राप्त करता है। विद्याहीन व्यक्ति धनवान होते हुए भी समाज में आदर नहीं पाता। अतः सांसारिक धन से विद्या कहीं अधिक मूल्यवान है।
संस्कृत पाठ: अस्माभिः नित्यम् उद्यमेन विद्या अर्जनीया। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। एवं विद्याधनं सर्वदा वर्धते।
हिंदी अर्थ: हमें निरंतर उद्यम (परिश्रम) से विद्या अर्जन करनी चाहिए। स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए। इस प्रकार विद्याधन सदैव बढ़ता रहता है।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | विद्या | विद्ये | विद्याः |
| द्वितीया | विद्याम् | विद्ये | विद्याः |
| तृतीया | विद्यया | विद्याभ्याम् | विद्याभिः |
| चतुर्थी | विद्यायै | विद्याभ्याम् | विद्याभ्यः |
| पञ्चमी | विद्यायाः | विद्याभ्याम् | विद्याभ्यः |
| षष्ठी | विद्यायाः | विद्ययोः | विद्यानाम् |
| सप्तमी | विद्यायाम् | विद्ययोः | विद्यासु |
| सम्बोधन | हे विद्ये | हे विद्ये | हे विद्याः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | धनम् | धने | धनानि |
| द्वितीया | धनम् | धने | धनानि |
| तृतीया | धनेन | धनाभ्याम् | धनैः |
| चतुर्थी | धनाय | धनाभ्याम् | धनेभ्यः |
| पञ्चमी | धनात् | धनाभ्याम् | धनेभ्यः |
| षष्ठी | धनस्य | धनयोः | धनानाम् |
| सप्तमी | धने | धनयोः | धनेषु |
| सम्बोधन | हे धन | हे धने | हे धनानि |
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | साधयेत् | साधयेताम् | साधयेयुः |
| मध्यम पुरुष | साधयेः | साधयेतम् | साधयेत |
| उत्तम पुरुष | साधयेयम् | साधयेव | साधयेम |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| चोरहार्यम् | चोरों द्वारा हरण करने योग्य | राजहार्यम् | राजा द्वारा हरण करने योग्य |
| भ्रातृभाज्यम् | भाइयों द्वारा बाँटने योग्य | भारकारि | बोझ बनाने वाला |
| व्यये | खर्च में | कृते | करने पर |
| वर्धते | बढ़ता है | नित्यम् | सदैव |
| सर्वधनप्रधानम् | सब धनों में श्रेष्ठ | क्षणशः | क्षण-क्षण, थोड़ा-थोड़ा |
| कणशः | कण-कण, थोड़ा-थोड़ा | साधयेत् | प्राप्त करे, अर्जित करे |
| निर्वाणम् | कल्याण | धनागमः | धन की प्राप्ति |
| प्रच्छन्नम् | छिपा हुआ | गुप्तम् | गुप्त |
| निधानम् | खज़ाना | यशस्करम् | यश देने वाला |
| नाशवत् | नाशवान् | नश्यति | नष्ट होती है |
| हार्यम् | हरण करने योग्य | मानम् | मान, सम्मान |
| सम्मानम् | सम्मान | आदरम् | आदर |
| अर्जनीया | अर्जन करने योग्य | उद्यमेन | परिश्रम से |
| विद्या | विद्या | धनम् | धन |
विद्याधन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे खर्च करने पर भी यह घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। जब कोई व्यक्ति अपनी विद्या दूसरों को बाँटता है, तो सुनने वालों को भी ज्ञान मिलता है और बताने वाले की विद्या भी बढ़ती है। सांसारिक धन की तुलना में विद्याधन श्रेष्ठ है क्योंकि विद्या से यश, मान, सम्मान और आत्मसंतोष मिलता है। यह पाठ 'क्षणशः' और 'कणशः' के माध्यम से निरंतर परिश्रम की शिक्षा देता है।
| क्रम | विशेषता |
|---|---|
| 1 | चोर इसे चुरा नहीं सकते |
| 2 | राजा इसे छीन नहीं सकता |
| 3 | भाई-बंधु इसे बाँट नहीं सकते |
| 4 | यह बोझ का कारण नहीं बनता |
| 5 | खर्च करने पर भी सदैव बढ़ता है |
| सांसारिक धन | विद्याधन |
|---|---|
| नाशवान् | अविनाशी |
| चोरों द्वारा हरण संभव | चोरी नहीं हो सकता |
| बाँटने पर घटता है | बाँटने पर बढ़ता है |
| विवाद का कारण | यश और मान देता है |
| बोझ बन सकता है | कभी बोझ नहीं |
| श्लोक | भाव |
|---|---|
| न चोरहार्यं न च राजहार्यम् | विद्याधन सुरक्षित धन है |
| क्षणशः कणशश्चैव | थोड़ा-थोड़ा करके विद्या और धन अर्जित करो |
| विद्या नाम नरस्य रूपम् | विद्या मनुष्य का सौंदर्य है |
विद्याधनम् पाठ हमें सिखाता है कि विद्या ही सबसे बड़ा और सबसे सुरक्षित धन है। इसे चोर नहीं चुरा सकते, राजा नहीं छीन सकता और भाई नहीं बाँट सकते। यह कभी बोझ नहीं बनता और खर्च करने पर भी बढ़ता रहता है। सांसारिक धन नाशवान् है, परन्तु विद्याधन अविनाशी है। विद्या से ही व्यक्ति को यश, मान और सम्मान मिलता है। 'क्षणशः कणशः' की शिक्षा से हमें निरंतर परिश्रम करके विद्या अर्जन करना चाहिए। विद्याधन का संचय ही जीवन की सच्ची सफलता है। हमें अपने जीवन में विद्या को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।