'विश्वबंदुत्व' शब्द दो शब्दों से बना है - 'विश्व' और 'बंधुत्व'। 'विश्व' का अर्थ है संसार या ब्रह्मांड और 'बंधुत्व' का अर्थ है भाईचारा। इस प्रकार विश्वबंदुत्व का अर्थ है संपूर्ण संसार में भाईचारा। यह पाठ हमें सिखाता है कि हमें संपूर्ण विश्व के प्राणियों को अपना बंधु (भाई) मानना चाहिए। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता विश्वबंदुत्व है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने कहा है कि पूरी पृथ्वी एक परिवार है - वसुधैव कुटुम्बकम्। इसका अर्थ है कि देश, भाषा, धर्म और रंग के भेद से ऊपर उठकर सभी मनुष्यों को परिवार के सदस्यों की तरह प्रेम और सम्मान देना चाहिए। विश्वबंदुत्व ही शांति और मानवता का मार्ग है। यह पाठ हमें भेदभाव रहित, प्रेमपूर्ण और एकतापूर्ण विश्व की कल्पना करना सिखाता है।
संस्कृत पाठ: अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
हिंदी अर्थ: 'यह मेरा है, यह पराया है' - यह गणना (भेद) छोटे मन वाले लोग करते हैं। उदार चरित्र वाले लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी (वसुधा) ही एक परिवार (कुटुम्ब) है। इस श्लोक से स्पष्ट है कि जिसका मन उदार होता है, वह समस्त संसार को अपना परिवार मानता है। यह श्लोक हितोपदेश से लिया गया है।
संस्कृत पाठ: सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।
हिंदी अर्थ: सभी सुखी हों, सभी निरोग (रोग रहित) हों, सभी शुभ (भला) देखें और कोई भी दुःख का भागी न हो। यह शांति मंत्र विश्वबंदुत्व की भावना को व्यक्त करता है। इसमें केवल अपने लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के कल्याण की प्रार्थना की गई है।
संस्कृत पाठ: परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ। एवं सर्वे प्राणिनः परस्परं सहायतां कुर्वन्ति, तेन विश्वे शान्तिः भवति।
हिंदी अर्थ: परस्पर भावना रखते हुए (एक-दूसरे के हित का विचार करते हुए) तुम सब परम कल्याण को प्राप्त करोगे। इस प्रकार सभी प्राणी परस्पर सहायता करते हैं, जिससे विश्व में शांति स्थापित होती है। परस्पर सहयोग ही विश्वबंदुत्व का आधार है।
संस्कृत पाठ: जातिः वर्णः देशः च मनुष्याणां भेदस्य कारणानि न भवेयुः। सर्वे मनुष्याः भ्रातरः सन्ति। विश्वबंदुत्वात् एव शान्तिः सम्भवति।
हिंदी अर्थ: जाति, वर्ण (रंग) और देश मनुष्यों में भेद के कारण नहीं बनने चाहिए। सभी मनुष्य भाई हैं। विश्वबंदुत्व से ही शांति संभव है। अर्थात् भेदभाव त्यागकर सभी को समान दृष्टि से देखना ही विश्वबंदुत्व है।
संस्कृत पाठ: दया, प्रेम, करुणा, सहिष्णुता च विश्वबंदुत्वस्य आधाराः सन्ति। यत्र प्रेम अस्ति, तत्र विश्वबंदुत्वम् वर्धते।
हिंदी अर्थ: दया, प्रेम, करुणा और सहिष्णुता विश्वबंदुत्व के आधार हैं। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ विश्वबंदुत्व का विकास होता है। ये गुण मनुष्य को विश्व का नागरिक बनाते हैं।
संस्कृत पाठ: अस्माकं संस्कृतौ अतिथिदेवः, सर्वभूतेषु आत्मवत् दृष्टिः च इति आदर्शाः प्रसिद्धाः। एते एव विश्वबंदुत्वस्य मूलानि।
हिंदी अर्थ: हमारी संस्कृति में अतिथि को देवता मानना और सभी प्राणियों में अपने समान दृष्टि रखना - ये आदर्श प्रसिद्ध हैं। यही विश्वबंदुत्व के मूल (आधार) हैं।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | बन्धुः | बन्धू | बन्धवः |
| द्वितीया | बन्धुम् | बन्धू | बन्धून् |
| तृतीया | बन्धुना | बन्धुभ्याम् | बन्धुभिः |
| चतुर्थी | बन्धवे | बन्धुभ्याम् | बन्धुभ्यः |
| पञ्चमी | बन्धोः | बन्धुभ्याम् | बन्धुभ्यः |
| षष्ठी | बन्धोः | बन्ध्वोः | बन्धूनाम् |
| सप्तमी | बन्धौ | बन्ध्वोः | बन्धुषु |
| सम्बोधन | हे बन्धो | हे बन्धू | हे बन्धवः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | कुटुम्बम् | कुटुम्बे | कुटुम्बानि |
| द्वितीया | कुटुम्बम् | कुटुम्बे | कुटुम्बानि |
| तृतीया | कुटुम्बेन | कुटुम्बाभ्याम् | कुटुम्बैः |
| चतुर्थी | कुटुम्बाय | कुटुम्बाभ्याम् | कुटुम्बेभ्यः |
| पञ्चमी | कुटुम्बात् | कुटुम्बाभ्याम् | कुटुम्बेभ्यः |
| षष्ठी | कुटुम्बस्य | कुटुम्बयोः | कुटुम्बानाम् |
| सप्तमी | कुटुम्बे | कुटुम्बयोः | कुटुम्बेषु |
| सम्बोधन | हे कुटुम्ब | हे कुटुम्बे | हे कुटुम्बानि |
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | भवतु | भवताम् | भवन्तु |
| मध्यम पुरुष | भव | भवतम् | भवत |
| उत्तम पुरुष | भवानि | भवाव | भवाम |
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ | संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|
| विश्वः | संसार, ब्रह्मांड | बंधुत्वम् | भाईचारा |
| अयं | यह | निजः | अपना |
| परः | पराया | गणना | गणना, भेद का विचार |
| लघुचेतसाम् | छोटे मन वालों का | उदारचरितानाम् | उदार चरित्र वालों का |
| वसुधा | पृथ्वी | कुटुम्बकम् | परिवार |
| सर्वे | सभी | सुखिनः | सुखी |
| निरामयाः | रोग रहित | भद्राणि | शुभ |
| पश्यन्तु | देखें | दुःखभाक् | दुःख का भागी |
| भवेत् | हो (चाहिए) | परस्परम् | आपस में |
| भावयन्तः | भावना रखते हुए | श्रेयः | कल्याण |
| अवाप्स्यथ | प्राप्त करोगे | जातिः | जाति |
| वर्णः | रंग | देशः | देश |
| भ्रातरः | भाई | शान्तिः | शांति |
| दया | दया | करुणा | करुणा |
| सहिष्णुता | सहनशीलता | आधाराः | आधार |
| वर्धते | बढ़ता है | मूलानि | जड़ें |
विश्वबंदुत्व का मूल वाक्य 'वसुधैव कुटुम्बकम्' है जिसका अर्थ है पूरी पृथ्वी एक परिवार है। यह वाक्य हमारी भारतीय संस्कृति का सर्वोच्च आदर्श है। 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' शांति मंत्र संपूर्ण विश्व के कल्याण की कामना करता है। विश्वबंदुत्व का आधार है - दया, प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और भेदभाव का त्याग। जो लोग छोटे मन वाले होते हैं, वे 'अपना-पराया' का भेद करते हैं, परन्तु उदार चरित्र वाले संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानते हैं। यह पाठ मानवता और विश्व शांति की शिक्षा देता है।
| श्लोक | मुख्य भाव |
|---|---|
| अयं निजः परो वेति | उदार मन वालों के लिए वसुधा ही कुटुम्ब है |
| सर्वे भवन्तु सुखिनः | सभी सुखी, निरोग और शुभदर्शी हों |
| परस्परं भावयन्तः | परस्पर सहयोग से परम कल्याण |
| आधार | बाधक |
|---|---|
| दया | क्रूरता |
| प्रेम | घृणा |
| करुणा | स्वार्थ |
| सहिष्णुता | असहिष्णुता |
| समानता | भेदभाव |
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| वसुधा | पृथ्वी |
| कुटुम्बकम् | परिवार |
| लघुचेतसाम् | छोटे मन वालों का |
| निरामयाः | निरोग |
| भद्राणि | शुभ |
विश्वबंदुत्वम् पाठ भारतीय संस्कृति के सर्वोच्च आदर्श 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का संदेश देता है। यह पाठ हमें सिखाता है कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है और सभी मनुष्य एक दूसरे के भाई हैं। भेदभाव, स्वार्थ और घृणा के स्थान पर दया, प्रेम, करुणा और सहिष्णुता अपनाकर हम विश्व में शांति स्थापित कर सकते हैं। 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' मंत्र हमें सबके कल्याण की प्रेरणा देता है। हमें अपने छोटे मन के भेदभाव का त्याग करके उदार चरित्र वालों की तरह संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानना चाहिए। इसी में मानवता और विश्व शांति का मार्ग निहित है।