पृथ्वी की ऊपरी सतह मृदा (Soil) नामक एक पतली परत से ढकी होती है, जो जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। पौधे मिट्टी में उगते हैं, किसान अपनी फसल मिट्टी में उगाते हैं, और अनेक जीव मिट्टी के अंदर रहते हैं। मिट्टी चट्टानों के टूटने (अपक्षय), जैविक क्रियाओं एवं जलवायु के प्रभाव से बनती है। इस अध्याय में हम मृदा की परतें, उसके प्रकार, जल धारण क्षमता, अवशोषण क्षमता, मृदा प्रदूषण तथा मृदा संरक्षण का अध्ययन करेंगे। मृदा हमारे कृषि जीवन का आधार है, इसलिए इसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
2. मृदा का निर्माण (Formation of Soil)
मृदा का निर्माण चट्टानों के अपक्षय (Weathering of rocks) से होता है। अपक्षय के कारक:
ताप परिवर्तन: दिन-रात के ताप अंतर से चट्टानें फैलती-सिकुड़ती हैं और टूटती हैं।
जल: बहता हुआ जल चट्टानों को घिसता है तथा बर्फ जमने से चट्टानों में दरारें पड़ती हैं।
पवन: हवा चट्टानों के कणों को उड़ाकर एवं घिसकर टुकड़े बनाती है।
जीव: पौधों की जड़ें, केंचुए, दीमक, जीवाणु आदि चट्टानों के विघटन में सहायता करते हैं।
अपरदन (Erosion): जल एवं वायु द्वारा मिट्टी के कणों का स्थानांतरण।
चट्टानों के टूटने से बने सूक्ष्म कणों में मृत पौधों एवं जंतुओं के सड़े-गले अंश मिलने से ह्यूमस (Humus) बनता है। ह्यूमस मिट्टी को उपजाऊ बनाता है।
3. मृदा की परतें (Layers of Soil)
जब मिट्टी की खुदाई की जाती है, तो ऊपर से नीचे तक विभिन्न परतें (मृदा प्रोफ़ाइल) दिखाई देती हैं:
अपनी मृदा (Topsoil - A-परत): सबसे ऊपरी परत। इसमें ह्यूमस सबसे अधिक होता है, जिससे पौधों की वृद्धि के लिए उपयुक्त। केंचुए, कीड़े आदि यहाँ रहते हैं।
उपमृदा (Subsoil - B-परत): ऊपरी मृदा से नीचे। इसमें जल धारण करने वाले अवयव कम होते हैं; जड़ें यहाँ तक जा सकती हैं।
नीचे की परत (C-परत): चट्टानों के छोटे टुकड़े।
चट्टान (Bedrock - D-परत): सबसे नीचे कठोर चट्टान की परत।
मृदा प्रोफ़ाइल
मृदा की विभिन्न परतों की ऊर्ध्वाधर काट को मृदा प्रोफ़ाइल (Soil Profile) कहते हैं। ऊपर की मिट्टी ह्यूमस से भरपूर एवं गहरे रंग की होती है।
4. मृदा के प्रकार (Types of Soil)
मिट्टी के कणों के आकार के आधार पर मृदा के तीन मुख्य प्रकार हैं:
रेतीली मृदा (Sandy Soil): कण बड़े एवं मोटे होते हैं। जल धारण क्षमता कम, वायु संचार अधिक। यह तेज़ी से सूखती है।
चिकनी मृदा (Clayey Soil): कण अत्यंत सूक्ष्म होते हैं। जल धारण क्षमता अधिक होती है, वायु संचार कम। यह गीली होने पर चिपचिपी होती है। बर्तन एवं मिट्टी के खिलौने बनाने के लिए उपयुक्त।
दोमट मृदा (Loamy Soil): रेत, गाद एवं चिकनी मिट्टी का मिश्रण। इसमें ह्यूमस अधिक होता है, जल धारण एवं वायु संचार दोनों संतुलित। यह खेती के लिए सर्वोत्तम है।
5. मृदा का जल धारण एवं अवशोषण
जल धारण क्षमता (Water Holding Capacity): किसी मिट्टी की अपने कणों में जल को रोकने की क्षमता। चिकनी मिट्टी की जल धारण क्षमता सबसे अधिक होती है।
अवशोषण क्षमता (Absorption Capacity): मिट्टी की जल को सोखने की दर। रेतीली मिट्टी में अवशोषण की दर तेज़ होती है।
पारगम्यता (Permeability): मिट्टी में जल के रिसने की क्षमता। रेतीली मिट्टी अत्यधिक पारगम्य है, चिकनी मिट्टी कम पारगम्य है।
जल संचय (Percolation)
वर्षा का जल मिट्टी में रिसकर (Percolation) भूमिगत जल का निर्माण करता है।
मिट्टी की पारगम्यता अधिक होने पर जल तेज़ी से नीचे पहुँचता है।
भूमिगत जल स्तर मिट्टी के प्रकार एवं जल रिसाव पर निर्भर करता है।
6. मृदा अपरदन (Soil Erosion)
मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत के जल एवं वायु द्वारा बह जाने/उड़ जाने को मृदा अपरदन कहते हैं। इससे ह्यूमस एवं पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं।
मृदा अपरदन के कारण
अत्यधिक वर्षा एवं बाढ़
तेज़ पवन (रेगिस्तानी क्षेत्र)
वनों की कटाई (वृक्षों की जड़ें मिट्टी को बाँधती हैं)
अनियंत्रित पशु चराई
ढलान वाली भूमि पर गलत कृषि पद्धतियाँ
मृदा अपरदन की रोकथाम (मृदा संरक्षण)
वनीकरण: वृक्षों की जड़ें मिट्टी को जकड़कर रखती हैं।
वनारोपण: अधिक पेड़ लगाना।
पट्टीदार खेती (Strip Cropping): ढलान पर मिट्टी की बाँधें (contour bunding) बनाना।
पवन रोधक (Wind breaks): वृक्षों की कतारें।
जुताई के नियंत्रित तरीके: हल चलाते समय ढलान के आर-पार।
घास लगाना: खुले मैदानों में घास जड़ों द्वारा मिट्टी को रोकती है।
7. मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)
कीटनाशक, उर्वरक, प्लास्टिक एवं औद्योगिक अपशिष्ट मिट्टी को प्रदूषित करते हैं।
मिट्टी में विषैले रसायन मिलने से पौधों एवं जीवों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
प्रदूषण कम करने के लिए जैविक खेती (जैविक खाद) को बढ़ावा देना चाहिए।
त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ
मृदा के प्रकार
मृदा
कण
जल धारण
उपयोग
रेतीली
बड़े-मोटे
कम
जल्दी सूखती, पारगम्य
चिकनी
अत्यंत सूक्ष्म
अधिक
बर्तन, खिलौने
दोमट
मिश्रित
संतुलित
खेती (सर्वोत्तम)
मृदा की परतें
परत
विशेषता
A (अपनी मृदा)
ह्यूमस युक्त, उपजाऊ
B (उपमृदा)
जल धारण कम
C (नीचे की परत)
चट्टानों के टुकड़े
D (चट्टान)
कठोर bedrock
माइंड मैप
graph TD
A["मृदा"] --> B["निर्माण - चट्टानों का अपक्षय"]
B --> C["ताप, जल, पवन, जीव"]
A --> D["परतें (प्रोफ़ाइल)"]
D --> E["A-अपनी मृदा (ह्यूमस)"]
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A --> I["प्रकार: रेतीली, चिकनी, दोमट"]
A --> J["अपरदन - जल/वायु"]
J --> K["रोकथाम: वनीकरण, बाँधें"]
A --> L["प्रदूषण - कीटनाशक, अपशिष्ट"]
महत्वपूर्ण आरेख (SVG)
मृदा प्रोफ़ाइल
मृदा संरक्षण के उपाय
सामान्य गलतियाँ
दोमट को सबसे कम उपजाऊ मानना: दोमट मृदा खेती के लिए सर्वोत्तम है, इसमें जल धारण व वायु संचार दोनों संतुलित हैं।
चिकनी मिट्टी को पारगम्य मानना: चिकनी मिट्टी में रिसाव कम होता है, पारगम्यता रेतीली में अधिक होती है।
रेतीली मिट्टी की जल धारण क्षमता अधिक मानना: रेतीली मिट्टी की जल धारण क्षमता सबसे कम होती है।
मृदा केवल चट्टानों के टुकड़े है: मृदा में चट्टान के टुकड़ों के साथ ह्यूमस, जल, वायु एवं सूक्ष्मजीव भी होते हैं।
अपनी मृदा को ह्यूमस रहित बताना: अपनी मृदा (A परत) में ह्यूमस सबसे अधिक होता है।
मृदा अपरदन केवल जल से होना मानना: अपरदन जल और वायु दोनों से होता है।
केंचुए को हानिकारक मानना: केंचुए मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं, मृत जीवों को खाकर ह्यूमस बनाने में सहायता करते हैं।
परीक्षा युक्तियाँ
मृदा के प्रकार एवं उनकी जल धारण क्षमता की तुलना लिखें।
मृदा प्रोफ़ाइल की परतें क्रम से समझाएँ।
मृदा निर्माण में अपक्षय के कारक (ताप, जल, पवन, जीव) सूचीबद्ध करें।
मृदा अपरदन के कारण एवं रोकथाम के उपाय लिखें।
ह्यूमस की भूमिका (उर्वरता बढ़ाने में) स्पष्ट करें।
पारगम्यता, अवशोषण एवं जल धारण क्षमता में अंतर बताएँ।
मृदा प्रदूषण के कारण (कीटनाशक, अपशिष्ट) एवं जैविक खेती का महत्व लिखें।
निष्कर्ष
मृदा पृथ्वी की जीवनदायिनी परत है, जो चट्टानों के अपक्षय से बनती है और ह्यूमस के कारण उपजाऊ होती है। मृदा प्रोफ़ाइल में चार परतें होती हैं, जिनमें ऊपरी परत सबसे अधिक ह्यूमस युक्त होती है। रेतीली, चिकनी एवं दोमट - तीन मुख्य प्रकार की मिट्टी होती है, जिनमें दोमट खेती के लिए सर्वोत्तम है। जल, वायु एवं अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों से मृदा अपरदन होता है, जिसे वनारोपण, बाँधें, पवन रोधक एवं घास लगाकर रोका जा सकता है। कीटनाशकों एवं अपशिष्टों से मृदा प्रदूषित होती है। मृदा के संरक्षण से ही कृषि और समस्त जीवन का भविष्य सुरक्षित रह सकता है।