बारहवीं शताब्दी में दिल्ली पहली बार किसी बड़े राज्य की राजधानी बनी। इससे पहले यह तोमर राजपूतों और चौहानों के अधीन थी। तेरहवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक दिल्ली पर पाँच प्रमुख सल्तनत राजवंशों का शासन रहा। इन्हें सामूहिक रूप से 'दिल्ली सल्तनत' कहा जाता है। इस अध्याय में हम दिल्ली सल्तनत के राजवंशों, उनकी प्रशासनिक व्यवस्था, प्रमुख शासकों और उनकी नीतियों का अध्ययन करेंगे।
दिल्ली सल्तनत का इतिहास इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने भारत में तुर्क-अफगान शासन की नींव रखी और एक केंद्रीकृत प्रशासन की परंपरा स्थापित की। सल्तनत काल में अनेक मस्जिदें, मीनारें और किले बनाए गए, जिनमें कुतुब मीनार सबसे प्रसिद्ध है।
बारहवीं शताब्दी में दिल्ली पहली बार किसी बड़े राज्य की राजधानी बनी। उस समय दिल्ली पर तोमर राजपूतों का शासन था, जिन्हें बाद में चौहानों ने पराजित किया। चौहान अजमेर के शासक थे, जिन्होंने दिल्ली पर भी अधिकार किया। तेरहवीं शताब्दी के अंत में दिल्ली सल्तनत का विस्तार उत्तर भारत के अधिकांश भागों में हो गया।
यह ध्यान देने योग्य है कि सल्तनत काल से पहले भी शासक दिल्ली को अपनी राजधानी बनाना चाहते थे, क्योंकि यह एक सुरक्षित स्थान था और व्यापारिक मार्गों पर स्थित था। दिल्ली सल्तनत के अधीन दिल्ली न केवल राजनीतिक, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र भी बन गई।
दिल्ली सल्तनत में पाँच प्रमुख राजवंशों ने शासन किया:
कुतुबुद्दीन ऐबक को सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है, जबकि इल्तुतमिश को सबसे शक्तिशाली गुलाम शासक कहा जाता है। इल्तुतमिश की पुत्री रज़िया 1236-1240 तक दिल्ली की शासिका रहीं।
इल्तुतमिश ने गुलाम वंश की सत्ता को मजबूत किया। उसने अपने प्रतिद्वंद्वियों को पराजित किया और साम्राज्य का विस्तार किया। उसने एक 'इक़्ता' व्यवस्था प्रारंभ की, जिसके अंतर्गत सैन्य कमांडरों को भूमि की आय देने के बदले में उनसे सैन्य सेवा ली जाती थी। इन कमांडरों को 'मुक़्ती' या 'वली' कहा जाता था।
इल्तुतमिश के समय दिल्ली में प्रसिद्ध कुतुब मीनार का निर्माण प्रारंभ हुआ। उसने सल्तनत में इस्लामी शासन व्यवस्था की नींव मजबूत की। इल्तुतमिश के बाद उसके उत्तराधिकारी प्रायः कमजोर रहे, और अनेक सुलतान केवल नाम मात्र के शासक रहे।
अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ईस्वी) दिल्ली सल्तनत का सबसे शक्तिशाली शासक माना जाता है। उसने सल्तनत का विस्तार दक्षिण भारत तक किया और सिंधु नदी से लेकर पूर्वी तट तक अपना अधिकार स्थापित किया। उसने मंगोल आक्रमणों से सफलतापूर्वक सामना किया।
अलाउद्दीन ने कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक उपाय किए। उसने वस्तुओं के मूल्य नियंत्रण (बाज़ार नियंत्रण) की व्यवस्था स्थापित की ताकि सैनिकों को सस्ता सामान मिल सके। उसने सैनिकों के वेतन का भुगतान नकद में करने की व्यवस्था बनाई। अलाउद्दीन की नीतियाँ अनेक दृष्टियों से कठोर थीं, परंतु उन्होंने साम्राज्य को शक्तिशाली बनाया। उसने नई मस्जिदों के निर्माण और धार्मिक संस्थाओं पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि सैन्य शक्ति पर बल दिया।
मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1325-1351 ईस्वी) एक विद्वान और महत्वाकांक्षी शासक था, परंतु उसकी कई योजनाएँ विफल रहीं। उसने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद (देवगिरि के पास) स्थानांतरित करने का आदेश दिया, परंतु यह योजना विफल रही और उसे दिल्ली वापस आना पड़ा। इसके अलावा उसने 'टोकन करेंसी' (प्रतीकात्मक मुद्रा) चलाई, जो असफल रही क्योंकि ताँबे के सिक्कों का मूल्य चाँदी के सिक्कों के बराबर नहीं रखा जा सका।
इन असफल योजनाओं को इतिहासकार 'मुहम्मद तुग़लक़ के प्रयोग' कहते हैं। इब्नबतूता ने उसके दरबार में कुछ समय बिताया और उसके शासन का विवरण लिखा। मुहम्मद बिन तुग़लक़ की मृत्यु के बाद उसके चचेरे भाई फिरोज़शाह तुग़लक़ ने शासन संभाला, जिसने नहरें खुदवाईं और प्रशासन में कुछ सुधार किए।
दिल्ली सल्तनत के अधीन समाज में विभिन्न वर्ग थे। मुस्लिम समाज में 'सैयद', 'शेख़', 'मुल्ला', 'काज़ी' और 'उलमा' जैसे वर्ग थे। हिंदू समाज में 'ब्राह्मण', 'क्षत्रिय' जैसे वर्ग थे। सल्तनत के सुलतानों ने क़ुरान और शरिया (इस्लामी विधि) का आदर किया, परंतु वे धार्मिक मामलों में पूर्णतया उलमा के अधीन नहीं थे।
कई सुलतानों ने राजनीतिक और धार्मिक अधिकारों को जोड़ने की कोशिश की। सुलतान को 'न्याय का चक्र' (Circle of Justice) की अवधारणा के अनुसार न्याय और नीति सुनिश्चित करने वाला माना जाता था। उलमा द्वारा विरोध के बावजूद कुछ सुलतान अपने विचारों पर अड़े रहे।
सैयद और लोदी वंशों के काल में सल्तनत की शक्ति कमजोर पड़ती गई। स्थानीय शासक स्वतंत्र होते गए। अंततः 1526 ईस्वी में पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर ने इब्राहिम लोदी को पराजित करके मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत का अंत हुआ।
| राजवंश | काल | प्रमुख शासक |
|---|---|---|
| गुलाम (मामलुक) | 1206-1290 | कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, बलबन |
| खिलजी | 1290-1320 | अलाउद्दीन खिलजी |
| तुग़लक़ | 1320-1414 | मुहम्मद बिन तुग़लक़, फिरोज़शाह |
| सैयद | 1414-1451 | — |
| लोदी | 1451-1526 | इब्राहिम लोदी |
| शासक | मुख्य कार्य |
|---|---|
| इल्तुतमिश | इक़्ता व्यवस्था, कुतुब मीनार |
| रज़िया सुल्ताना | दिल्ली की शासिका (1236-1240) |
| अलाउद्दीन खिलजी | बाज़ार नियंत्रण, दक्षिण तक विस्तार |
| मुहम्मद बिन तुग़लक़ | राजधानी स्थानांतरण, टोकन करेंसी |
| घटना | तिथि |
|---|---|
| दिल्ली सल्तनत का प्रारंभ | 1206 ईस्वी |
| रज़िया का शासन | 1236-1240 ईस्वी |
| अलाउद्दीन खिलजी का शासन | 1296-1316 ईस्वी |
| पानीपत का प्रथम युद्ध | 1526 ईस्वी |
दिल्ली सल्तनत ने भारतीय इतिहास में तेरहवीं से सोलहवीं शताब्दी तक प्रमुख भूमिका निभाई। तोमर और चौहानों के बाद दिल्ली पाँच सल्तनत राजवंशों की राजधानी बनी। गुलाम वंश के कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्तुतमिश ने साम्राज्य की नींव मजबूत की, जबकि अलाउद्दीन खिलजी ने इसे शिखर पर पहुँचाया। मुहम्मद बिन तुग़लक़ के महत्वाकांक्षी प्रयोगों की असफलता ने सल्तनत को कमजोर किया। सैयद और लोदी काल में सत्ता का ह्रास हुआ। अंततः 1526 में बाबर की विजय के साथ सल्तनत का अंत और मुग़ल साम्राज्य का प्रारंभ हुआ। यह अध्याय हमें एक केंद्रीकृत प्रशासन व्यवस्था, भूमि-आय व्यवस्था और सैन्य संगठन के विकास की यात्रा दिखाता है।