हमारी पृथ्वी कभी स्थिर नहीं रहती। यह निरंतर बदलती रहती है। पृथ्वी के इस परिवर्तन के दो मुख्य कारण हैं - आंतरिक (अंतर्जात) बल और बाह्य (बहिर्जात) बल। अंतर्जात बल पृथ्वी के अंदर से उत्पन्न होते हैं, जबकि बहिर्जात बल पृथ्वी की सतह पर कार्य करते हैं। इस अध्याय में हम भूकंप, ज्वालामुखी, अपरदन और निक्षेपण (Deposition) जैसी प्रक्रियाओं का अध्ययन करेंगे।
पृथ्वी की बदलती सतह ही हमें पर्वत, मैदान, घाटियाँ, नदियाँ और रेगिस्तान देती है। इन स्थलरूपों का निर्माण निरंतर चलने वाली भूगर्भीय प्रक्रियाओं के कारण होता है।
पृथ्वी की सतह को बदलने वाले बल दो प्रकार के होते हैं:
अंतर्जात बल (Endogenic Forces): ये बल पृथ्वी के अंदर से उत्पन्न होते हैं। इनके कारण भूकंप, ज्वालामुखी और पर्वत निर्माण होता है। ये बल अचानक या धीरे-धीरे कार्य कर सकते हैं।
बहिर्जात बल (Exogenic Forces): ये बल पृथ्वी की सतह पर कार्य करते हैं। नदियाँ, हवाएँ, हिमनद (Glaciers) और समुद्री लहरें बहिर्जात बलों के उदाहरण हैं। ये बल भूमि को काटते (अपरदन) और नया निर्माण (निक्षेपण) करते हैं।
भूकंप और ज्वालामुखी अंतर्जात बलों के उदाहरण हैं, जबकि नदियों और हवाओं का कार्य बहिर्जात बलों का उदाहरण है।
जब पृथ्वी की चट्टानों में अचानक टूट-फूट होती है, तो उससे उत्पन्न ऊर्जा भूकंप के रूप में प्रकट होती है। भूकंप के समय पृथ्वी की सतह हिलती है। पृथ्वी के अंदर जहाँ से भूकंप उत्पन्न होता है, उसे 'अधिकेंद्र' (Focus) कहते हैं। सतह पर अधिकेंद्र के ठीक ऊपर का बिंदु 'अधिकेंद्र के ऊपर का बिंदु' (Epicentre) कहलाता है, जहाँ भूकंप का प्रभाव सबसे अधिक होता है।
भूकंप की तीव्रता 'रिक्टर स्केल' (Richter Scale) से मापी जाती है। भूकंप की तीव्रता 0 से 9 तक मापी जाती है। भूकंप वाली क्षेत्रों में भूकंप प्रतिरोधी इमारतें बनानी चाहिए। भूकंप से बचाव के लिए सुरक्षित स्थानों पर आश्रय लेना चाहिए।
जब पृथ्वी के अंदर का गर्म मैग्मा दबाव के कारण सतह पर निकल आता है, तो उसे ज्वालामुखी कहते हैं। ज्वालामुखी से निकले पिघले पदार्थ को 'लावा' (Lava) कहते हैं। ज्वालामुखी मुख्य रूप से उन स्थानों पर पाए जाते हैं जहाँ प्लेटों की सीमाएँ होती हैं।
ज्वालामुखी तीन प्रकार के होते हैं:
ज्वालामुखी से निकला लावा ठंडा होकर चट्टानें बनाता है। ज्वालामुखी की राख मिट्टी को उपजाऊ बनाती है।
बहिर्जात बल भूमि की सतह को काटते हैं। इस प्रक्रिया को 'अपरदन' (Erosion) कहते हैं। नदी, हवा, हिमनद और समुद्री लहरें अपरदन करती हैं। अपरदित पदार्थों का एक स्थान पर जमाव 'निक्षेपण' (Deposition) कहलाता है। अपरदन और निक्षेपण दोनों मिलकर विभिन्न स्थलरूपों का निर्माण करते हैं।
नदियाँ घाटियाँ, जलप्रपात और डेल्टा बनाती हैं। हिमनद U-आकार की घाटियाँ बनाते हैं। हवाएँ बालू के टीले और मशरूम जैसी चट्टानें बनाती हैं। समुद्री लहरें समुद्री गुफाएँ और समुद्री चट्टानें बनाती हैं।
नदियाँ अपरदन और निक्षेपण के माध्यम से अनेक स्थलरूप बनाती हैं:
हिमनद (Glacier) बर्फ के विशाल पिंड होते हैं, जो धीरे-धीरे बहते हैं। हिमनद U-आकार की घाटियाँ बनाते हैं। हिमनद के पिघलने पर चट्टानों के ढेर 'मोरेन' (Moraines) बनते हैं।
हवाएँ शुष्क क्षेत्रों में 'बालू के टीले' (Sand Dunes) और 'मशरूम चट्टानें' (Mushroom Rocks) बनाती हैं। हवा द्वारा बहाई गई बालू से 'लोएस' (Loess) नामक उपजाऊ मिट्टी बनती है।
समुद्री लहरें तट पर 'समुद्री गुफाएँ' (Sea Caves), 'समुद्री चट्टानें' (Sea Cliffs), 'स्तंभ' (Stacks) और 'समुद्री मेहराब' (Sea Arches) बनाती हैं। लहरों के निक्षेपण से 'बालू तट' (Beaches) बनते हैं।
पृथ्वी की भूपर्पटी बड़े-बड़े 'प्लेटों' (Plates) में विभाजित है। ये प्लेटें निरंतर गतिमान रहती हैं। इन प्लेटों के टकराने से पर्वत बनते हैं, सरकने से भूकंप आते हैं और अलग होने से ज्वालामुखी सक्रिय होते हैं। इस सिद्धांत को 'प्लेट विवर्तनिकी' (Plate Tectonics) कहते हैं।
प्लेटों की सीमाओं पर ही अधिकांश भूकंप और ज्वालामुखी होते हैं। यही कारण है कि प्रशांत महासागर के चारों ओर भूकंपों की एक 'रिंग ऑफ फायर' (Ring of Fire) है। प्लेट विवर्तनिकी पृथ्वी की बदलती सतह का प्रमुख कारण है।
| बल का प्रकार | स्रोत | उदाहरण |
|---|---|---|
| अंतर्जात | पृथ्वी के अंदर | भूकंप, ज्वालामुखी, पर्वत निर्माण |
| बहिर्जात | पृथ्वी की सतह | नदी, हवा, हिमनद, लहरें |
| स्थलरूप | विवरण |
|---|---|
| V-आकार की घाटी | नदी द्वारा कटाव से |
| जलप्रपात | कठोर-नर्म चट्टान के संगम पर |
| मेंडर | नदी के टेढ़े मार्ग |
| गोखुर झील | मेंडर कटने से |
| डेल्टा | नदी के मुहाने पर जमाव |
| प्रकार | विवरण |
|---|---|
| सक्रिय | लगातार/हाल में फटने वाले |
| सुप्त | फट सकने वाले |
| मृत | कभी न फटने वाले |
पृथ्वी की सतह निरंतर बदलती रहती है। अंतर्जात बल (भूकंप, ज्वालामुखी) और बहिर्जात बल (नदी, हवा, हिमनद, लहरें) मिलकर पृथ्वी की सतह को आकार देते हैं। भूकंप और ज्वालामुखी अचानक होने वाली घटनाएँ हैं, जबकि अपरदन और निक्षेपण धीरे-धीरे कार्य करते हैं। नदियाँ घाटियाँ, जलप्रपात, मेंडर, गोखुर झीलें और डेल्टा बनाती हैं। हिमनद U-घाटियाँ, हवाएँ बालू के टीले और लहरें समुद्री गुफाएँ बनाती हैं। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत पृथ्वी की बदलती सतह का कारण समझाता है। इन प्रक्रियाओं का अध्ययन हमें पृथ्वी के स्थलरूपों और प्राकृतिक आपदाओं को समझने में मदद करता है।