यह अध्याय हमें लगभग एक हज़ार वर्षों, यानी लगभग 700 ईस्वी से 1750 ईस्वी के बीच भारतीय उपमहाद्वीप में हुए विभिन्न परिवर्तनों की पड़ताल करना सिखाता है। इस समयावधि में समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीति, भाषा और संस्कृति में अनेक बड़े बदलाव आए। इतिहासकार इन परिवर्तनों का अध्ययन विभिन्न स्रोतों, जैसे पांडुलिपियों (हस्तलिखित पुस्तकों), अभिलेखों, सिक्कों, इमारतों, चित्रों और यात्रियों के वृतांतों के माध्यम से करते हैं। इतिहास केवल तथ्यों की सूची नहीं है, बल्कि यह समय के साथ होने वाले परिवर्तनों की समझ है।
इस अध्याय में हम यह समझेंगे कि 'हिंदुस्तान' और 'भारत' जैसे शब्दों का अर्थ समय के साथ किस प्रकार बदला, किस प्रकार विभिन्न जातियाँ और समुदाय उभरे, तथा किन नई तकनीकों ने जनजीवन को प्रभावित किया। हम यह भी जानेंगे कि अरब, तुर्क, फारसी और अफगान जैसे विदेशी समुदायों के आगमन ने भारतीय समाज को किस प्रकार प्रभावित किया।
इस काल का अध्ययन करने के लिए हमें विभिन्न स्रोतों की आवश्यकता होती है। पांडुलिपियाँ (Manuscripts) ताड़पत्र, भूर्ज-पत्र और कागज़ पर लिखी जाती थीं। इन्हें बनाना अत्यंत कठिन था, इसलिए इन्हें संरक्षित रखना भी सरल नहीं था। पुस्तकें प्रायः हाथ से लिखी जाती थीं, इसलिए इन्हें केवल कुछ ही व्यक्ति पढ़ पाते थे। पांडुलिपियों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इतिहासकार एक ही पांडुलिपि की विभिन्न प्रतियों के माध्यम से तथ्यों का मिलान करते हैं।
इस काल के प्रमुख विदेशी यात्रियों में अरब विद्वान अल-बिरूनी (जिन्होंने 1022 ईस्वी में भारत का भ्रमण किया और 'किताब-उल-हिंद' नामक पुस्तक की रचना की), मोरक्को का यात्री इब्नबतूता (जिसने अपनी यात्रा का वृत्तांत 'रिहला' नामक पुस्तक में लिखा) और फ्रांसीसी यात्री फ्राँस्वा बर्नियर प्रमुख हैं। बर्नियर की पुस्तक 'ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पायर' भारत के इतिहास के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी है। इन यात्रियों के विवरण हमें उस काल के समाज, रीति-रिवाजों और शासन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
आज 'हिंदुस्तान' शब्द का प्रयोग समग्र भारत के लिए किया जाता है, परंतु तेरहवीं शताब्दी में यह शब्द केवल सिंधु नदी के पश्चिम में स्थित प्रदेशों के लिए प्रयुक्त होता था। फारसी भाषा में 'हिंद' शब्द का प्रयोग किया जाता था, और 'हिंदुस्तान' शब्द तेरहवीं शताब्दी में फारसी इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज द्वारा प्रयुक्त हुआ। 'इंडिया' शब्द ग्रीक भाषा से आया है, जो 'इंडस' (सिंधु) नदी के नाम से बना है।
चौदहवीं शताब्दी के कवि अमीर खुसरो के लिए 'हिंदुस्तान' भारत का ही पर्याय था, जहाँ विभिन्न धर्मों और भाषाओं के लोग रहते थे। मुग़ल सम्राट बाबर और उसके उत्तराधिकारी भी भारत को 'हिंदुस्तान' कहते थे। इस प्रकार, भौगोलिक शब्दों के अर्थ भी समय के साथ बदलते रहते हैं, और यह समझना आवश्यक है कि अतीत में किसी शब्द का प्रयोग उसके आज के अर्थ से भिन्न हो सकता है।
इस काल में समाज को विभिन्न जातियों (Jatis) में बाँटा गया था। प्रत्येक जाति का अपना एक व्यवसाय और अपनी स्थिति होती थी। जातियाँ समूहों में बँट जाती थीं, जिन्हें 'वर्ण' कहा जाता था, जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। परंतु प्रत्येक जाति का स्थान वर्ण व्यवस्था में स्पष्ट नहीं होता था। उदाहरण के लिए, कुछ जातियाँ जैसे चर्मकार (चमड़े से काम करने वाले) और जुलाहे वर्ण व्यवस्था से बाहर थीं और उन्हें समाज में उचित स्थान नहीं मिलता था।
प्राचीन शास्त्रों में ब्राह्मणों को शासकों को सलाह देने और यज्ञ-अनुष्ठान कराने की भूमिका दी गई थी। राजा भी ब्राह्मणों को भूमि दान करते थे, और ऐसे भू-स्वामी 'भूमिस्वामी' कहलाते थे। उत्तर भारत में ऐसे वंशज 'थकुर' और दक्षिण भारत में 'नायक' कहलाते थे। समय के साथ कुछ जातियाँ राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने लगीं। यह स्पष्ट है कि जाति व्यवस्था स्थिर नहीं थी और समय के साथ इसमें परिवर्तन होते रहे।
इस एक हज़ार वर्षों की अवधि में भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में अनेक परिवर्तन हुए। भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरीं। अरब, तुर्क, अफगान और मुग़ल शासकों ने भारत पर आक्रमण किए और यहाँ स्थायी शासन स्थापित किया। मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद अठारहवीं शताब्दी में अनेक नए राज्य उभरे।
इसी काल में जनजातीय समुदायों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वनों में रहने वाले लोगों को 'जंगली' कहा जाता था, परंतु यह शब्द उनकी सामाजिक स्थिति को दर्शाता था, न कि उनकी सरलता को। इन समुदायों ने स्वयं को वर्ण व्यवस्था से बाहर रखा और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी।
इस काल में अनेक नई प्रौद्योगिकियाँ विकसित हुईं, जिन्होंने लोगों के जीवन को प्रभावित किया। पानी की सिंचाई के लिए 'रहट' (पर्शियन चक्का या Persian Wheel) का प्रयोग बढ़ा, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई। कताई के लिए 'चरखा' का प्रचलन हुआ। बारूद और आग्नेयास्त्रों (Firearms) के विकास ने युद्ध के तरीकों में बड़ा बदलाव किया।
इसी अवधि में कागज़ भारत में लाया गया। माना जाता है कि कागज़ ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में भारत आया। इन तकनीकी परिवर्तनों ने व्यापार, कृषि और शिल्प को प्रभावित किया। यह समझना महत्वपूर्ण है कि इतिहास में परिवर्तन केवल राजनीति तक सीमित नहीं थे, बल्कि तकनीक और जनजीवन में भी बड़े परिवर्तन होते रहे।
इस काल में मानचित्रण (Cartography) का भी विकास हुआ। आधुनिक युग से पहले भी मानचित्र बनाए जाते थे, परंतु वे आज के मानचित्रों से भिन्न थे। इन मानचित्रों में राजनीतिक सीमाओं के स्थान पर भौगोलिक विशेषताओं, नदियों, पहाड़ों और महत्वपूर्ण स्थलों को दर्शाया जाता था। मानचित्रों के अध्ययन से हमें यह जानने में सहायता मिलती है कि लोग उस समय अपने आस-पास की दुनिया को किस प्रकार देखते थे। बाद के यूरोपीय मानचित्रों में भारत को एक स्पष्ट राजनीतिक इकाई के रूप में दिखाया गया, जो आधुनिक विचारधारा का प्रतिबिंब था।
| यात्री | मूल स्थान | समय | रचना/विवरण |
|---|---|---|---|
| अल-बिरूनी | अरब/मध्य एशिया | 1022 ईस्वी | किताब-उल-हिंद |
| इब्नबतूता | मोरक्को | चौदहवीं शताब्दी | रिहला |
| फ्राँस्वा बर्नियर | फ्रांस | सत्रहवीं शताब्दी | ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पायर |
| शब्द | पुराना अर्थ | आधुनिक अर्थ |
|---|---|---|
| हिंदुस्तान | सिंधु के पश्चिम का प्रदेश (13वीं शताब्दी) | समग्र भारत |
| इंडिया | सिंधु नदी से जुड़ा ग्रीक शब्द | समग्र भारत |
| जंगली | वनवासी समुदाय की स्थिति | वन्य/बर्बर (आधुनिक भ्रामक अर्थ) |
| स्रोत | प्रकार | उदाहरण |
|---|---|---|
| पांडुलिपियाँ | लिखित | ताड़पत्र, भूर्ज-पत्र, कागज़ पर लिखे ग्रंथ |
| अभिलेख | लिखित | शिलालेख, प्रशस्तियाँ |
| सिक्के | पुरातात्विक | राजाओं के सिक्के |
| इमारतें | पुरातात्विक | मंदिर, मस्जिद, किले |
यह अध्याय हमें यह बताता है कि एक हज़ार वर्षों का काल परिवर्तन का काल था। इतिहासकार विभिन्न स्रोतों के माध्यम से इस काल का अध्ययन करते हैं। 'हिंदुस्तान' और 'इंडिया' जैसे शब्दों के अर्थ, जाति व्यवस्था, राजनीतिक परिदृश्य, नई तकनीकें और यात्रियों के विवरण हमें यह समझने में मदद करते हैं कि इतिहास में कुछ भी स्थिर नहीं है। इतिहास का अध्ययन हमें वर्तमान को समझने में भी सहायता करता है, क्योंकि वर्तमान अतीत की ही देन है। इस पड़ताल से यह स्पष्ट होता है कि परिवर्तन ही जीवन का नियम है और समाज, संस्कृति, भाषा तथा अर्थव्यवस्था में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं।