मध्यकालीन भारत में समाज केवल जातियों में ही विभाजित नहीं था। वर्ण व्यवस्था के बाहर भी अनेक समुदाय रहते थे, जिन्हें जनजातियाँ (Tribes) कहा जाता था। कुछ समुदाय खानाबदोश (घूम-घूमकर रहने वाले) थे, तो कुछ एक स्थान पर बसे हुए थे। इस अध्याय में हम जनजातियों के जीवन, उनके शासन, खानाबदोशों की भूमिका और एक स्थान पर बसे समुदायों की स्थिति का अध्ययन करेंगे।
जनजातीय समुदाय अपनी अलग-अलग परंपराएँ, भाषाएँ और जीवन-शैली रखते थे। वे प्रायः वनों, पहाड़ों और दुर्गम क्षेत्रों में रहते थे। इनमें से कुछ शिकारी-संग्राहक थे, कुछ पशुपालक, तो कुछ कृषक। जनजातियाँ वर्ण व्यवस्था से बाहर थीं और इनका अपना प्रशासन होता था।
जनजातीय लोग विभिन्न तरीकों से अपना जीवन यापन करते थे। कुछ जनजातियाँ शिकार करती थीं और वनों से जंगली फल, जड़ें और शहद इकट्ठा करती थीं। कुछ जनजातियाँ मछली पकड़ती थीं। कुछ समुदाय पशुपालन करते थे और अपने पशुओं के साथ घूमते थे। कुछ जनजातियाँ खेती करती थीं, जिन्हें 'एक जगह बसे हुए समुदाय' कहा जा सकता है।
जनजातीय समाज में भूमि पर सामूहिक स्वामित्व होता था। जनजाति का नेतृत्व उसके 'मुखिया' या 'सरदार' करता था। कुछ जनजातियों में महिलाएँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। जनजातीय लोग अपनी जीवन-शैली और रीति-रिवाजों के अनुसार ही अपने विवादों को सुलझाते थे।
खानाबदोश समुदाय एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। इनमें से कुछ पशुपालक थे, जो अपने पशुओं के लिए चरागाहों की तलाश में यात्रा करते थे। कुछ खानाबदोश व्यापार में लगे हुए थे। सबसे प्रसिद्ध खानाबदोश व्यापारी 'बंजारे' थे।
बंजारे गुजराती भाषा बोलते थे और अपने बैलों पर अनाज और अन्य सामान ढोकर व्यापार करते थे। वे विभिन्न क्षेत्रों के बीच सामान पहुँचाते थे। मुग़ल सेना को अनाज और रसद की आपूर्ति में बंजारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंजारों का व्यापार राष्ट्रीय स्तर का था। इसके अलावा गड़रिये, लोहार और कलाकार जैसे खानाबदोश समुदाय भी थे।
गोंड भारत की प्रमुख जनजातियों में से एक थी। गोंड मध्य भारत (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश) के विशाल क्षेत्र 'गोंडवाना' में रहते थे। गोंड कृषि और पशुपालन करते थे। धीरे-धीरे कुछ गोंड सरदार शक्तिशाली बन गए और उन्होंने अपने राज्य स्थापित किए।
गोंड राज्यों में 'गढ़' (मजबूत स्थान/किला) महत्वपूर्ण थे। गोंड राजा अपने अधीन क्षेत्रों का प्रशासन करते थे। गढ़कटंगा एक प्रसिद्ध गोंड राज्य था, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसमें लगभग 52,000 गाँव थे। गढ़कटंगा की प्रसिद्ध शासिका रानी दुर्गावती थीं, जिन्होंने अपने राज्य की रक्षा के लिए मुग़लों से युद्ध किया।
अहोम जनजाति ने असम में अपना शासन स्थापित किया। तेरहवीं शताब्दी में अहोमों ने असम में प्रवेश किया और धीरे-धीरे वहाँ के बड़े क्षेत्र पर अपना अधिकार जमाया। अहोम शासन में 'पाइक' नामक व्यवस्था थी, जिसके अनुसार वयस्क पुरुषों से एक निश्चित समय तक काम लिया जाता था। इससे राज्य को मजदूर उपलब्ध होते थे।
अहोमों ने अपने शासन में नई कृषि तकनीकें अपनाईं और बड़ी-बड़ी नहरें और जलाशय बनाए। अहोमों ने 'बुरंजी' नामक अपने इतिहास के अभिलेख भी लिखे, जिन्हें अहोम इतिहास लेखन माना जाता है। अहोम शासन लगभग छह सौ वर्षों तक चला।
कई समुदाय एक स्थान पर स्थायी रूप से बस गए थे। ये समुदाय कृषि पर निर्भर थे। इनमें से कुछ ने अपनी स्थिति सुधारी और वे शासक वर्ग से जुड़ गए। समय के साथ कुछ ऐसे समुदायों को वर्ण व्यवस्था में स्थान दिया जाने लगा। वे ब्राह्मण या क्षत्रिय कहलाने लगे।
परंतु सभी समुदाय इस सुधार से लाभान्वित नहीं हुए। जनजातीय लोगों और वनवासियों को 'जंगली' कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था। अनेक जनजातीय समुदाय कृषि और अन्य व्यवसाय अपनाने के बाद भी समाज में पूर्ण स्वीकृति नहीं पा सके।
जनजातीय समाज वर्ण व्यवस्था से अलग था। वर्ण व्यवस्था में जातियों को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में बाँटा गया था। जनजातियाँ इस व्यवस्था में शामिल नहीं थीं। धीरे-धीरे कुछ जनजातियाँ हिंदू धर्म की मान्यताओं से प्रभावित हुईं और वर्ण व्यवस्था में स्थान पाने का प्रयास किया।
परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि जनजातीय जीवन-शैली पूरी तरह बदल गई। जनजातियों ने अपनी भाषाएँ, रीति-रिवाज और जीवन-शैली बनाए रखी। आज भी अनेक जनजातीय समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान के साथ जीवन व्यतीत करते हैं।
जनजातियों ने भारतीय समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने वन संरक्षण में सहायता की, कृषि और पशुपालन में कुशलता दिखाई। बंजारे जैसे खानाबदोश समुदायों ने व्यापार और परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गोंड और अहोम जैसी जनजातियों ने शक्तिशाली राज्य स्थापित किए। जनजातियों की कला, संगीत और नृत्य भारतीय संस्कृति की धरोहर हैं।
| जनजाति | क्षेत्र | विशेषता |
|---|---|---|
| गोंड | गोंडवाना (मध्य भारत) | रानी दुर्गावती, गढ़कटंगा |
| अहोम | असम | पाइक व्यवस्था, बुरंजी |
| बंजारे | सभी क्षेत्र (घूमते थे) | अनाज व सामान का व्यापार |
| जीवन-शैली | विवरण |
|---|---|
| शिकारी-संग्राहक | शिकार और वन फल-जड़ें इकट्ठा करना |
| पशुपालक | पशुओं के साथ चरागाहों की तलाश |
| खानाबदोश व्यापारी | एक स्थान से दूसरे स्थान पर सामान ढोना |
| कृषक | एक स्थान पर बसकर खेती |
| विशेषता | गोंड | अहोम |
|---|---|---|
| क्षेत्र | मध्य भारत (गोंडवाना) | असम |
| शासन व्यवस्था | गढ़ (किले) | पाइक व्यवस्था |
| प्रसिद्ध शासक | रानी दुर्गावती | — |
| अभिलेख | — | बुरंजी |
मध्यकालीन भारत में जनजातियाँ, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय मिलकर समाज की विविधता का निर्माण करते थे। जनजातियाँ वर्ण व्यवस्था के बाहर रहती थीं और अपनी अलग जीवन-शैली, परंपराएँ और प्रशासन रखती थीं। बंजारे जैसे खानाबदोश व्यापारी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। गोंडों ने गोंडवाना में शक्तिशाली राज्य बनाए, जिनकी प्रसिद्ध शासिका रानी दुर्गावती थीं। अहोमों ने असम में लगभग छह सौ वर्षों तक शासन किया। इन समुदायों ने भारतीय संस्कृति, कृषि, व्यापार और कला में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस अध्याय से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय इतिहास केवल राजाओं और राज्यों का नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों और उनके जीवन का इतिहास है।