मरुस्थल पृथ्वी के सबसे कठोर क्षेत्रों में से एक हैं, फिर भी वहाँ जीवन का अद्भुत रूप देखने को मिलता है। मरुस्थलों में पौधे, जानवर और मानव सभी ने कठोर परिस्थितियों के अनुसार अपने जीवन को ढाल लिया है। इस अध्याय में हम सहारा (गर्म मरुस्थल) और लद्दाख (ठंडा मरुस्थल) में जीवन के विभिन्न पहलुओं - वनस्पति, वन्य जीवन, लोगों के जीवन और बस्तियों - का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
मरुस्थलों में वर्षा बहुत कम होती है, इसलिए वहाँ की वनस्पति सीमित होती है। पौधों ने कम पानी में जीवित रहने के लिए विशेष अनुकूलन विकसित किए हैं। जानवरों ने भी अपने शरीर को कठोर जलवायु के अनुसार ढाल लिया है।
सहारा मरुस्थल में वर्षा अत्यंत कम होती है, इसलिए वहाँ की वनस्पति बहुत सीमित है। सहारा में कंटीली झाड़ियाँ, छोटे पेड़ और कुछ प्रकार की घास पाई जाती है। ये पौधे कम पानी में जीवित रहने के लिए अनुकूलित हैं। इनकी जड़ें गहरी होती हैं और पत्तियाँ कांटों के रूप में बदल जाती हैं ताकि पानी की हानि कम हो।
ओएसिस में स्थिति भिन्न होती है। वहाँ भूमिगत जल उपलब्ध होने के कारण खजूर के पेड़ उगते हैं। खजूर सहारा के लोगों के लिए भोजन का महत्वपूर्ण स्रोत है। ओएसिस के आस-पास अन्य फसलें भी उगाई जाती हैं।
सहारा में जीवन कठोर होते हुए भी कुछ जानवर पाए जाते हैं। इनमें ऊँट सबसे महत्वपूर्ण है। ऊँट अपने कूबड़ में वसा संग्रहित करता है, जिससे वह लंबे समय तक बिना भोजन के रह सकता है। ऊँट के पैर रेत में चलने के लिए उपयुक्त होते हैं।
इसके अलावा सहारा में रेगिस्तानी लोमड़ी, रेत का साँप, गिरगिट और कुछ प्रकार के चूहे भी पाए जाते हैं। ये जानवर दिन की गर्मी में रेत में छिप जाते हैं और रात में सक्रिय होते हैं। इस प्रकार इन्होंने मरुस्थल की कठोर जलवायु के अनुसार अपना अनुकूलन किया है।
सहारा में मानव जीवन का एक अनोखा रूप देखने को मिलता है। यहाँ की अधिकांश आबादी खानाबदोश है। बद्दू और तुआरेग जैसे समुदाय ऊँट, बकरी और भेड़ पालते हैं। ये लोग अपने पशुओं के लिए चरागाह और पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं।
सहारा में जो लोग ओएसिस के पास बसे हैं, वे खेती करते हैं। वे खजूर और अन्य फसलें उगाते हैं। कुछ लोग मरुस्थल में नमक और अन्य खनिजों का व्यापार भी करते हैं। हाल के वर्षों में तेल और गैस की खुदाई ने कई लोगों को रोज़गार दिया है। सहारा के लोग ऊँट, खजूर और पशुधन पर निर्भर रहते हैं।
लद्दाख ठंडा मरुस्थल है, जहाँ बहुत कम वर्षा होती है और सर्दियों में भारी हिमपात होता है। इसलिए यहाँ की वनस्पति बहुत सीमित है। गर्मियों में पहाड़ी ढलानों पर छोटे पौधे और घास उगते हैं। इन चरागाहों में याक और भेड़ें चराई जाती हैं।
लद्दाख में कुछ विशेष प्रकार के वन्य जीव पाए जाते हैं। यहाँ स्नो लेपर्ड (हिम तेंदुआ), जंगली गधा और याक पाए जाते हैं। हिम तेंदुआ दुर्लभ है और ऊँचाई पर रहता है। लद्दाख में कुछ प्रकार के पक्षी भी पाए जाते हैं।
लद्दाख में मानव जीवन कठोर जलवायु के अनुसार ढला हुआ है। लद्दाख के लोग मुख्य रूप से पशुपालन और कृषि पर निर्भर हैं। गर्मियों में वे जौ, आलू और मटर उगाते हैं। चांगथांग पठार में याक और भेड़ें पाली जाती हैं। चांगथांगी बकरी और भेड़ से मिलने वाली पश्मीना ऊन से विश्व प्रसिद्ध पश्मीना शॉल बनती हैं।
लद्दाख के लोग कठोर सर्दियों की तैयारी के लिए गर्मियों में अनाज और चारा संग्रहित करते हैं। लद्दाख में बौद्ध मठ (गोम्पा) महत्वपूर्ण हैं, जो लोगों के धार्मिक और सामाजिक जीवन का केंद्र हैं। गर्मियों में मेले और त्योहार मनाए जाते हैं।
मरुस्थलों में पौधों, जानवरों और मानव ने विशेष अनुकूलन (Adaptation) विकसित किए हैं:
ये अनुकूलन मानव-पर्यावरण अन्योन्यक्रिया के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। मरुस्थलों में मानव ने पर्यावरण के साथ तालमेल बनाकर जीवन जीना सीखा है।
मरुस्थलों में आधुनिक विकास ने जीवन के स्वरूप को बदल दिया है। सहारा में तेल और गैस की खुदाई तथा पर्यटन से अर्थव्यवस्था बदल रही है। लद्दाख में पर्यटन और बेहतर परिवहन ने नए अवसर दिए हैं। परंतु इन विकासों से पर्यावरण पर दबाव भी बढ़ा है।
संतुलित विकास से ही मरुस्थलों की पारिस्थितिकी की रक्षा की जा सकती है। हमें इन कठोर क्षेत्रों की प्राकृतिक विरासत और वहाँ के लोगों की संस्कृति का सम्मान करना चाहिए।
| पहलू | सहारा | लद्दाख |
|---|---|---|
| वनस्पति | कंटीली झाड़ियाँ, खजूर (ओएसिस) | छोटे पौधे, घास |
| वन्य जीवन | ऊँट, रेगिस्तानी लोमड़ी, साँप | हिम तेंदुआ, याक, जंगली गधा |
| लोग | बद्दू, तुआरेग (खानाबदोश) | पशुपालक, किसान |
| मुख्य उत्पाद | खजूर, पशुधन | पश्मीना ऊन, जौ |
| जीव | अनुकूलन |
|---|---|
| ऊँट | कूबड़ में वसा, रेत में चलने के पैर |
| रेगिस्तानी जानवर | रात में सक्रियता, रेत में छिपना |
| मरुस्थलीय पौधे | कंटीली पत्तियाँ, गहरी जड़ें |
| लद्दाख के लोग | गर्मियों में अनाज संग्रहण |
| क्षेत्र | प्रसिद्ध वस्तु/तथ्य |
|---|---|
| सहारा | विश्व का सबसे बड़ा गर्म मरुस्थल |
| लद्दाख | भारत का ठंडा मरुस्थल |
| पश्मीना | चांगथांगी बकरी/भेड़ से ऊन |
मरुस्थलों में जीवन कठोर होते हुए भी अत्यंत अनोखा और विविध है। सहारा (गर्म मरुस्थल) में कंटीली झाड़ियाँ, ऊँट, रेगिस्तानी लोमड़ी और खानाबदोश बद्दू-तुआरेग समुदाय जीवन यापन करते हैं। ओएसिस में खजूर उगते हैं। लद्दाख (ठंडा मरुस्थल) में हिम तेंदुआ, याक और जंगली गधा पाए जाते हैं, और चांगथांग में पाली जाने वाली चांगथांगी बकरी-भेड़ से कीमती पश्मीना ऊन मिलती है। पौधों, जानवरों और मानव ने मरुस्थलों में विशेष अनुकूलन विकसित किए हैं। मानव ने पानी का विवेकपूर्ण उपयोग, खानाबदोश जीवन और अनाज संग्रहण के माध्यम से कठोर जलवायु से तालमेल बनाया है। तेल-गैस खुदाई और पर्यटन ने जीवन बदला है, परंतु संतुलित विकास ही इन क्षेत्रों का भविष्य सुरक्षित कर सकता है।