हर व्यक्ति बचपन से बड़ा होकर युवा और फिर वयस्क बनता है। परंतु लड़कों और लड़कियों के बड़े होने के तरीके अक्सर भिन्न होते हैं। समाज में लड़के और लड़कियों से अलग-अलग अपेक्षाएँ की जाती हैं। इस अध्याय में हम यह समझेंगे कि लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना किस प्रकार भिन्न होता है, घर और बाहर का विभाजन क्या है, और लैंगिक असमानता के क्या प्रभाव हैं।
समाज में लड़कियों को घर के कामों में सहायता की अपेक्षा होती है, जबकि लड़कों को अधिक स्वतंत्रता मिलती है। यह अंतर हमें समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता (Gender Inequality) को समझने में मदद करता है।
समाज में प्रायः एक 'घर और बाहर' (Public and Private) का विभाजन देखा जाता है। इस विभाजन के अनुसार:
यह विभाजन समाज में गहराई से जुड़ा हुआ है। महिलाओं द्वारा किया जाने वाला घर का काम प्रायः 'काम' नहीं माना जाता, जबकि यह अत्यंत कठिन और समय लेने वाला होता है। इस कारण महिलाओं के काम को उचित मूल्य और सम्मान नहीं मिलता।
लड़के और लड़कियों के बड़े होने के तरीके समाज द्वारा प्रभावित होते हैं। लड़कियों को घर के कामों (खाना बनाना, सफाई, छोटे बच्चों की देखभाल) में सहायता करनी पड़ती है। वे कम समय खेल पाती हैं। दूसरी ओर लड़कों को अधिक स्वतंत्रता मिलती है और वे अधिक समय बाहर खेल सकते हैं।
समाज में कुछ विशिष्ट खेल और गतिविधियाँ लड़कों के लिए और कुछ लड़कियों के लिए निर्धारित कर दी जाती हैं। उदाहरण के लिए, क्रिकेट या फुटबॉल को लड़कों का खेल और गुड़िया या घर-घर खेलने को लड़कियों का खेल माना जाता है। ये रूढ़ियाँ (Stereotypes) लोगों की सोच को प्रभावित करती हैं।
पाठ्यपुस्तक में समोआ (Samoa) द्वीप का उदाहरण दिया गया है। समोआ प्रशांत महासागर में स्थित एक देश है। मार्गरेट मीड नामक विद्वान ने 1928 में 'ग्रोइंग अप इन समोआ' नामक पुस्तक लिखी। उसके अनुसार, समोआ में बच्चे घर के कामों में सहायता नहीं करते और स्कूल से वापस आकर वे खेलते हैं। वहाँ की जीवन-शैली भारत से भिन्न थी।
समोआ के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि 'बड़ा होना' विभिन्न समाजों में भिन्न होता है। किसी समाज की स्थिति, जलवायु और रीति-रिवाज इस पर प्रभाव डालते हैं।
पाठ्यपुस्तक में 'मध्य प्रदेश में पुरुष बनना' (Growing up male in Madhya Pradesh) शीर्षक से शांति नगर (गाँव का नाम) का अध्ययन दिया गया है। इस अध्ययन से पता चलता है कि लड़के पुलिस और सेना जैसे कठोर क्षेत्रों में रोज़गार पाना चाहते थे। लड़कों को अधिक स्वतंत्रता मिलती थी और वे बाहर खेलते थे।
शांति नगर में यह भी देखा गया कि कुछ लड़कियाँ भी स्कूल जाती थीं, परंतु उन्हें घर के काम भी करने पड़ते थे। इस प्रकार घर का काम लड़कियों पर अतिरिक्त बोझ था। यह अध्ययन दर्शाता है कि लैंगिक असमानता बचपन से ही शुरू होती है।
घरेलू काम (Housework) अत्यंत महत्वपूर्ण है, किंतु समाज में इसे अक्सर कम महत्व दिया जाता है। घर की सफाई, खाना बनाना, कपड़े धोना और बच्चों की देखभाल जैसे कार्य करने में बहुत समय और श्रम लगता है। परंतु इन कार्यों को 'काम' नहीं माना जाता, क्योंकि इनके लिए मजदूरी नहीं मिलती।
घरेलू काम करने वाली महिलाओं और लड़कियों का श्रम अदृश्य रहता है। इससे महिलाओं को उचित सम्मान नहीं मिलता। हमें घरेलू काम के महत्व को पहचानना चाहिए और इसे सम्मान देना चाहिए।
लैंगिक असमानता (Gender Inequality) के अनेक नकारात्मक प्रभाव होते हैं:
ये असमानताएँ समाज के विकास में बाधक हैं। लड़के और लड़कियों को समान अवसर मिलने चाहिए, तभी समाज प्रगति कर सकता है।
लैंगिक समानता की दिशा में अनेक कदम उठाए गए हैं। शिक्षा के अवसर बढ़ाए गए हैं और महिलाओं को कानूनी अधिकार दिए गए हैं। समाज में जागरूकता बढ़ रही है कि लड़के और लड़कियाँ समान हैं।
परंतु अभी भी बहुत काम करना बाकी है। हमें घर के कामों को बाँटना चाहिए, लड़कियों को शिक्षा के समान अवसर देने चाहिए और रूढ़ियों को तोड़ना चाहिए। लड़के और लड़कियों दोनों को स्वतंत्र रूप से अपने सपनों को पूरा करने का अधिकार है।
| क्षेत्र | कार्य | संबंध |
|---|---|---|
| घर (निजी) | खाना, सफाई, बच्चों की देखभाल | प्रायः महिलाएँ/लड़कियाँ |
| बाहर (सार्वजनिक) | नौकरी, व्यापार, राजनीति | प्रायः पुरुष/लड़के |
| अध्ययन | विशेषता |
|---|---|
| समोआ (मार्गरेट मीड, 1928) | प्रशांत महासागर, भिन्न जीवन-शैली |
| शांति नगर (मध्य प्रदेश) | लड़कों की स्वतंत्रता, लड़कियों का बोझ |
| रूढ़ि | उदाहरण |
|---|---|
| लड़कों के खेल | क्रिकेट, फुटबॉल |
| लड़कियों के खेल | गुड़िया, घर-घर |
लड़के और लड़कियों के बड़े होने के तरीके समाज द्वारा प्रभावित होते हैं। समाज में 'घर और बाहर' का विभाजन होता है, जिसमें घर के काम महिलाओं से और बाहरी काम पुरुषों से जोड़े जाते हैं। लड़कियों को घर के कामों का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है, जबकि लड़कों को अधिक स्वतंत्रता मिलती है। समोआ (मार्गरेट मीड का अध्ययन) और शांति नगर (मध्य प्रदेश) के अध्ययन दर्शाते हैं कि बड़ा होना विभिन्न समाजों में भिन्न होता है। घरेलू काम अत्यंत महत्वपूर्ण होते हुए भी कम सम्मान पाता है। लैंगिक असमानता लड़कियों और लड़कों दोनों को प्रभावित करती है। समानता की दिशा में हमें घर के कामों को बाँटना चाहिए, लड़कियों को शिक्षा के समान अवसर देने चाहिए और समाज की रूढ़ियों को तोड़ना चाहिए। तभी समाज में वास्तविक समानता स्थापित हो सकती है।