1526 ईस्वी में बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को पराजित करके मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी। मुग़लों ने लगभग तीन सौ वर्षों तक भारत के अधिकांश भाग पर शासन किया। यह अध्याय मुग़ल साम्राज्य के विकास, अकबर की प्रशासनिक नीतियों, मनसबदारी व्यवस्था और मुग़ल शासन की मुख्य विशेषताओं का अध्ययन करता है।
मुग़ल वंश चंगेज़ खान (मंगोल शासक) और तैमूर से अपना वंश जोड़ता था। चंगेज़ खान की स्मृति के कारण ही मुग़लों के विरोधी उन्हें 'मुग़ल' (मंगोल) कहते थे। मुग़ल शासकों ने उत्तर-पश्चिम से दक्षिण तक, सिंधु से ब्रह्मपुत्र तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
बाबर (1526-1530) ने मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी। उसके बाद उसका पुत्र हुमायूँ (1530-1540, फिर 1555-1556) सिंहासन पर बैठा। हुमायूँ को शेरशाह सूरी से पराजय मिली, और उसे कुछ समय के लिए भारत छोड़ना पड़ा। शेरशाह ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। परंतु शेरशाह की मृत्यु के बाद हुमायूँ ने 1555 में वापस दिल्ली प्राप्त की। अगले वर्ष उसकी मृत्यु हो गई।
हुमायूँ की मृत्यु के समय उसका पुत्र अकबर केवल 13 वर्ष का था। अकबर को 1556 में सिंहासन पर बिठाया गया और उसके संरक्षक के रूप में बैरम ख़ाँ ने शासन संभाला। बैरम ख़ाँ की सहायता से अकबर ने पानीपत के द्वितीय युद्ध (1556) में हेमू को पराजित किया।
अकबर (1556-1605) ने अपने शासन के दौरान अनेक क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की। उसने आगरा, दिल्ली, अजमेर, जौनपुर, ग्वालियर और दक्षिण तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। सोलहवीं शताब्दी के अंत तक उत्तर भारत का अधिकांश भाग, मध्य भारत, पूर्वी भारत (बंगाल तक) और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र मुग़ल साम्राज्य के अधीन थे।
अकबर की नीति में धार्मिक सहिष्णुता प्रमुख थी। उसने 'सुलह-ए-कुल' (सार्वभौमिक शांति) की नीति अपनाई। उसने विभिन्न धर्मों के बारे में जानने के लिए फतेहपुर सीकरी में 'इबादत ख़ाना' नामक चर्चा सभा का निर्माण कराया। 1582 में उसने 'दीन-ए-इलाही' की स्थापना की, जो धर्मों के बीच समन्वय का प्रयास था।
अकबर की प्रशासनिक व्यवस्था का मुख्य आधार 'मनसबदारी' थी। इस व्यवस्था में प्रत्येक अधिकारी को एक पद (मनसब) प्राप्त होता था। मनसबदार को उसकी पदवी के अनुसार 'ज़ात' और 'सवार' अंक दिए जाते थे। 'ज़ात' उसके वेतन को निर्धारित करता था, जबकि 'सवार' घोड़ों की संख्या को दर्शाता था, जिन्हें वह रखता था।
मनसबदार को अपनी आय के लिए 'जागीर' दी जाती थी। जागीर से मिलने वाली आय से वह अपने वेतन और सैनिकों के खर्चों की पूर्ति करता था। मनसबदारी व्यवस्था में अधिकारियों की नियुक्ति और पदोन्नति सम्राट द्वारा होती थी। इस व्यवस्था से शाही नियंत्रण बना रहता था।
मुग़ल साम्राज्य को प्रांतों (सूबों) में बाँटा गया था। प्रत्येक सूबे का शासक 'सूबेदार' (गवर्नर) होता था। सूबेदार के साथ अन्य अधिकारी भी होते थे, जैसे दीवान (राजस्व विभाग प्रमुख), बख़्शी (सैन्य विभाग प्रमुख), क़ाज़ी (न्यायाधीश) और कोतवाल (पुलिस)। सम्राट सभी महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियाँ करता था।
मुग़ल साम्राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमि कर था। किसानों से कर वसूलने का कार्य ज़मींदार करते थे। ज़मींदार उस क्षेत्र के प्रमुख होते थे जो कर एकत्र करते थे और उसमें से अपना हिस्सा रखते थे। कभी-कभी वे मुग़लों के विरुद्ध भी विद्रोह करते थे।
अकबर के बाद जहाँगीर (1605-1627) सिंहासन पर बैठा। जहाँगीर के शासन में उसकी पत्नी नूरजहाँ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जहाँगीर के बाद शाहजहाँ (1627-1658) शासक बना। शाहजहाँ के काल में मुग़ल वास्तुकला अपने चरम पर पहुँची। उसने आगरा में ताजमहल, दिल्ली में लाल किला और जामा मस्जिद का निर्माण कराया।
शाहजहाँ के बाद औरंगज़ेब (1658-1707) ने शासन संभाला। औरंगज़ेब ने दक्कन में विशेष अभियान चलाए और साम्राज्य का विस्तार दक्षिण तक किया। परंतु उसकी कठोर नीतियों के कारण उसके शासन में अनेक विद्रोह हुए। सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक मुग़ल साम्राज्य विशाल हो गया था, परंतु उसका नियंत्रण कमजोर पड़ने लगा था।
मुग़ल साम्राज्य की अर्थव्यवस्था में किसानों और शिल्पकारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। किसानों से भूमि कर वसूला जाता था। उन्हें अपनी फसल का एक बड़ा हिस्सा कर के रूप में देना पड़ता था। शिल्पकार (कारीगर) कपड़ा, धातु के बर्तन और अन्य सामान बनाते थे। मुग़ल शासन के अधीन व्यापार भी बढ़ा, विशेष रूप से सूती वस्त्रों का।
इन परिस्थितियों में किसानों पर भारी कर बोझ था। अकबर के काल में भूमि राजस्व व्यवस्था का पुनर्गठन किया गया, जिसे 'दहसाला व्यवस्था' के रूप में जाना जाता है। इससे कर निर्धारण अधिक व्यवस्थित हुआ।
औरंगज़ेब की मृत्यु (1707) के बाद मुग़ल साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा। उसके उत्तराधिकारी कमजोर शासक थे। विभिन्न क्षेत्रों में नए राज्य उभरने लगे। अठारहवीं शताब्दी में मुग़ल सम्राट केवल नाम मात्र के शासक रह गए। इस प्रकार मुग़ल साम्राज्य का पतन होने लगा।
| शासक | शासनकाल | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| बाबर | 1526-1530 | पानीपत का प्रथम युद्ध |
| हुमायूँ | 1530-1556 | पुनः दिल्ली प्राप्ति (1555) |
| अकबर | 1556-1605 | मनसबदारी, सुलह-ए-कुल |
| जहाँगीर | 1605-1627 | नूरजहाँ का प्रभाव |
| शाहजहाँ | 1627-1658 | ताजमहल, लाल किला |
| औरंगज़ेब | 1658-1707 | दक्कन विजय, साम्राज्य विस्तार |
| पद/अंक | विवरण |
|---|---|
| मनसब | अधिकारी का पद/रैंक |
| ज़ात | वेतन निर्धारण |
| सवार | घोड़ों की संख्या |
| जागीर | मनसबदार को दी गई भूमि की आय |
| पद | कार्य |
|---|---|
| सूबेदार | प्रांत का गवर्नर |
| दीवान | राजस्व विभाग प्रमुख |
| बख़्शी | सैन्य विभाग प्रमुख |
| क़ाज़ी | न्यायाधीश |
| ज़मींदार | भूमि कर वसूली |
मुग़ल साम्राज्य भारतीय इतिहास के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। 1526 में बाबर की विजय से प्रारंभ होकर यह साम्राज्य अकबर के काल में अपने चरम पर पहुँचा। अकबर की सुलह-ए-कुल की नीति, मनसबदारी व्यवस्था और सुदृढ़ प्रशासन ने साम्राज्य को मजबूती दी। शाहजहाँ के काल में कला और वास्तुकला का विकास चरम पर था, जिसके प्रमाण ताजमहल और लाल किला हैं। औरंगज़ेब ने साम्राज्य का विस्तार तो किया, परंतु उसकी नीतियों से विद्रोह बढ़े। 1707 में उसकी मृत्यु के बाद साम्राज्य का ह्रास प्रारंभ हुआ। मुग़ल काल ने भारतीय संस्कृति, कला, स्थापत्य और प्रशासन पर अमिट छाप छोड़ी।