प्राचीन और मध्यकालीन भारत में अनेक प्रकार के नगर थे। कुछ नगर प्रशासनिक केंद्र थे, कुछ मंदिरों और तीर्थ स्थलों के कारण प्रसिद्ध थे, तो कुछ व्यापार और शिल्प के केंद्र। इस अध्याय में हम विभिन्न प्रकार के नगरों, व्यापारियों और शिल्पकारों के जीवन तथा भारत के व्यापारिक संबंधों का अध्ययन करेंगे। विशेष रूप से थंजावुर, हम्पी, सूरत और मसुलीपट्टनम जैसे नगरों का विवरण हमें उस युग की आर्थिक स्थिति को समझने में मदद करेगा।
नगरों का विकास व्यापार, कृषि, शिल्प और प्रशासन से जुड़ा था। व्यापारी और शिल्पकार नगरों की आर्थिक जीवन-रेखा थे। उनके संगठन 'श्रेणी' व्यापार को व्यवस्थित करने में सहायक थे।
मध्यकालीन भारत में नगर विभिन्न उद्देश्यों के लिए विकसित हुए:
कई नगर एक से अधिक विशेषताएँ भी रखते थे। मंदिरों के आस-पास बाज़ार और बस्तियाँ बन जाती थीं। बाज़ारों को 'मंडी' कहा जाता था, जो 'मंडपिका' (एक संस्कृत शब्द) से बना था। गाँवों में भी पाक्षिक या साप्ताहिक 'हाट' लगते थे।
थंजावुर (तंजौर) एक प्रसिद्ध मंदिर नगर था। चोल शासक राजाराजा प्रथम ने यहाँ बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर के कारण थंजावुर में विशाल आबादी बस गई। मंदिर न केवल धार्मिक, बल्कि आर्थिक केंद्र भी था। मंदिर के चारों ओर बाज़ार और कार्यशालाएँ (हस्तकला के स्थान) विकसित हुईं।
मंदिरों में भूमि, अनाज और अन्य दान जमा होते थे। मंदिर का प्रशासन स्वतंत्र था। मंदिर में काम करने वाले अनेक कारीगर, माली, संगीतकार और नर्तक होते थे। बृहदेश्वर मंदिर को 'राजराजेश्वर' भी कहा जाता था। थंजावुर को उत्कृष्ट कांस्य मूर्ति निर्माण के लिए भी जाना जाता था।
हम्पी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी थी। यहाँ कपास, मसाले, अनाज और कीमती पत्थरों का व्यापार होता था। हम्पी के बाज़ारों में शानदार मंदिर और हवेलियाँ थीं। हम्पी एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और धार्मिक केंद्र था। यह बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित मसुलीपटनम से भी जुड़ा था।
मसुलीपट्टनम बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था। यह कालीन (carpet) निर्माण के लिए प्रसिद्ध था। गोलकोंडा के शासकों के अधीन मसुलीपट्टनम का व्यापार बढ़ा। परंतु अठारहवीं शताब्दी में विदेशी व्यापारियों के बढ़ते प्रभाव के कारण मसुलीपट्टनम का महत्व घट गया।
सूरत गुजरात में अरब सागर के तट पर स्थित एक प्रसिद्ध बंदरगाह था। यहाँ से पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप के साथ व्यापार होता था। सूरत के बंदरगाह से कपास, रेशम, मसाले और कीमती पत्थर निर्यात होते थे। सूरत को 'पश्चिम का बंदरगाह' और 'मक्का का बंदरगाह' भी कहा जाता था, क्योंकि हज यात्री यहीं से जहाज़ पकड़ते थे।
सूरत में अनेक व्यापारी समुदाय रहते थे, जैसे पारसी, जैन और हिंदू व्यापारी। सत्रहवीं शताब्दी में सूरत का व्यापार अपने चरम पर था। परंतु अठारहवीं शताब्दी में बंबई के बढ़ने से सूरत का महत्व कम हुआ।
1498 में पुर्तगाली यात्री वास्को-डी-गामा भारत के कालीकट बंदरगाह पहुँचा। इसके बाद यूरोपीय व्यापारी भारत में व्यापार करने लगे। सत्रहवीं शताब्दी में डच, अंग्रेज़ (ब्रिटिश) और फ्रांसीसी व्यापारी कंपनियाँ भारत आईं। अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1600 में हुई।
यूरोपीय कंपनियों ने भारत के तटों पर कारखाने (factories) स्थापित किए। अंग्रेज़ों ने 1639 में चेन्नई (मद्रास) में फोर्ट सेंट जॉर्ज बनाया। पुर्तगालियों से बंबई (मुंबई) 1661 में अंग्रेज़ी राजकुमारी के विवाह में दहेज़ के रूप में मिला। बाद में अंग्रेज़ों ने कलकत्ता (कोलकाता) में फोर्ट विलियम स्थापित किया। धीरे-धीरे अंग्रेज़ व्यापारी भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर भी हावी होने लगे।
मध्यकालीन भारत में शिल्पकार अत्यंत कुशल थे। वे कपड़े, धातु के बर्तन, आभूषण, हाथीदाँत की वस्तुएँ और मिट्टी के बर्तन बनाते थे। कुछ नगर विशेष शिल्पों के लिए प्रसिद्ध थे। उदाहरण के लिए, ढाका मलमल के लिए और सूरत कपड़ा बुनाई के लिए प्रसिद्ध था। शिल्पकार अनेक प्रकार की वस्तुएँ बनाते थे जिन्हें व्यापारी दूर-दूर तक बेचते थे।
व्यापारी अपनी सुरक्षा के लिए समूह बनाते थे, जिन्हें 'श्रेणी' कहा जाता था। श्रेणी का प्रमुख 'श्रेष्ठी' कहलाता था। श्रेणी व्यापारिक विवादों को सुलझाती थी, कीमतें निर्धारित करती थी और व्यापारियों के हितों की रक्षा करती थी। इस प्रकार श्रेणी ने व्यापार को व्यवस्थित बनाया।
भारतीय व्यापारी मसाले, कपास, रेशम, हाथीदाँत और कीमती पत्थरों का व्यापार करते थे। ये वस्तुएँ पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप तक पहुँचती थीं। बदले में भारत में सोना, चाँदी और अन्य वस्तुएँ आती थीं। इस व्यापार से भारतीय नगरों की समृद्धि बढ़ी और उनका महत्व यूरोपीय व्यापारियों के लिए बढ़ा। व्यापार के इस विस्तार ने बाद में यूरोपीय कंपनियों के भारत में राजनीतिक हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त किया।
| नगर | प्रकार | विशेषता |
|---|---|---|
| थंजावुर | मंदिर नगर | बृहदेश्वर मंदिर |
| हम्पी | व्यापारिक-धार्मिक नगर | विजयनगर साम्राज्य की राजधानी |
| सूरत | बंदरगाह नगर | पश्चिमी व्यापार का केंद्र |
| मसुलीपट्टनम | बंदरगाह नगर | कालीन निर्माण, बंगाल की खाड़ी तट |
| मदुरै | मंदिर नगर | मीनाक्षी मंदिर |
| कंपनी | वर्ष | प्रमुख केंद्र |
|---|---|---|
| पुर्तगाली | 1498 | कालीकट, गोवा |
| अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी | 1600 | सूरत, मद्रास (1639), बंबई, कलकत्ता |
| डच | सत्रहवीं शताब्दी | दक्षिण-पूर्वी तट |
| फ्रांसीसी | सत्रहवीं शताब्दी | पांडिचेरी |
| नगर | प्रसिद्ध शिल्प |
|---|---|
| ढाका | मलमल |
| सूरत | कपड़ा बुनाई |
| मसुलीपट्टनम | कालीन |
| थंजावुर | कांस्य मूर्तियाँ |
मध्यकालीन भारत में नगर, व्यापारी और शिल्पकार एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े थे। मंदिर नगर, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर और प्रशासनिक नगर भारत की आर्थिक समृद्धि के केंद्र थे। थंजावुर के मंदिर, हम्पी का वैभव, सूरत का बंदरगाह और मसुलीपट्टनम की कालीनें उस युग की समृद्धि दर्शाती हैं। श्रेणी जैसे संगठनों ने व्यापार को व्यवस्थित बनाया। 1498 में वास्को-डी-गामा के आगमन से भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक संबंध प्रगाढ़ हुए। धीरे-धीरे यूरोपीय कंपनियों का प्रभाव बढ़ा, जो अंततः भारतीय इतिहास के लिए महत्वपूर्ण परिवर्तनों का कारण बना।