सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक नए राजवंशों का उदय हुआ। इन राजवंशों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपने राज्य स्थापित किए। इस अध्याय में हम राष्ट्रकूट, गुर्जर-प्रतिहार, चोल, पाल जैसे प्रमुख राजवंशों के उदय और उनके शासन व्यवस्था का अध्ययन करेंगे। विशेष रूप से चोल वंश, जिसने दक्षिण भारत में शक्तिशाली राज्य स्थापित किया, और उसकी प्रशासनिक व्यवस्था के बारे में विस्तार से जानेंगे।
इस युग की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि नए राजवंश अधिकतर सैन्य नेताओं (योद्धाओं) के वंशज थे, जिन्होंने अपने पिता या संरक्षक की सेवा करते हुए पदोन्नति पाई और बाद में स्वयं के शासक बन गए। इनमें से कई शासकों ने न केवल सैन्य शक्ति से, बल्कि चतुर राजनीति से भी अपने राज्य का विस्तार किया।
सातवीं शताब्दी तक अनेक क्षेत्रीय शासकों का उदय हुआ। इनमें से कुछ प्रमुख राजवंश थे: राष्ट्रकूट (दक्कन क्षेत्र), गुर्जर-प्रतिहार (पश्चिमी भारत), पाल (बंगाल), चोल (तमिल क्षेत्र), चालुक्य (बादामी), पल्लव और कदंब। इनमें से राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग ने कर्नाटक के चालुक्यों को पराजित करके अपना राज्य स्थापित किया।
बंगाल में हरिश्चंद्र नामक एक छोटे राज्य का शासक बाद में बड़े क्षेत्र का राजा बना। इन नए शासकों ने ब्राह्मणों को भूमि दान दी और उनकी सहायता से अपने राज्य को वैधता प्रदान करने का प्रयास किया। ब्राह्मणों ने उनके लिए प्रशस्तियाँ (स्तुतियाँ) लिखीं और उनकी वंशावलियाँ रचीं, जिनमें उन्हें प्राचीन वीरों और देवताओं से जोड़ा गया। इस प्रकार सामंतों और राजाओं के बीच संबंध बनते गए, जिन्हें 'सामंत' कहा गया।
राजा के अधीन अनेक योद्धा होते थे, जिन्हें 'सामंत' कहा जाता था। राजा या मुख्य सामंत उन्हें भूमि का कुछ हिस्सा देता था, और बदले में वे उसके प्रति निष्ठावान रहते थे। यह संबंध अनुबंध पर आधारित था। जब सामंत शक्तिशाली हो जाते थे, तो वे स्वयं शासक बन जाते थे। यह व्यवस्था 'सामंतवाद' कहलाती है।
राजाओं ने किसानों और पशुपालकों से कर (भूमिकर) वसूल किया। कुछ क्षेत्रों में ग्राम सभाएँ भी सक्रिय थीं। युद्धों के समय शासकों को विशेष सैनिकों की आवश्यकता होती थी। हाथियों, घोड़ों और रथों का उपयोग किया जाता था। शासकों ने अपने राज्य की सुरक्षा के लिए स्थायी सेनाएँ भी बनाईं।
चोल वंश की स्थापना नवीं शताब्दी में विजयालय ने की थी, जिसने तंजौर (थंजावुर) पर अधिकार किया। विजयालय ने श्रीनिवासलय (निशुंभसुदिनी) नामक मंदिर का निर्माण कराया। चोलों की राजधानी तंजावुर थी।
चोलों के महानतम शासक राजाराजा प्रथम (985-1014 ईस्वी) और राजेंद्र प्रथम (1014-1044 ईस्वी) थे। राजाराजा प्रथम ने तंजावुर में प्रसिद्ध बृहदेश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर का निर्माण कराया। राजेंद्र प्रथम ने अपने राज्य का विस्तार किया और अपनी नई राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम में एक मंदिर का निर्माण कराया। राजेंद्र ने उत्तरी भारत के गंगा नदी क्षेत्र तक अपनी विजय का विस्तार किया था।
चोल साम्राज्य की आर्थिक शक्ति का आधार कावेरी नदी के डेल्टा क्षेत्र में होने वाली खेती थी। यहाँ हल से खेती की जाती थी। गाँव के किसान नए तरीकों से खेती करते थे। सिंचाई के लिए तालाबों और नहरों का निर्माण किया गया। बेगर (जलाशय) जैसे तालाबों से खेतों की सिंचाई होती थी।
कावेरी डेल्टा के गाँवों की भूमि को प्रायः कुछ वर्षों में बाँट दिया जाता था ताकि बराबरी से खेती हो सके। इसके लिए ग्राम सभाएँ उत्तरदायी थीं। व्यापारियों और शिल्पकारों के समूह, जिन्हें 'श्रेणी' या दक्षिण में 'नगरम' कहा जाता था, महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
चोल साम्राज्य में प्रशासन का प्रमुख केंद्र गाँव था। राज्य को विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में बाँटा गया था। क्षेत्रों को 'नाडु' कहा जाता था। गाँवों में ग्राम सभाएँ होती थीं, जिन्हें 'सभा' कहा जाता था। सभा के सदस्य अधिकतर भू-स्वामी होते थे। वे कर वसूली, सिंचाई, भूमि बँटवारे और मंदिरों के रखरखाव जैसे कार्य देखते थे।
ग्राम सभाओं की बैठकें मंदिरों के प्रांगण में होती थीं। 'उर' भी एक प्रकार की स्थानीय सभा थी, जो उन गाँवों में होती थी जहाँ भू-स्वामी नहीं रहते थे। चोल शासकों ने ग्राम सभाओं को विशेष अधिकार दिए और उनके निर्णयों को मान्यता दी। इस प्रकार चोल प्रशासन में स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन मिला।
इसी काल में कुछ अन्य राजवंश भी उभरे, जैसे दक्षिण-पश्चिम में कदंब, बादामी के चालुक्य और कांची के पल्लव। इन सभी ने कला, स्थापत्य और साहित्य को प्रोत्साहन दिया। चालुक्यों ने बादामी (वातापी) में प्रसिद्ध मंदिर बनवाए। पल्लवों ने महाबलीपुरम के मंदिर बनवाए। इन राजवंशों के शासन में मंदिर न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और आर्थिक केंद्र भी बन गए। मंदिरों में भूमि, अनाज और अन्य दान एकत्र होते थे, जिनका उपयोग मंदिर के रखरखाव और गरीबों की सहायता के लिए होता था।
| राजवंश | क्षेत्र | प्रमुख शासक |
|---|---|---|
| राष्ट्रकूट | दक्कन | दंतिदुर्ग |
| गुर्जर-प्रतिहार | पश्चिमी भारत | — |
| पाल | बंगाल | — |
| चोल | तमिल क्षेत्र | राजाराजा प्रथम, राजेंद्र प्रथम |
| चालुक्य | बादामी (कर्नाटक) | — |
| पल्लव | कांची | — |
| इकाई | विवरण |
|---|---|
| नाडु | प्रशासनिक क्षेत्र/प्रांत |
| सभा | भू-स्वामियों की ग्राम सभा |
| उर | सामान्य निवासियों की स्थानीय सभा |
| श्रेणी/नगरम | व्यापारियों एवं शिल्पकारों का समूह |
| मंदिर | निर्माता | स्थान |
|---|---|---|
| बृहदेश्वर मंदिर | राजाराजा प्रथम | तंजावुर |
| गंगैकोंडचोलपुरम मंदिर | राजेंद्र प्रथम | गंगैकोंडचोलपुरम |
| श्रीनिवासलय मंदिर | विजयालय | तंजावुर |
सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच नए राजवंशों के उदय ने भारतीय इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। राष्ट्रकूट, पाल, गुर्जर-प्रतिहार और विशेष रूप से चोल वंश ने शक्तिशाली राज्य स्थापित किए। सामंतवाद की व्यवस्था ने शासकों और योद्धाओं के बीच घनिष्ठ संबंध बनाए। चोलों की प्रशासनिक व्यवस्था, विशेष रूप से ग्राम सभाओं की सक्रियता, उस काल की प्रगतिशील सोच को दर्शाती है। बृहदेश्वर जैसे विशाल मंदिर उस युग की इंजीनियरिंग और कला के प्रमाण हैं। कावेरी डेल्टा की समृद्ध कृषि ने चोल साम्राज्य को आर्थिक शक्ति प्रदान की। यह अध्याय हमें बताता है कि किस प्रकार सैन्य शक्ति, राजनीतिक कौशल और कृषि के विकास ने मिलकर इन राज्यों को सफल बनाया।