समानता लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। संविधान के अनुसार, कानून की दृष्टि में सभी लोग समान हैं। चाहे कोई व्यक्ति किसी भी जाति, धर्म, लिंग या स्थान का हो, उसे समान अधिकार मिलते हैं। इस अध्याय में हम समानता के महत्व, कानून के समक्ष समानता और समानता के लिए किए गए प्रयासों का अध्ययन करेंगे।
समानता का अर्थ है सभी लोगों को समान अवसर और अधिकार मिलना। परंतु समाज में अनेक प्रकार की असमानताएँ (जाति, धर्म, लिंग के आधार पर भेदभाव) मौजूद हैं। इन असमानताओं को दूर करना ही समानता की स्थापना है।
भारतीय संविधान कानून के समक्ष सभी लोगों को समान मानता है। इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति, चाहे वह अमीर हो या गरीब, उच्च जाति का हो या निम्न, पुरुष हो या महिला, कानून के सामने बराबर है। कानून से कोई भी व्यक्ति ऊपर नहीं है।
संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, जन्म स्थान या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। संविधान के अनुच्छेद 17 ने 'अस्पृश्यता' (Untouchability) को समाप्त कर दिया है। इस प्रकार संविधान ने समानता को कानूनी अधिकार बना दिया है।
हमारे संविधान ने सभी वयस्क नागरिकों को समान मतदान का अधिकार दिया है। इस व्यवस्था को 'सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार' (Universal Adult Franchise) कहते हैं। इसका अर्थ है कि 18 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक नागरिक, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो, वोट दे सकता है। इससे प्रत्येक व्यक्ति को राजनीतिक प्रक्रिया में समान भागीदारी का अवसर मिलता है।
समानता केवल कानून में ही नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आवश्यक है। स्कूलों में, सरकारी नौकरियों में और सार्वजनिक स्थानों पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। समाज में समान अवसरों की व्यवस्था आवश्यक है।
समाज में अनेक प्रकार की असमानताएँ मौजूद हैं। जाति के आधार पर भेदभाव सबसे पुराना भेदभाव है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी इसका उदाहरण है। उन्हें बचपन में स्कूल में झाड़ू लगाने के लिए मजबूर किया गया और उन्हें ऊँची जाति के बच्चों के बगल में बैठने की अनुमति नहीं थी। वे समाज के प्रति इस भेदभाव के विरुद्ध खड़े हुए।
धर्म के आधार पर भेदभाव भी समाज में मौजूद है। अंसारी परिवार की कहानी (पाठ्यपुस्तक में) बताती है कि एक मुस्लिम परिवार को मकान किराए पर लेने में भेदभाव का सामना करना पड़ा। जाति और धर्म के आधार पर होने वाला यह भेदभाव समानता के विरुद्ध है।
असमानता को दूर करने के लिए केवल कानून ही पर्याप्त नहीं है। समाज की मानसिकता भी बदलनी चाहिए। लोगों को यह समझना होगा कि सभी मनुष्य समान हैं और किसी को भी उसकी जाति, धर्म या लिंग के कारण हेय दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।
भेदभाव के प्रति लोगों को जागरूक करना आवश्यक है। शिक्षा के माध्यम से समाज में समानता की भावना विकसित की जा सकती है। संविधान की मान्यताओं का पालन करते हुए हमें समाज में समानता की स्थापना के लिए प्रयास करने चाहिए।
सरकार ने समानता की स्थापना के लिए अनेक कदम उठाए हैं। सरकारी स्कूलों में सभी बच्चों को समान शिक्षा का अवसर दिया जाता है। 'मध्याह्न भोजन योजना' (Mid-Day Meal Scheme) के अंतर्गत स्कूलों में बच्चों को मुफ्त भोजन दिया जाता है, ताकि गरीब बच्चे भी स्कूल आ सकें।
सरकार अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष व्यवस्थाएँ (आरक्षण, छात्रवृत्ति) करती है, ताकि उन्हें समाज में समान अवसर मिल सकें। इसके अलावा सरकार भेदभाव रोकने के लिए कानून भी बनाती है।
समानता का संबंध केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि सम्मान से भी है। प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। जब समाज में किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव होता है, तो उसके सम्मान को ठेस पहुँचती है। समानता का मूल उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान सुनिश्चित करना है।
जाति, धर्म या लिंग के आधार पर भेदभाव व्यक्ति के सम्मान को प्रभावित करता है। इसलिए समाज को ऐसे भेदभावों के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए और हर व्यक्ति के सम्मान की रक्षा करनी चाहिए।
संविधान में समानता का प्रावधान होने के बावजूद समाज में समानता की स्थापना अभी पूरी नहीं हुई है। जातिवाद, धार्मिक भेदभाव और लिंग असमानता आज भी मौजूद हैं। इसका कारण है कि कानून बदलने से सामाजिक मानसिकता तुरंत नहीं बदलती।
समानता की स्थापना एक सतत प्रक्रिया है। हमें अपने आस-पास होने वाले भेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी को समान अवसर और सम्मान मिले।
| अनुच्छेद | प्रावधान |
|---|---|
| अनुच्छेद 15 | धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान पर भेदभाव नहीं |
| अनुच्छेद 17 | अस्पृश्यता का उन्मूलन |
| प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
| जाति भेदभाव | ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी |
| धार्मिक भेदभाव | अंसारी परिवार की कहानी |
| लिंग भेदभाव | महिलाओं के साथ असमान व्यवहार |
| योजना/कदम | उद्देश्य |
|---|---|
| मध्याह्न भोजन योजना | बच्चों को स्कूल लाना, पोषण |
| सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार | सभी को वोट देने का अधिकार |
| आरक्षण | पिछड़े वर्गों को अवसर |
समानता लोकतंत्र की आधारशिला है। भारतीय संविधान कानून के समक्ष सभी नागरिकों को समान मानता है। अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, जबकि अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने सभी नागरिकों को समान राजनीतिक अधिकार दिए हैं। इसके बावजूद समाज में जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव मौजूद है। ओमप्रकाश वाल्मीकि और अंसारी परिवार की कहानियाँ इन भेदभावों को दर्शाती हैं। सरकार ने मध्याह्न भोजन योजना और आरक्षण जैसे कदम उठाए हैं। परंतु समानता की स्थापना के लिए केवल कानून ही नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन भी आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक को सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है, और इसके लिए हमें भेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए।