शासक अपनी शक्ति, वैभव और कला-प्रेम को दर्शाने के लिए भव्य इमारतों का निर्माण करते थे। सल्तनत काल और मुग़ल काल में बने स्मारक आज भी भारत की धरोहर हैं। इस अध्याय में हम इन इमारतों के निर्माण से जुड़ी इंजीनियरिंग तकनीकों, स्थापत्य शैलियों और शासकों के निर्माण कार्यों का अध्ययन करेंगे। विशेष रूप से हम देखेंगे कि शाहजहाँ के काल में मुग़ल वास्तुकला किस प्रकार चरम पर पहुँची।
इमारतों का अध्ययन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये उस काल की तकनीकी क्षमता, आर्थिक स्थिति और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रमाण हैं। जलापूर्ति की व्यवस्था, छत बनाने की तकनीक और सजावटी कला इन इमारतों में देखी जा सकती है।
प्राचीन भारत में इमारतें बनाने की दो प्रमुख तकनीकें प्रचलित थीं। सबसे पुरानी तकनीक 'ट्रैबिएट' (Trabeate) थी, जिसमें दो खंभों पर एक क्षैतिज पट्टी (चौखट/धरन) रखी जाती थी। इस विधि को 'धरन-चौखट' प्रणाली कहा जाता है। इसमें पत्थर या लकड़ी की पट्टियों का उपयोग होता था।
इसके बाद 'आर्कुएट' (Arcuate) तकनीक विकसित हुई, जिसमें सच्चे मेहराब (चाप) का उपयोग होता था। इस विधि में केंद्र में ईंटों या पत्थरों को जोड़कर एक मेहराब बनाया जाता था। मेहराब के ऊपर बनी छत को 'गुंबद' (Dome) कहते हैं। गुंबद और मेहराब ने इमारतों को नया रूप दिया। भारत में ईंटों से बनी चाप-तकनीक का विकास दिल्ली सल्तनत के काल में हुआ।
दिल्ली सल्तनत के शासकों ने अनेक भवनों का निर्माण कराया। इनमें मस्जिदें, मीनारें, दरवाज़े और किले शामिल हैं। प्रमुख स्मारकों में कुतुब मीनार (दिल्ली) और अलाई दरवाज़ा (दिल्ली) प्रसिद्ध हैं। कुतुब मीनार दुनिया की सबसे ऊँची मीनारों में से एक है। अलाई दरवाज़ा में पहली बार सच्चे मेहराब और गुंबद का प्रयोग हुआ, जो उस तकनीकी विकास का प्रमाण है।
कुतुब मीनार के पास कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद है, जिसके निर्माण में पुराने हिंदू मंदिरों के खंभों का उपयोग किया गया। इस काल में स्मारकों पर अरबी भाषा में शिलालेख भी खुदवाए गए। मस्जिदों में मेहराब, गुंबद और नक्काशी का विशेष ध्यान रखा गया।
मुग़ल शासकों ने भव्य स्मारकों का निर्माण कराया। अकबर ने फतेहपुर सीकरी, आगरा के किले और दिल्ली के किलों का निर्माण कराया। फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाज़ा, जामा मस्जिद और पंचमहल प्रसिद्ध हैं। अकबर के पुत्रों और अन्य शासकों ने भी इमारतों का निर्माण जारी रखा।
हुमायूँ का मकबरा (दिल्ली) मुग़ल काल का पहला 'गार्डन टॉम्ब' (उद्यान-मकबरा) था, जिसे हुमायूँ की पत्नी हमीदा बानो बेगम ने बनवाया। इसमें सामने बगीचा था और केंद्र में मकबरा। यह स्थापत्य मुग़ल वास्तुकला में एक नई परंपरा की शुरुआत थी।
शाहजहाँ (1627-1658) के काल में मुग़ल वास्तुकला अपने चरम पर पहुँची। उसने दिल्ली में लाल किला और जामा मस्जिद का निर्माण कराया। लाल किले के भीतर दीवान-ए-आम (सार्वजनिक दरबार) और दीवान-ए-ख़ास (विशेष दरबार) थे। दीवान-ए-ख़ास में विशेष रूप से सजाया गया सिंहासन था, जिस पर मोर (पक्षी) के आकृति का चित्रण था। दीवान-ए-ख़ास के शिलालेख में लिखा है: "यदि पृथ्वी पर कोई स्वर्ग है, तो वह यहीं है, वह यहीं है, वह यहीं है।"
आगरा में शाहजहाँ ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में ताजमहल का निर्माण कराया। ताजमहल सफेद संगमरमर से बना है, जिसे राजस्थान के मकराना क्षेत्र से लाया गया था। ताजमहल एक 'गार्डन टॉम्ब' है और इसके चारों कोनों पर चार मीनारें हैं। इसके निर्माण में अनेक कारीगरों और शिल्पकारों ने काम किया।
मुग़ल इमारतों में अनेक प्रतीकों का उपयोग किया गया। 'कलश' (Kalasha) को शुभ (auspicious) माना जाता था, इसलिए इसे गुंबदों के शीर्ष पर रखा जाता था। 'कमल' (Lotus) और 'मोर' (Peacock) जैसे प्रतीक भी इमारतों में प्रयुक्त होते थे। ये प्रतीक विभिन्न क्षेत्रों से आए थे और मुग़ल शासन में इन्हें स्थान मिला।
बंगाल के 'बंगला' (ढलवाँ छत) आकार का उपयोग भी मुग़ल इमारतों में हुआ। इस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों की स्थापत्य शैलियों का मुग़ल वास्तुकला में समावेश हुआ, जो उस काल की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।
मुग़ल इमारतों में जलापूर्ति की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता था। बगीचों में नहरें, फव्वारे और तालाब बनाए जाते थे। स्नानागारों और मस्जिदों में पानी की आपूर्ति के लिए नलकूप और हौज़ (पानी के टैंक) बनाए गए। 'बावली' (Stepwell) भी जलापूर्ति का एक प्राचीन तरीका था।
शाहजहाँ ने दिल्ली में नहरें बनवाईं। मुग़ल शासकों ने पानी के महत्व को समझा और इसका सदुपयोग करने के लिए व्यवस्थाएँ कीं। जलापूर्ति की इन व्यवस्थाओं से यह स्पष्ट होता है कि मुग़ल काल में इंजीनियरिंग का विकास उच्च स्तर पर था।
ये स्मारक आज हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं। इन्हें संरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। अनेक स्मारकों को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है, जैसे ताजमहल, लाल किला, हुमायूँ का मकबरा, फतेहपुर सीकरी और कुतुब मीनार। इन स्मारकों की देखभाल करके हम भविष्य की पीढ़ियों के लिए इन्हें सुरक्षित रख सकते हैं।
| स्मारक | निर्माता | स्थान |
|---|---|---|
| कुतुब मीनार | सल्तनत काल | दिल्ली |
| अलाई दरवाज़ा | सल्तनत काल | दिल्ली |
| हुमायूँ का मकबरा | हमीदा बानो बेगम | दिल्ली |
| फतेहपुर सीकरी | अकबर | आगरा |
| लाल किला | शाहजहाँ | दिल्ली |
| ताजमहल | शाहजहाँ | आगरा |
| तकनीक | विवरण |
|---|---|
| ट्रैबिएट | खंभों पर क्षैतिज पट्टी (धरन) |
| आर्कुएट | सच्चे मेहराब (चाप) का उपयोग |
| गुंबद | मेहराब के ऊपर बनी गोल छत |
| प्रतीक | अर्थ |
|---|---|
| कलश | शुभ प्रतीक |
| कमल | सुंदरता और शुद्धता |
| मोर | शाही वैभव |
| बंगला छत | बंगाल की स्थापत्य शैली |
शासकों और इमारतों के अध्ययन से हमें पता चलता है कि प्राचीन भारत में इंजीनियरिंग और स्थापत्य कला अत्यंत विकसित थी। ट्रैबिएट से आर्कुएट तकनीक तक के विकास ने इमारतों को नया रूप दिया। सल्तनत काल के कुतुब मीनार और अलाई दरवाज़ा तथा मुग़ल काल के हुमायूँ का मकबरा, फतेहपुर सीकरी और ताजमहल उस काल की श्रेष्ठता के प्रमाण हैं। शाहजहाँ के काल में मुग़ल वास्तुकला चरम पर पहुँची। कलश, कमल और मोर जैसे प्रतीकों ने इमारतों को सांस्कृतिक गहराई दी। जलापूर्ति की व्यवस्था से इंजीनियरिंग कौशल का पता चलता है। ये स्मारक आज भी हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं और इनका संरक्षण हमारा कर्तव्य है।