"कामचोर" वसंत पुस्तक का दसवाँ पाठ है, जो प्रेमचंद द्वारा रचित एक मार्मिक और हास्यप्रद कहानी है। यह कहानी एक परिवार की पृष्ठभूमि में लिखी गई है जिसमें घर के बच्चे काम से बचते हैं। मुंशी जी के तीन बेटे – कंझा, रामधनी और रामजी – अपने-अपने तरीके से काम से बचने की तरकीबें अपनाते हैं। परिवार में मुंशी जी की पत्नी ही सारा काम करती है। यह कहानी बाल मनोविज्ञान, परिवार में जिम्मेदारी की समझ और काम के प्रति सही दृष्टिकोण का सजीव चित्रण करती है। अंत में घर में एक छोटी सी घटना से परिस्थिति बदलती है और परिवार में काम-बाँटने की नई व्यवस्था बनती है। यह कहानी सिखाती है कि परिवार के सभी सदस्यों को आपसी सहयोग से काम करना चाहिए।
इस कहानी के लेखक प्रेमचंद हिंदी के महान कथाकार हैं, जिन्हें 'कहानी सम्राट' की उपाधि दी गई। उनका जन्म सन 1880 में वाराणसी के पास लमही गाँव में हुआ था। प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय था। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में "गोदान", "गबन", "निर्मला", "सेवासदन", "कर्मभूमि", "रंगभूमि" आदि उपन्यास तथा "पंच परमेश्वर", "ईदगाह", "कफन", "बड़े भाई साहब", "पूस की रात" जैसी कहानियाँ शामिल हैं। प्रेमचंद जी की कहानियाँ गाँव और शहर के सामाजिक जीवन, किसानों, मजदूरों और मध्यमवर्गीय परिवारों की समस्याओं को सजीव रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनकी भाषा सरल, रोचक और संवादात्मक होती है। प्रेमचंद जी ने अपनी रचनाओं से समाज को जागरूक करने का प्रयास किया।
कहानी "कामचोर" में मुंशी जी का परिवार है जिसमें पत्नी और तीन बेटे हैं। मुंशी जी के तीनों बेटे कामचोर हैं। जब भी घर में काम का ज़िक्र होता है, वे बहाने बनाकर भाग जाते हैं। कंझा, रामधनी और रामजी – तीनों अलग-अलग तरकीबें अपनाते हैं। मुंशी जी बच्चों को काम में लगाने की कोशिश करते हैं, परंतु वे सफल नहीं होते। घर का सारा काम मुंशी जी की पत्नी को ही करना पड़ता है। वह दिनभर खाना बनाती है, बर्तन धोती है, कपड़े धोती है और घर की सफाई करती है।
एक दिन मुंशी जी अपने बेटों को गणित की पुस्तक देते हैं ताकि वे पढ़ाई में समय बिताएँ, परंतु बच्चों की बहानेबाजी का तरीका नहीं बदलता। कहानी में हास्य तब पैदा होता है जब तीनों भाई बारी-बारी से अपनी कामचोरी की कहानियाँ सुनाते हैं। अंत में जब घर के काम में सहयोग की आवश्यकता अत्यधिक होती है, तो बच्चे धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। परिवार में काम बाँटने की व्यवस्था होती है और सब मिलकर घर के काम में सहयोग करने लगते हैं। कहानी का निष्कर्ष है कि परिवार की खुशी सबके सहयोग से ही संभव है; काम से भागना उचित नहीं है।
कहानी का मूल भाव परिवार में सहयोग और जिम्मेदारी की भावना का महत्व है। लेखक दिखाते हैं कि कामचोरी से परिवार के सदस्यों, विशेषकर माँ पर अन्याय होता है। संदेश यह है कि घर के काम-काज में सभी सदस्यों को बराबर भाग लेना चाहिए; कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। बच्चों को बचपन से ही परिश्रम और सहयोग की शिक्षा मिलनी चाहिए। कहानी बताती है कि बहानेबाजी और काम से भागना जीवन में सफलता नहीं दिलाता। आत्मनिर्भरता और पारस्परिक सहयोग ही सुखी परिवार का आधार हैं। प्रेमचंद जी ने हास्य के माध्यम से यह गंभीर सामाजिक संदेश सरलता से प्रस्तुत किया है।
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| लेखक | प्रेमचंद |
| विधा | सामाजिक लघु कहानी |
| केंद्रीय विषय | कामचोरी और सहयोग |
| मुख्य पात्र | मुंशी जी, पत्नी, तीन बेटे |
| मूल संदेश | परिवार में सहयोग आवश्यक है |
| उपाधि | कहानी सम्राट |
| पात्र | विशेषता |
|---|---|
| मुंशी जी | काम की सीख देने वाले पिता |
| पत्नी | परिश्रमी गृहिणी |
| कंझा | बहानेबाज बड़ा बेटा |
| रामधनी | कामचोर मध्यम बेटा |
| रामजी | तरकीबें निकालने वाला |
"कामचोर" प्रेमचंद की वह कहानी है जो हास्य के माध्यम से परिवार में सहयोग की गंभीर शिक्षा देती है। मुंशी जी के तीन कामचोर बेटों की बहानेबाजी पाठकों को हँसाती है, परंतु साथ ही यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम भी अपने घर के कामों में उचित सहयोग देते हैं? यह कहानी सिखाती है कि काम करना कोई लज्जा की बात नहीं है; यह तो परिपक्वता और जिम्मेदारी का प्रतीक है। परिवार की खुशहाली सभी सदस्यों के सहयोग से ही संभव है।