बीजगणित गणित की वह शाखा है जिसमें संख्याओं के स्थान पर चर (Variables) और अचर (Constants) का उपयोग किया जाता है। संख्याओं, चरों और संक्रियाओं (जोड़, घटाव, गुणा, भाग) के संयोजन से बनी राशि को बीजीय व्यंजक (Algebraic Expression) कहते हैं। इस अध्याय में हम बीजीय व्यंजकों के पदों, गुणांकों, व्यंजकों के जोड़-घटाव-गुणा तथा विभिन्न सर्वसमिकाओं (Identities) का अध्ययन करेंगे। सर्वसमिकाएँ ऐसे समीकरण हैं जो चरों के सभी मानों के लिए सत्य होती हैं और गणना को अत्यधिक सरल बनाती हैं।
व्यंजक के वे भाग जिन्हें जोड़ या घटाव के चिह्नों से अलग किया जाता है, पद कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्यंजक $3x^2 + 5x - 7$ में तीन पद हैं: $3x^2$, $5x$ और $-7$।
किसी पद में चर के साथ गुणा में स्थित संख्या को उस चर का गुणांक कहते हैं। $5x$ में $x$ का गुणांक 5 है। अचर पद (जैसे $-7$) में कोई चर नहीं होता।
जिन पदों का चर भाग समान होता है, वे समान पद कहलाते हैं, जैसे $3x$ और $5x$। समान पदों को आपस में जोड़ा या घटाया जा सकता है। भिन्न पदों (जैसे $3x$ और $5y$) को नहीं।
व्यंजकों को जोड़ते या घटाते समय केवल समान पदों को जोड़ा या घटाया जाता है। असमान पद वैसे ही रहते हैं।
$$(3x^2 + 5x - 7) + (2x^2 - 3x + 4) = 5x^2 + 2x - 3$$
$$(x + 3)(x + 5) = x^2 + 5x + 3x + 15 = x^2 + 8x + 15$$
गुणा करते समय घातें जोड़ी जाती हैं: $x^m \times x^n = x^{m+n}$।
सर्वसमिका वह समीकरण है जो चरों के सभी मानों के लिए सत्य होता है। कुछ महत्वपूर्ण सर्वसमिकाएँ:
$$(a + b)^2 = a^2 + 2ab + b^2$$ $$(a - b)^2 = a^2 - 2ab + b^2$$ $$(a + b)(a - b) = a^2 - b^2$$ $$(x + a)(x + b) = x^2 + (a + b)x + ab$$
सर्वसमिकाओं से बड़ी संख्याओं के वर्ग और गुणनफल तुरंत ज्ञात किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए:
$$103^2 = (100 + 3)^2 = 10000 + 600 + 9 = 10609$$ $$98 \times 102 = (100 - 2)(100 + 2) = 10000 - 4 = 9996$$
सर्वसमिका $(a + b)^2 = a^2 + 2ab + b^2$ को ज्यामितीय रूप से भी दर्शाया जा सकता है। भुजा $(a+b)$ वाले वर्ग को चार भागों में विभाजित करने पर $a^2$, $ab$, $ab$ और $b^2$ क्षेत्रफल के चार आयत/वर्ग प्राप्त होते हैं।
यदि किसी समीकरण को हल करने पर दोनों पक्ष समान हो जाते हैं (जैसे $5 = 5$), तो वह सर्वसमिका होती है।
व्यंजकों की संक्रियाओं में दक्षता प्राप्त करने के लिए अधिक से अधिक उदाहरणों का अभ्यास आवश्यक है। जोड़ और घटाव में सदैव समान पदों को ही मिलाया जाता है। उदाहरण के लिए व्यंजकों $4x^2 + 7x - 3$ और $2x^2 - 5x + 8$ का योग करने पर समान पदों को जोड़ने से $6x^2 + 2x + 5$ प्राप्त होता है। इसी प्रकार पहले व्यंजक में से दूसरे को घटाने पर $(4x^2 - 2x^2) + (7x - (-5x)) + (-3 - 8)$ अर्थात $2x^2 + 12x - 11$ प्राप्त होता है।
गुणा करते समय एकपदी को बहुपद के प्रत्येक पद से अलग-अलग गुणा किया जाता है। जैसे $3x(2x^2 - 5x + 4) = 6x^3 - 15x^2 + 12x$। द्विपदों के गुणा में प्रत्येक पद का दूसरे के प्रत्येक पद से गुणन होता है, जैसे $(2x + 3)(x - 4) = 2x^2 - 8x + 3x - 12 = 2x^2 - 5x - 12$।
सर्वसमिकाओं का उपयोग न केवल गणना को सरल बनाता है, बल्कि गुणनखंडन में भी सहायक होता है। उदाहरण के लिए व्यंजक $x^2 - 6x + 9$ को $x^2 - 2(x)(3) + 3^2$ के रूप में लिखकर $(x - 3)^2$ में परिवर्तित किया जा सकता है। इसी प्रकार $25y^2 - 16 = (5y)^2 - 4^2 = (5y + 4)(5y - 4)$ होता है।
व्यंजकों के गुणनखंडन और सरलीकरण में सर्वसमिकाओं की पहचान करने की क्षमता ही सबसे महत्वपूर्ण कौशल है। नियमित अभ्यास से पहली नजर में ही सर्वसमिका की पहचान हो जाती है और गणना में गति आती है। इसीलिए प्रत्येक सर्वसमिका को कम से कम दस अलग-अलग उदाहरणों पर प्रयोग करना चाहिए।
इस अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि सर्वसमिकाएँ रटी हुई विधियाँ नहीं हैं, बल्कि वे व्यंजकों के विस्तार का सामान्य नियम हैं। जब कभी किसी व्यंजक में वर्ग या दो द्विपदों का गुणनफल दिखाई दे, तो संबंधित सर्वसमिका का प्रयोग करके गणना को संक्षिप्त किया जा सकता है। इससे परीक्षा में समय की बचत होती है और उत्तर की शुद्धता बढ़ती है। इसलिए प्रत्येक सर्वसमिका का अभ्यास करते समय उसका विस्तार और उसके विपरीत संकुचन, दोनों दिशाओं में अभ्यास करना चाहिए।
| सर्वसमिका | विस्तार |
|---|---|
| (a + b)² | a² + 2ab + b² |
| (a - b)² | a² - 2ab + b² |
| (a + b)(a - b) | a² - b² |
| (x + a)(x + b) | x² + (a+b)x + ab |
| प्रकार | पदों की संख्या | उदाहरण |
|---|---|---|
| एकपदी | 1 | 5x |
| द्विपद | 2 | 3x + 5 |
| त्रिपद | 3 | x² + 2x + 1 |
| बहुपद | 1 या अधिक | x³ + x² + 1 |
| नियम | उदाहरण |
|---|---|
| x^m × x^n = x^(m+n) | x² × x³ = x⁵ |
| (x^m)^n = x^(mn) | (x²)³ = x⁶ |
| x^m / x^n = x^(m-n) | x⁵ / x² = x³ |
| x⁰ = 1 | 5⁰ = 1 |
इस अध्याय में हमने बीजीय व्यंजकों की संरचना, पदों और गुणांकों की पहचान, तथा व्यंजकों पर जोड़, घटाव, गुणा की संक्रियाएँ सीखीं। सबसे महत्वपूर्ण रूप से हमने चार प्रमुख सर्वसमिकाओं का अध्ययन किया, जिनका उपयोग गणना को तीव्र और सरल बनाता है। सर्वसमिकाओं की ज्यामितीय व्याख्या से उनकी गहरी समझ विकसित होती है। ये अवधारणाएँ आगे की कक्षाओं में गुणनखंडन, द्विघात समीकरण और फलनों के अध्ययन का आधार हैं। सर्वसमिकाओं के प्रचुर अभ्यास से बीजगणित में दक्षता प्राप्त होती है।