Comprehensive theory, key formulas, diagrams, and memory aids for बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता.
यह पाठ पञ्चतन्त्र की एक प्रसिद्ध कथा है। इसका शीर्षक 'बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता' है, जिसका अर्थ है — 'मैंने कभी बिल्ली की (अच्छी) वाणी नहीं सुनी।' यह कथा हमें यह शिक्षा देती है कि किसी पर उसकी बातों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके स्वभाव और कर्मों के आधार पर विश्वास करना चाहिए। स्वभाव कभी नहीं बदलता। शत्रु चाहे कितनी भी मीठी बातें करे, उसके विषय में सदा सावधान रहना चाहिए।
इस कथा में एक विडाल (बिल्ली) और मूषकों (चूहों) की कथा है। कथा का नायक एक बुद्धिमान मूषक है जो अपनी बुद्धि के बल पर बिल्ली की चाल को समझ जाता है। इस पाठ से यह भी स्पष्ट होता है कि बुद्धि ही सबसे बड़ी शक्ति है। बुद्धिमान व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थिति में भी सुरक्षित रहता है, जबकि मूर्ख अपनी मूर्खता के कारण ही नष्ट हो जाते हैं।
राजा सर्वज्ञ के नगर में सब लोग मूषकों (चूहों) से परेशान थे। मूषक दाने खा जाते थे और सब वस्तुओं को नष्ट कर देते थे। सभी मूषक भयभीत होकर अपने बिलों (विवरों) में छिप गए थे। एक बार एक विडाल (बिल्ली) मूषकों के पास आई। वह मूषकों को पकड़कर खाने लगी। मूषकों के दल में भय और हाहाकार मच गया।
एक बुद्धिमान मूषक ने सब मूषकों से कहा — "साथियो! सुनो। यह विडाल बड़ी चालाक है। हमें इस पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।" उसने कहा — "बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता।" अर्थात "मैंने कभी बिल्ली की अच्छी वाणी नहीं सुनी।" बिल्ली का स्वभाव ही मूषकों को खाना है। वह अपनी प्रकृति नहीं बदल सकती। जो कोई उस पर विश्वास करेगा, वह उसका शिकार बनेगा।
किंतु कुछ मूर्ख मूषक बिल्ली की मीठी बातों पर विश्वास कर बैठे। बिल्ली ने बड़ी चतुराई दिखाई। वह एक पैर पर खड़ी होकर (एकपादेन स्थित्वा) सूर्य की ओर देखने लगी, मानो वह कोई साधु या योगी हो। मूर्ख मूषक उसके इस भेष को देखकर सोचने लगे कि यह कोई तपस्वी है, कोई संत है, यह हमें नहीं खाएगी। वे निकट जाकर उसके चारों ओर बैठ गए और उसकी प्रशंसा करने लगे।
इसी बीच बुद्धिमान मूषक चेतावनी देते हुए बोला — "सावधान! यह सब दिखावा है। जो अपने स्वभाव का त्याग करता है, उस पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।" किंतु किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। अंत में बिल्ली ने अपनी असली प्रकृति दिखाई और सभी मूर्ख मूषकों को एक-एक करके खा लिया। केवल बुद्धिमान मूषक ही सुरक्षित बच गया, क्योंकि उसने कभी बिल्ली पर विश्वास नहीं किया था।
इस कथा से यह शिक्षा मिलती है —
| शब्द | अर्थ | शब्द | अर्थ |
|---|---|---|---|
| बिलः | बिल्ली | मूषकः | चूहा |
| विडालः | बिल्ली | वाणी | वाणी, आवाज़ |
| कदापि | कभी भी | श्रुता | सुनी गई |
| निर्घातकः | नाश करने वाला | एकपादेन | एक पैर से |
| विद्वान् | बुद्धिमान | मूर्खः | मूर्ख |
| बिलम् | विवर, छेद | स्थित्वा | खड़े होकर |
| सूर्यः | सूर्य | दृष्ट्वा | देखकर |
| सावधानम् | सावधान | विश्वासः | विश्वास |
| स्वभावः | स्वभाव, प्रकृति | प्रकृतिः | प्रकृति |
| भयम् | भय | हाहाकारः | हाहाकार, चीत्कार |
| चतुरः | चालाक | शिक्षा | शिक्षा, उपदेश |
| पात्र | स्वभाव | कथा में भूमिका |
|---|---|---|
| विडाल (बिल्ली) | चालाक, धूर्त, कपटी | योगी का भेष धरकर मूषकों को धोखा दिया |
| बुद्धिमान मूषक | चतुर, सजग | बिल्ली की चाल समझकर सुरक्षित रहा |
| मूर्ख मूषक | भोले, विश्वास करने वाले | बिल्ली की मीठी बातों पर धोखा खाकर नष्ट हुए |
| राजा सर्वज्ञ | ज्ञानी, शासक | कथा की पृष्ठभूमि में उल्लेखित |
| धातु | अर्थ | वर्तमान काल (प्रथम पुरुष एकवचन) | भूतकाल |
|---|---|---|---|
| श्रु | सुनना | शृणोति | अशृणोत् |
| वद् | बोलना | वदति | अवदत् |
| खाद् | खाना | खादति | अखादत् |
| पलाय् | भागना | पलायते | अपलायत |
| स्था | खड़ा होना | तिष्ठति | अस्थात् |
| शिक्षा | स्पष्टीकरण |
|---|---|
| विश्वास का आधार कर्म | किसी को उसके कर्मों से पहचानें, वचनों से नहीं |
| प्रकृति नहीं बदलती | स्वभाव सदा एक जैसा रहता है, दिखावा अस्थायी है |
| मीठी वाणी से सावधानी | शत्रु के मीठे वचनों पर कभी धोखा नहीं खाना चाहिए |
| बुद्धि ही रक्षक | बुद्धिमान व्यक्ति सदा सुरक्षित रहता है |
graph TD
A["बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता"] --> B["बिल्ली का आगमन - मूषकों का भय"]
A --> C["बुद्धिमान मूषक की चेतावनी - विश्वास न करें"]
A --> D["बिल्ली का योगी भेष - एक पैर पर खड़ा होना"]
D --> E["मूर्ख मूषकों का धोखा खाना"]
E --> F["बिल्ली द्वारा सभी मूषकों का भक्षण"]
A --> G["शिक्षा: स्वभाव नहीं बदलता, बुद्धि ही रक्षक है"]
C --> G
'बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता' कथा जीवन की एक महत्वपूर्ण नीति सिखाती है — किसी व्यक्ति को उसकी बातों से नहीं, बल्कि उसके स्वभाव और कर्मों से पहचानना चाहिए। दिखावा और मीठी वाणी धोखा दे सकती है, परंतु स्वभाव कभी नहीं बदलता। बुद्धिमान व्यक्ति चेतावनी को गंभीरता से लेता है और सुरक्षित रहता है, जबकि मूर्ख मीठी बातों पर मोहित होकर विनाश के मार्ग पर चला जाता है। यह कथा पञ्चतन्त्र की नीति कथाओं का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो आज के व्यावहारिक जीवन में भी पूर्णतः प्रासंगिक है। विद्यार्थियों को इस पाठ से सजगता, विवेक और बुद्धि का पाठ ग्रहण करना चाहिए।