📝
🗣️
📖
📚
🖋️
← मुखपृष्ठं गच्छन्तु
Font Size:

1. परिचय

'कण्टकेनैव कण्टकम्' एक प्रसिद्ध नीति कथा है। इसका शाब्दिक अर्थ है — 'काँटे से ही काँटा'। जिस प्रकार पैर में चुभा हुआ काँटा उसी प्रकार के दूसरे काँटे से निकाला जाता है, उसी प्रकार नीति के अनुसार शत्रु का नाश भी शत्रु की सहायता से ही करना चाहिए। किसी कार्य के लिए उचित उपाय चुनना ही बुद्धिमत्ता है। यह कथा पञ्चतन्त्र की एक प्रसिद्ध नीति को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करती है।

यह कथा हमें सिखाती है कि जब किसी धूर्त या शत्रु से सामना हो, तो घबराना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी बुद्धि का उपयोग करके उसकी युक्ति को ही उसके विरुद्ध प्रयोग करना चाहिए। चतुराई और बुद्धिमत्ता ही सबसे बड़ा शस्त्र है। जो व्यक्ति परिस्थिति के अनुसार उपाय नहीं ढूँढता, वह शत्रु का शिकार बन जाता है।

2. पाठ का अर्थ (हिंदी अनुवाद)

कथा का प्रारंभ

गन्धमादन पर्वत के वन में एक सिंह राज्य करता था। उसके साथ एक काक (कौआ), एक लोमश (गीदड़) और एक व्याघ्र (बाघ) रहते थे। ये तीनों सिंह के अधीन थे और उनकी सेवा करते थे। एक दिन एक उष्ट्र (ऊँट) मार्ग भूलकर उस वन में आ पहुँचा। सिंह ने उस पर दया करके उसे अपनी शरण दी। उष्ट्र सिंह की शरण में सुरक्षित रहने लगा।

षड्यंत्र की रचना

सिंह का एक शावक (बच्चा) था। एक दिन वह घायल हो गया, जिसके कारण सिंह शिकार नहीं कर पा रहा था। भूख से व्याकुल होकर काक और लोमश ने आपस में विचार किया। लोमश ने कहा — "सिंह तो अब शिकार नहीं कर सकता। हम सब भूखे मर जाएँगे। उपाय यही है कि सिंह को उष्ट्र को खाने की सलाह दी जाए।" काक ने उसकी बात का समर्थन किया। दोनों ने सिंह को सलाह दी कि वह उष्ट्र का वध करके सबका पेट भरे।

चतुर उष्ट्र का उपाय (कण्टकेनैव कण्टकम्)

चतुर उष्ट्र ने उनकी यह चर्चा सुन ली। वह समझ गया कि काक और लोमश उसका नाश चाहते हैं। तब उसने अपनी बुद्धि का उपयोग किया। वह सिंह के पास गया और बोला — "हे राजन्! मैंने काक और लोमश को यह कहते सुना है कि वे आपको मारकर राज्य लेना चाहते हैं। मैं आपकी रक्षा के लिए तत्पर हूँ।" उष्ट्र ने धूर्तों की वही युक्ति उन्हीं के विरुद्ध प्रयोग की। सिंह ने विश्वास करके धूर्त काक और लोमश को दण्ड दिया। इस प्रकार उष्ट्र ने काँटे से ही काँटा निकालने की नीति का पालन किया और अपने प्राणों की रक्षा की।

नीति

यदि कण्टकेनैव कण्टकम् — जैसे काँटे से काँटा निकाला जाता है, वैसे ही शत्रु का नाश शत्रु की सहायता से, अर्थात शत्रु की युक्ति से ही करना चाहिए। धूर्तों का मुकाबला बुद्धि से ही किया जा सकता है। यही इस कथा की मुख्य नीति है।

शिक्षा

इस कथा से यह शिक्षा मिलती है —

  1. कठिन परिस्थिति में धैर्य और बुद्धि का उपयोग करना चाहिए।
  2. शत्रु की युक्ति को पहचानकर उसी युक्ति से उसका मुकाबला करना चाहिए।
  3. जिसने विश्वासघात किया हो, उस पर फिर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
  4. बुद्धि ही सबसे बड़ा अस्त्र है।

3. व्याकरण (शब्द रूप, धातु, उपसर्ग)

शब्द रूप

धातु रूप

उपसर्ग और अव्यय

4. शब्दार्थ (शब्दावली)

शब्द अर्थ शब्द अर्थ
कण्टकः काँटा एव ही
उष्ट्रः ऊँट सिंहः सिंह
काकः कौआ लोमशः गीदड़
व्याघ्रः बाघ शावकः सिंह का बच्चा
शरणम् शरण, रक्षा उपायः उपाय, युक्ति
नाशः नाश धूर्तः धूर्त, चालाक
नीतिः नीति षड्यन्त्रम् षड्यंत्र, साजिश
विश्वासघातः विश्वासघात वधः वध
पलायनम् भागना बुद्धिः बुद्धि
प्राणाः प्राण दण्डः दंड

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: कथा के पात्र और उनकी भूमिका

पात्र स्वभाव कथा में भूमिका
सिंह बलवान, भोला शरण दी, परंतु धूर्तों के षड्यंत्र में उलझा
उष्ट्र बुद्धिमान, चतुर धूर्तों की युक्ति सुनकर उसी युक्ति से बच निकला
काक धूर्त उष्ट्र के वध का षड्यंत्र रचने वाला
लोमश धूर्त, चालाक सिंह को उष्ट्र का वध करने की सलाह देने वाला

तालिका 2: धातु रूप (वर्तमान काल)

धातु अर्थ एकवचन द्विवचन बहुवचन
वद् बोलना वदति वदतः वदन्ति
श्रु सुनना शृणोति शृणुतः शृण्वन्ति
खाद् खाना खादति खादतः खादन्ति
पलाय् भागना पलायते पलायेते पलायन्ते

तालिका 3: नीति के उपाय

स्थिति उपाय परिणाम
शत्रु का सामना घबराना नहीं बुद्धि से विजय
विश्वासघात पुनः विश्वास न करना सुरक्षा
षड्यंत्र युक्ति पहचानना बचाव
काँटा (समस्या) उचित उपाय समाधान

माइंड मैप

graph TD A["कण्टकेनैव कण्टकम्"] --> B["अर्थ - काँटे से ही काँटा निकालना"] A --> C["कथा - सिंह, उष्ट्र, काक, लोमश"] C --> D["सिंह ने उष्ट्र को शरण दी"] D --> E["काक-लोमश का षड्यंत्र - उष्ट्र का वध"] E --> F["उष्ट्र की बुद्धि - युक्ति सुन ली"] F --> G["उष्ट्र ने धूर्तों की युक्ति उन्हीं पर लगाई"] G --> H["धूर्तों का दण्ड, उष्ट्र की रक्षा"] A --> I["नीति - शत्रु का नाश शत्रु की युक्ति से"] I --> J["बुद्धि ही सबसे बड़ा अस्त्र"] H --> J

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: कथा का चक्र (षड्यंत्र से रक्षा तक)

षड्यंत्र से रक्षा तक सिंह की शरण में उष्ट्र शांतिपूर्ण जीवन काक-लोमश का षड्यंत्र उष्ट्र के वध की योजना उष्ट्र ने युक्ति सुन ली बुद्धिमान उष्ट्र सजग उष्ट्र ने युक्ति उलट लगाई कण्टकेनैव कण्टकम् धूर्तों का दण्ड, उष्ट्र की रक्षा बुद्धि की विजय स्वर्ण नियम: शत्रु की युक्ति पहचानकर उसी से मुकाबला करो

आरेख 2: उष्ट्र की बुद्धि का तुलनात्मक चित्रण

बुद्धि बनाम षड्यंत्र षड्यंत्रकारी (काक-लोमश) गुप्त चर्चा विश्वासघात दूसरों का वध चाहते स्वयं धूर्त परिणाम: दण्ड बुद्धिमान उष्ट्र युक्ति सुन लेता है घबराता नहीं बुद्धि का उपयोग युक्ति उलट लगाता है परिणाम: रक्षा नीति कण्टकेनैव कण्टकम् - काँटे से ही काँटा निकालो स्वर्ण नियम: बुद्धि ही सबसे बड़ा अस्त्र है

सामान्य गलतियाँ

  1. 'कण्टकेनैव कण्टकम्' का अर्थ 'काँटा लगाना' कर लेना गलत है। इसका अर्थ है 'काँटे से ही काँटा निकालना' अर्थात उचित उपाय से समस्या का समाधान।
  2. 'उष्ट्रः' को 'ऊँट' के स्थान पर 'भेड़' लिख देना गलत है। उष्ट्रः का अर्थ 'ऊँट' होता है।
  3. 'लोमशः' का अर्थ 'भेड़िया' कर लेना गलत है; लोमशः का अर्थ 'गीदड़ (सियार)' होता है।
  4. यह मान लेना कि उष्ट्र ने भागकर अपनी जान बचाई — वास्तव में उष्ट्र ने बुद्धि से धूर्तों की युक्ति उन्हीं पर लगाई और सिंह ने धूर्तों को दण्ड दिया।
  5. कथा का नायक 'सिंह' है, यह मान लेना गलत है। कथा का बुद्धिमान नायक 'उष्ट्र' है।
  6. 'शावकः' का अर्थ 'बछड़ा' करना गलत है; यहाँ शावकः का अर्थ 'सिंह का बच्चा' है।
  7. 'एव' अव्यय का अर्थ 'और' करना गलत है; 'एव' का अर्थ 'ही' होता है, जो बल देने के लिए प्रयुक्त होता है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. शीर्षक 'कण्टकेनैव कण्टकम्' का अर्थ और नीति कंठस्थ करें — यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
  2. पात्रों की सूची (सिंह, उष्ट्र, काक, लोमश, व्याघ्र) और उनकी भूमिका याद रखें।
  3. धातुओं — वद्, श्रु, खाद्, पलाय् — के वर्तमान काल रूप कंठस्थ करें।
  4. शब्द रूप 'उष्ट्र' की कम से कम प्रथमा और द्वितीया विभक्ति याद रखें।
  5. 'वधः', 'उपायः', 'षड्यन्त्रम्', 'नाशः' जैसे शब्दों के अर्थ तैयार रखें।
  6. कथा की चार शिक्षाएँ लिखने का अभ्यास करें।
  7. उष्ट्र और धूर्त पात्रों की तुलना करके लिखने का अभ्यास करें, यह प्रायः पूछा जाता है।

निष्कर्ष

'कण्टकेनैव कण्टकम्' कथा बुद्धि और उपाय की विजय की कहानी है। जब धूर्त काक और लोमश ने उष्ट्र का नाश चाहा, तब बुद्धिमान उष्ट्र ने घबराने के स्थान पर अपनी युक्ति से उन्हीं की चाल उन पर उलट दी। यह कथा सिखाती है कि कठिन परिस्थिति में धैर्य और बुद्धि का उपयोग करना चाहिए और शत्रु की युक्ति को पहचानकर उसी युक्ति से उसका मुकाबला करना चाहिए। विद्यार्थियों को इस पाठ से समस्या-समाधान की कला और सजगता की शिक्षा मिलती है। बुद्धि ही मनुष्य का सबसे बड़ा अस्त्र है — यही इस कथा का मूल संदेश है।