भारत मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान देश है। हमारे देश की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या सीधे तौर पर खेती पर निर्भर करती है। भोजन हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकता है, और यह भोजन मुख्य रूप से फ़सलों से प्राप्त होता है। जब एक ही प्रकार के पौधों को बड़े क्षेत्र में एक साथ उगाया जाता है, तो उसे फ़सल कहते हैं। उदाहरण के लिए, गेहूँ, धान, मक्का, दालें, सब्ज़ियाँ तथा फल सभी फ़सलों के उदाहरण हैं।
जब पौधे बड़े होकर फ़सल देते हैं, तब उसे फ़सल उत्पादन कहते हैं। फ़सल उत्पादन की संपूर्ण प्रक्रिया में अनेक चरण शामिल होते हैं जिनमें भूमि की तैयारी, बुवाई, सिंचाई, खाद एवं उर्वरक का उपयोग, खरपतवार नियंत्रण, कटाई एवं भंडारण शामिल हैं। इन सभी चरणों के समुचित प्रबंधन को फ़सल प्रबंधन कहा जाता है। फ़सल उत्पादन एवं प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य भूमि की गुणवत्ता को बनाए रखते हुए अधिक से अधिक उपज प्राप्त करना है।
फ़सल उत्पादन की संपूर्ण प्रक्रिया में विभिन्न क्रियाएँ शामिल होती हैं, जिन्हें कृषि कार्य (Agricultural Practices) कहा जाता है। फ़सल उगाने के लिए किसानों द्वारा की जाने वाली विभिन्न क्रियाओं की शृंखला को कृषि कार्य कहते हैं। इन क्रियाओं में शामिल हैं:
भारत में मुख्य रूप से दो प्रमुख फ़सल ऋतुएँ होती हैं:
| ऋतु | समय | प्रमुख फ़सलें |
|---|---|---|
| खरीफ़ (Kharif) | जून-जुलाई से अक्टूबर | धान, मक्का, बाजरा, मूँगफली, सोयाबीन, कपास |
| रबी (Rabi) | अक्टूबर-नवंबर से अप्रैल | गेहूँ, चना, मटर, जौ, सरसों, अलसी |
वर्षा ऋतु में बोई जाने वाली फ़सलें खरीफ़ कहलाती हैं, जबकि सर्दियों में बोई जाने वाली फ़सलें रबी कहलाती हैं।
फ़सल बोने से पहले भूमि की तैयारी सबसे महत्वपूर्ण चरण है। भूमि की तैयारी में मुख्यतः जुताई (Tilling/Ploughing) शामिल होती है। जुताई का अर्थ है भूमि को पलटकर भुरभुरा बनाना। जुताई के लिए विभिन्न कृषि यंत्रों जैसे हल (Plough), कुदाल (Hoe) और कल्टीवेटर (Cultivator) का उपयोग किया जाता है।
भूमि की तैयारी के बाद फ़सल बोने की प्रक्रिया को बुवाई कहते हैं। बुवाई के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले, स्वस्थ एवं रोग-मुक्त बीजों का चयन करना अत्यंत आवश्यक है। बुवाई से पहले बीजों की गुणवत्ता जाँचने के लिए उन्हें पानी में डालकर परखा जाता है। तैरते हुए खोखले बीज नष्ट कर दिए जाते हैं, जबकि डूबने वाले स्वस्थ बीजों को बुवाई के लिए उपयोग किया जाता है।
बुवाई की दो मुख्य विधियाँ होती हैं: 1. हाथ से बुवाई (Manual Sowing): बीजों को हाथ से फैलाकर बोया जाता है। यह विधि पुरानी विधि है। 2. बीज ड्रिल द्वारा बुवाई (Sowing by Seed Drill): आधुनिक युग में सीड ड्रिल (Seed Drill) नामक मशीन का उपयोग किया जाता है, जो बीजों को सही गहराई एवं उचित दूरी पर भूमि में बोती है। इससे बीजों की बचत होती है, फ़सल उत्पादन बढ़ता है और पौधों में पर्याप्त दूरी बनी रहती है, जिससे धूप, जल और पोषक तत्वों की प्राप्ति सुचारु रूप से होती है।
बीज दर (Seed Rate): किसी भी फ़सल के लिए प्रति हेक्टेयर कितने बीज बोने चाहिए, यह निश्चित होता है। बीजों के बीच की दूरी उचित रखना आवश्यक है ताकि पौधों को पर्याप्त स्थान मिल सके।
पौधों को वृद्धि के लिए विभिन्न पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, जो मुख्यतः मृदा से प्राप्त होते हैं। ये पोषक तत्व मृदा खनिज कहलाते हैं। इनमें नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटैशियम (K) तथा सूक्ष्म पोषक तत्व शामिल हैं। बार-बार फ़सल उगाने से मृदा में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। इस कमी को पूरा करने के लिए खाद एवं उर्वरकों का उपयोग किया जाता है।
खाद एक जैविक पदार्थ है जो पौधों एवं जानवरों के अपशिष्ट पदार्थों के विघटन से प्राप्त होता है। इसे कंपोस्ट (Compost) भी कहते हैं। कृषि में जानवरों का गोबर, पौधों का कूड़ा-कचरा आदि मिलाकर गड्ढे में विघटित कर गोबर खाद या कंपोस्ट खाद बनाई जाती है।
खाद के लाभ: - यह मृदा में ह्यूमस (Humus) की मात्रा बढ़ाती है। - मृदा की जल धारण क्षमता में वृद्धि करती है। - मृदा को वायु संचार के लिए भुरभुरी बनाती है। - मृदा के जल निकासी को बेहतर बनाती है। - यह पर्यावरण अनुकूल एवं सस्ती होती है।
उर्वरक ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जिनका उपयोग मृदा में पोषक तत्वों की कमी पूरी करने के लिए किया जाता है। ये कारखानों में निर्मित होते हैं। मुख्य उर्वरकों में यूरिया (Urea), अमोनियम सल्फेट (Ammonium Sulphate), सुपर फॉस्फेट (Super Phosphate), पोटाश (Potash) आदि शामिल हैं। उर्वरकों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम की अधिक मात्रा होती है। उर्वरक का अति प्रयोग मृदा की उर्वरा शक्ति को हानि पहुँचा सकता है, इसलिए उर्वरकों का प्रयोग संतुलित मात्रा में करना चाहिए।
खाद और उर्वरक में अंतर: खाद जैविक एवं प्राकृतिक होती है, जबकि उर्वरक रासायनिक एवं कृत्रिम होते हैं। खाद मृदा की भौतिक गुणवत्ता सुधारती है, जबकि उर्वरक केवल पोषक तत्व प्रदान करते हैं। उर्वरक पानी में घुलनशील होते हैं जबकि खाद पानी में नहीं घुलती।
कुछ पौधे, जैसे दलहनी फ़सलें (मटर, चना), जड़ों में स्थित राइज़ोबियम जीवाणुओं की सहायता से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रेट में परिवर्तित करती हैं। इस प्रक्रिया को जैव नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Biological Nitrogen Fixation) कहते हैं। यह मृदा की नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाने का एक प्राकृतिक तरीका है।
पौधों को नियमित अंतराल पर जल की आपूर्ति की जाने वाली प्रक्रिया को सिंचाई कहते हैं। जल की कमी के कारण फ़सलों का उत्पादन घट सकता है। मृदा में जल की मात्रा को नियंत्रित करने की प्रक्रिया को मृदा जल प्रबंधन कहते हैं। सिंचाई के समय एवं मात्रा का निर्धारण फ़सल के प्रकार, मृदा की प्रकृति एवं ऋतु के अनुसार होता है।
सिंचाई के विभिन्न स्रोत हैं - कुआँ, तालाब, नहर, नदी, बाँध, कृत्रिम नहरें तथा आधुनिक स्रोत जैसे कि भूमिगत जल पंप करने के लिए पाइप लाइन एवं ट्यूबवेल।
फ़सल के साथ-साथ खेतों में अवांछित पौधे भी उग आते हैं, जिन्हें खरपतवार (Weeds) कहते हैं। खरपतवारों की उपस्थिति फ़सल के लिए हानिकारक होती है क्योंकि ये पौधों से जल, पोषक तत्व, प्रकाश एवं स्थान छीन लेते हैं। इन्हें हटाने की प्रक्रिया को निराई-गुड़ाई कहते हैं।
खरपतवारों के उदाहरण: अमर बूटी (Xanthium), जंगली जई (Wild Oat), कंस (Grass weed) आदि।
फ़सल के पकने पर उसे काटने की प्रक्रिया को कटाई कहते हैं। कटाई हाथ से दराँती (Sickle) की सहायता से या हार्वेस्टर नामक मशीन द्वारा की जा सकती है। पके अनाज में नमी की मात्रा कम होनी चाहिए।
कटाई के बाद अनाज को पौधों से अलग करने की प्रक्रिया को थ्रेशिंग कहते हैं। यह कार्य बैलों द्वारा या मशीन (थ्रेशर) द्वारा किया जाता है।
दानों को भूसी से अलग करने की प्रक्रिया को मड़ाई कहते हैं। इसके लिए पुरानी विधि में हवा का उपयोग किया जाता था, जबकि आधुनिक विधि में मशीनों का उपयोग होता है। कटाई, थ्रेशिंग एवं मड़ाई एक साथ करने वाली मशीन को कंबाइन हार्वेस्टर (Combine Harvester) कहते हैं।
अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उचित भंडारण आवश्यक है। भंडारण के दौरान नमी से बचाव आवश्यक है, क्योंकि नमी में कवक (फफूँद) पनपकर अनाज को नष्ट कर सकते हैं। भंडारण से पहले अनाज को धूप में सुखाना चाहिए। भंडारण के लिए साइलो (Silos) और ग्रेनरीज (Granaries) का उपयोग किया जाता है। सरकारी स्तर पर भी फ़सल का खरीद एवं भंडारण किया जाता है। भंडारण करते समय सुरक्षित रखने के लिए रसायनों का उपयोग भी किया जा सकता है।
कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी एक महत्वपूर्ण व्यवसाय है। पशुपालन में गाय, भैंस, बकरी, मुर्गी, मछली आदि का पालन शामिल है। इनसे हमें दूध, अंडे, मांस, ऊन आदि प्राप्त होते हैं। पशुपालन किसानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। कई किसान खेती के साथ-साथ पशुपालन भी करते हैं। खरीफ एवं रबी फ़सलों के बीच की अवधि में किसान पशुपालन जैसे अन्य कार्य कर सकते हैं।
| कृषि कार्य | प्रयुक्त उपकरण | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|
| भूमि की तैयारी | हल, कुदाल, कल्टीवेटर | मृदा को भुरभुरा एवं समतल बनाना |
| बुवाई | सीड ड्रिल | बीजों को उचित गहराई एवं दूरी पर बोना |
| सिंचाई | फव्वारा, टपकन प्रणाली | पौधों को जल की आपूर्ति |
| निराई-गुड़ाई | कुदाल, खरपतवारनाशी | खरपतवारों को हटाना |
| कटाई | दराँती, कंबाइन हार्वेस्टर | पकी फ़सल काटना |
| थ्रेशिंग | थ्रेशर | दानों को पौधों से अलग करना |
| भंडारण | साइलो, ग्रेनरी | अनाज को सुरक्षित रखना |
| विशेषता | खाद (Manure) | उर्वरक (Fertilizer) |
|---|---|---|
| प्रकृति | जैविक | रासायनिक |
| निर्माण | पौधों एवं पशुओं के अपशिष्ट से प्राकृतिक रूप से | कारखानों में कृत्रिम रूप से |
| पोषक तत्व | कम मात्रा में | अधिक मात्रा में |
| मृदा पर प्रभाव | मृदा की गुणवत्ता सुधारती है | अति प्रयोग से मृदा हानिकारक होती है |
| जल में घुलनशीलता | नहीं घुलती | घुल जाती है |
| ऋतु | बुवाई समय | कटाई समय | प्रमुख फ़सलें |
|---|---|---|---|
| खरीफ़ | जून-जुलाई | अक्टूबर-नवंबर | धान, मक्का, बाजरा, कपास |
| रबी | अक्टूबर-नवंबर | अप्रैल-मई | गेहूँ, चना, मटर, सरसों |
फ़सल उत्पादन एवं प्रबंधन कृषि विज्ञान का मूलभूत विषय है। इस अध्याय में हमने सीखा कि फ़सल उगाने के लिए भूमि की तैयारी, बुवाई, सिंचाई, खाद एवं उर्वरक का उपयोग, निराई-गुड़ाई, कटाई एवं भंडारण जैसे विभिन्न चरणों का सही क्रम में पालन करना आवश्यक है। खरीफ़ और रबी फ़सल ऋतुओं की पहचान, खाद एवं उर्वरक के बीच का अंतर तथा आधुनिक सिंचाई विधियों का ज्ञान हमें बेहतर कृषि प्रबंधन में सहायता करता है। जल एवं मृदा संरक्षण के साथ-साथ संतुलित उर्वरकों के प्रयोग से हम दीर्घकालिक रूप से उपज बढ़ा सकते हैं। यह अध्याय न केवल परीक्षा की दृष्टि से बल्कि वास्तविक जीवन में कृषि की समझ विकसित करने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।