पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के पौधे एवं जंतु पाए जाते हैं। इनकी विविधता को जैव विविधता (Biodiversity) कहते हैं। मानव के अनियंत्रित विकास, वनों की कटाई, शिकार एवं प्रदूषण के कारण अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। वे प्रजातियाँ जिनके अस्तित्व को खतरा हो गया है, वे लुप्तप्राय प्रजातियाँ (Endangered Species) कहलाती हैं, जबकि जो प्रजातियाँ अब कहीं नहीं पाई जातीं, वे विलुप्त प्रजातियाँ (Extinct Species) कहलाती हैं। पौधों एवं जंतुओं को बचाने के लिए हमें उनका संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक है। संरक्षण के दो उपाय हैं - संरक्षण स्थल पर (In-situ Conservation) अर्थात उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षण, और संरक्षण स्थल से बाहर (Ex-situ Conservation) अर्थात उनके प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षण। इस अध्याय में हम संरक्षण के विभिन्न तरीकों, अभयारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों, जैव विविधता हॉटस्पॉट एवं पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन करेंगे।
वन पौधों एवं जंतुओं का प्राकृतिक निवास हैं। वन हमें अनेक प्रकार के उत्पाद जैसे लकड़ी, फल, औषधियाँ, रेज़िन, गोंद आदि प्रदान करते हैं। वन वर्षा कराने, मृदा का कटाव रोकने, वायु को शुद्ध करने एवं पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं। वन्य जीवों में जंगली जंतु, पक्षी, सरीसृप एवं कीट शामिल हैं। वनों की कटाई (Deforestation) से वन्य जीवों का आवास नष्ट होता है, जिससे अनेक प्रजातियाँ लुप्तप्राय हो जाती हैं। वन एवं वन्य जीव एक-दूसरे से जुड़े हैं - जंतु वनों पर निर्भर हैं और वनों के संरक्षण हेतु जंतु आवश्यक हैं। इसलिए वन एवं वन्य जीवों का संरक्षण साथ-साथ करना चाहिए।
किसी क्षेत्र के सभी जीव (पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव) तथा निर्जीव घटक (जल, मृदा, वायु, ताप) आपस में अंतःक्रिया करते हैं। इनका समग्र तंत्र पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) कहलाता है। पारिस्थितिकी तंत्र में सभी घटक आपस में जुड़े होते हैं। यदि एक घटक में परिवर्तन होता है, तो संपूर्ण तंत्र प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए, यदि वनों में बाघों की संख्या घटती है, तो हिरणों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे वनस्पति नष्ट होती है। इस प्रकार पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है। संरक्षण के लिए पारिस्थितिकी तंत्र के इस परस्पर संबंध को समझना आवश्यक है।
पौधों एवं जंतुओं के संरक्षण के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं:
जंगली जंतुओं को उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रखने के लिए स्थापित किए गए क्षेत्र को अभयारण्य कहते हैं। अभयारण्य में जंतुओं की रक्षा की जाती है और उन्हें वहाँ शिकार से सुरक्षा मिलती है। अभयारण्य में जंतुओं का प्रजनन एवं संरक्षण किया जाता है। भारत में अनेक अभयारण्य हैं, जैसे गुजरात का गिर अभयारण्य (सिंहों के लिए)।
बड़े क्षेत्र में फैले वन क्षेत्र जिन्हें सरकार द्वारा संरक्षित किया जाता है और जहाँ मानवीय हस्तक्षेप सीमित होता है, राष्ट्रीय उद्यान कहलाते हैं। राष्ट्रीय उद्यान में पौधों एवं जंतुओं का प्राकृतिक पर्यावरण सहित संरक्षण होता है। भारत के प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान हैं - जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (उत्तराखंड), कान्हा राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश), काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (असम, एक सींग वाले गैंडों के लिए प्रसिद्ध), सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान (बाघ एवं मैंग्रोव), बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश)।
बड़े क्षेत्रों को संरक्षित करने के लिए स्थापित किए जाने वाले क्षेत्र बायोस्फीयर रिज़र्व कहलाते हैं। ये पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए स्थापित किए जाते हैं। बायोस्फीयर रिज़र्व में पौधे, जंतु एवं मानव सभी का संरक्षण किया जाता है। यहाँ संरक्षण स्थल से बाहर भी प्रजातियों का संरक्षण होता है। भारत के कुछ बायोस्फीयर रिज़र्व हैं - नीलगिरी बायोस्फीयर रिज़र्व, सुंदरवन बायोस्फीयर रिज़र्व, नंदा देवी बायोस्फीयर रिज़र्व, गल्फ ऑफ मन्नार बायोस्फीयर रिज़र्व।
ऐसे क्षेत्र जहाँ जैव विविधता बहुत अधिक होती है लेकिन जो खतरे में होते हैं, उन्हें जैव विविधता हॉटस्पॉट कहते हैं। भारत में दो प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं - पूर्वी हिमालय एवं पश्चिमी घाट।
ये संरक्षण स्थल से बाहर (Ex-situ) संरक्षण के उदाहरण हैं। वनस्पति उद्यानों में विभिन्न पौधों की प्रजातियाँ उगाई जाती हैं, जबकि प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर) में जंतुओं को कैद में रखकर उनका पालन एवं संरक्षण किया जाता है।
भारत सरकार ने जंगली जंतुओं एवं पौधों की सुरक्षा के लिए वन्य जीव संरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act, 1972) बनाया है। इस अधिनियम के अंतर्गत अनेक प्रजातियों के शिकार एवं अवैध व्यापार पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसी के अंतर्गत राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य एवं जलपक्षी आरक्षण क्षेत्र स्थापित किए गए हैं।
बाघों की घटती संख्या को देखते हुए भारत सरकार ने 1973 में बाघ परियोजना (Project Tiger) प्रारंभ की थी। इस परियोजना का उद्देश्य बाघों को विलुप्ति से बचाना एवं उनकी संख्या में वृद्धि करना था। इसके अंतर्गत बाघ अभयारण्य स्थापित किए गए। इस परियोजना के फलस्वरूप बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
किसी क्षेत्र में वनों की कटाई के बाद वहाँ नए वृक्ष लगाने की प्रक्रिया को पुनर्वनरोपण (Reforestation) कहते हैं। पुनर्वनरोपण से वनों का क्षेत्र बढ़ता है और पारिस्थितिकी संतुलन बना रहता है। वनोन्मूलन (Deforestation) के हानिकारक प्रभाव: - वर्षा में कमी आती है। - मृदा का कटाव (Soil Erosion) बढ़ता है। - कार्बन डाइऑक्साइड में वृद्धि होती है। - वन्य जीवों का आवास नष्ट होता है। - ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है। - बाढ़ एवं सूखा जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं।
| संरक्षण प्रकार | विधि | उदाहरण |
|---|---|---|
| संरक्षण स्थल पर (In-situ) | प्राकृतिक आवास में | अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान, बायोस्फीयर रिज़र्व |
| संरक्षण स्थल से बाहर (Ex-situ) | आवास से बाहर | वनस्पति उद्यान, प्राणी उद्यान |
| राष्ट्रीय उद्यान | राज्य | प्रसिद्धि |
|---|---|---|
| जिम कॉर्बेट | उत्तराखंड | बाघ |
| कान्हा | मध्य प्रदेश | बारहसिंगा, बाघ |
| काज़ीरंगा | असम | एक सींग वाला गैंडा |
| सुंदरवन | पश्चिम बंगाल | बाघ, मैंग्रोव |
| प्रकार | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| विलुप्त | कहीं नहीं पाई जातीं | डोडो, क्वागा |
| लुप्तप्राय | अस्तित्व संकट में | बाघ, एक सींग वाला गैंडा |
इस अध्याय में हमने सीखा कि पौधों एवं जंतुओं का संरक्षण पर्यावरण के लिए अत्यंत आवश्यक है। जैव विविधता पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र का आधार है। वनोन्मूलन, शिकार एवं प्रदूषण से अनेक प्रजातियाँ लुप्तप्राय हो रही हैं। संरक्षण के दो मुख्य तरीके हैं - प्राकृतिक आवास में संरक्षण (अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान, बायोस्फीयर रिज़र्व) तथा आवास से बाहर संरक्षण (वनस्पति उद्यान, प्राणी उद्यान)। भारत सरकार ने वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 एवं बाघ परियोजना 1973 जैसे कदम उठाए हैं। पुनर्वनरोपण से वनों की हानि को पूरा किया जा सकता है। प्रत्येक नागरिक को वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण में योगदान देना चाहिए, क्योंकि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन ही हमारे जीवन की सुरक्षा है।