इतिहास केवल तारीखों और नामों की सूची नहीं है, बल्कि यह हमें बताता है कि समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति में समय के साथ कैसे परिवर्तन आए। कक्षा 8 की यह पुस्तक मुख्य रूप से उस कालखंड पर केंद्रित है जब भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार बढ़ रहा था, अर्थात लगभग 1700 से लेकर 20वीं शताब्दी के प्रारंभ तक। इस अध्याय में हम जानेंगे कि इतिहासकार किस प्रकार समय को मापते हैं, पुराने दस्तावेज़ों और स्रोतों का उपयोग करते हैं, और किस तरह हमारे अतीत का पुनर्निर्माण किया जाता है।
इतिहास में समय को बी.सी. (BC) और ए.डी. (AD) में विभाजित किया गया है। ईसा मसीह के जन्म से पहले के वर्षों को बी.सी. और जन्म के बाद के वर्षों को ए.डी. कहा जाता है। हालाँकि आजकल इतिहासकार अधिकांशतः ईसा पूर्व और ईस्वी के बजाय वर्षों को सरलता से लिखते हैं।
जब हम किसी साम्राज्य, राजवंश या घटना की चर्चा करते हैं तो वह अक्सर एक सदी (100 वर्ष) में फैली होती है। इस पुस्तक की समय-सीमा का विशेष महत्व है क्योंकि इसी काल में औद्योगिक क्रांति, व्यापार का विस्तार, उपनिवेशवाद और राष्ट्रीय जागृति जैसी घटनाएँ घटीं। इतिहासकार प्रारंभिक और मध्य काल के लिए पुरातात्विक साक्ष्यों पर निर्भर करते हैं, जबकि आधुनिक काल के लिए उनके पास लिखित दस्तावेज़ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपनी पकड़ मजबूत की, तो उसे अपने शासन के लिए रिकॉर्ड की आवश्यकता हुई। इसके लिए ब्रिटिश प्रशासन ने विभिन्न प्रकार के दस्तावेज़ तैयार किए:
इन दस्तावेज़ों के आधार पर इतिहासकार अतीत की घटनाओं को समझने की कोशिश करते हैं, किंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ब्रिटिश दृष्टिकोण से लिखे गए ये रिकॉर्ड पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होते।
ब्रिटिश रिकॉर्ड के अलावा, भारतीय समाज के अतीत को जानने के लिए अन्य स्रोत भी मिलते हैं। किसानों, कारीगरों, महिलाओं, गरीबों तथा आदिवासियों की आवाज़ आधिकारिक दस्तावेज़ों में कम ही सुनाई देती है। इसीलिए इतिहासकार अब सामाजिक इतिहास पर भी ध्यान देते हैं, जिसमें लोकगीत, कहावतें, चित्र, मूर्तियाँ, इमारतें, तस्वीरें और स्थानीय अभिलेख शामिल होते हैं।
पुरातत्वविदों द्वारा खोदे गए अवशेष, सिक्के, मुहरें और अभिलेख हमें उस काल की आर्थिक स्थिति, धार्मिक आस्थाओं और सामाजिक ढाँचे की जानकारी देते हैं। इतिहास का पुनर्निर्माण इन विभिन्न स्रोतों के संयोजन से ही संभव होता है।
इतिहास लिखने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। पहले इतिहासकार विभिन्न स्रोतों का संकलन करता है, फिर उनकी प्रामाणिकता की जाँच करता है। इसके बाद वह घटनाओं की तिथि और स्थान का निर्धारण करता है तथा उनमें कारण-कार्य संबंध खोजता है। अंत में वह सभी तथ्यों को एक सुसंगत कहानी के रूप में प्रस्तुत करता है।
हमें यह समझना चाहिए कि इतिहास केवल तथ्यों का संग्रह नहीं है। इतिहासकार की दृष्टि और उसके समय का प्रभाव इतिहास-लेखन पर पड़ता है। इसीलिए एक ही घटना के बारे में अलग-अलग इतिहासकार अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकते हैं।
यह पुस्तक तीन मुख्य भागों में विभाजित है:
इन तीनों भागों का अध्ययन एक साथ करने से हमें समाज की समग्र समझ विकसित होती है।
| शब्द | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| सदी (Century) | 100 वर्ष | 19वीं सदी = 1801–1900 |
| दशक (Decade) | 10 वर्ष | 1857–1867 |
| बी.सी. (BC) | ईसा से पहले | अशोक, 3री सदी ई.पू. |
| ए.डी. (AD) | ईसा के बाद | 1857 का विद्रोह |
| स्रोत का प्रकार | उदाहरण | महत्व |
|---|---|---|
| लिखित दस्तावेज़ | सरकारी रिपोर्ट, पत्र, डायरी | प्रशासनिक जानकारी |
| पुरातात्विक साक्ष्य | सिक्के, मुहरें, मूर्तियाँ | आर्थिक-सांस्कृतिक जानकारी |
| मौखिक परंपरा | लोकगीत, कहावतें | जनसामान्य की आवाज़ |
| दृश्य स्रोत | पेंटिंग, तस्वीरें, नक्शे | घटनाओं का चित्रण |
इतिहास केवल तारीखों को रटने का विषय नहीं, बल्कि समाज को समझने की एक विधि है। स्रोतों की पहचान, उनकी विश्वसनीयता की जाँच और घटनाओं के बीच कारण-प्रभाव को समझकर ही हम अपने अतीत को बेहतर ढंग से जान सकते हैं। यह अध्याय हमें सिखाता है कि इतिहासकार एक जाँचकर्ता की तरह साक्ष्य जुटाता है और उसके आधार पर अतीत का पुनर्निर्माण करता है। आगे के अध्यायों में हम इन्हीं विधियों का उपयोग करते हुए कंपनी राज के विस्तार से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक की यात्रा का अध्ययन करेंगे।