Comprehensive theory, key formulas, diagrams, and memory aids for राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन.
19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में भारत में एक नया राजनीतिक जागरण हुआ। शिक्षित भारतीयों ने संगठित होकर ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना करना शुरू किया। धीरे-धीरे यह विभिन्न आंदोलनों का रूप लेने लगा, जिनमें राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन हुआ। इस अध्याय में हम राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना, उदारवादी और उग्रवादी धड़ों के विचारों तथा आंदोलनों का अध्ययन करेंगे।
19वीं शताब्दी में भारत में राष्ट्रीय जागरण के अनेक कारण थे:
1870 के दशक के बाद भारत में राजनीतिक संगठन बनने लगे। इनमें प्रमुख थे:
इन संगठनों ने विभिन्न क्षेत्रों में कार्य किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर का कोई संगठन नहीं था। इसी आवश्यकता के कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।
1885 में ए.ओ. ह्यूम (एलन ऑक्टेवियन ह्यूम), जो सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी थे, के प्रयासों से बंबई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। इसका पहला अधिवेशन बंबई में डब्ल्यू.सी. बनर्जी की अध्यक्षता में हुआ।
कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्य:
कांग्रेस में प्रारंभ में उदारवादी (मॉडरेट) नेताओं का प्रभुत्व था।
कांग्रेस के इतिहास में दो प्रमुख धड़े थे:
उदारवादी नेता अंग्रेज़ों से संवाद और सुधार के माध्यम से आज़ादी चाहते थे। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए लाभदायक हो सकता है, यदि वह निष्पक्ष हो। उनकी माँगें थीं:
प्रमुख उदारवादी नेता: दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता और सुरेंद्रनाथ बनर्जी।
20वीं शताब्दी के प्रारंभ में उग्रवादी विचारधारा बढ़ी। उग्रवादियों का मानना था कि संवाद से कुछ नहीं होगा, बल्कि अधिक आक्रामक संघर्ष की आवश्यकता है। उनकी माँगें थीं:
प्रमुख उग्रवादी नेता: बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल। इन तीनों को लाल-बाल-पाल कहा जाता था।
1905 में लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन कर दिया। इसका उद्देश्य बंगाल में राष्ट्रवाद को कमज़ोर करना था। इस विभाजन के विरुद्ध भारत में व्यापक आंदोलन हुआ। स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर ज़ोर दिया गया।
1911 में बंगाल के विभाजन को वापस ले लिया गया। स्वदेशी आंदोलन ने भारतीयों में एकता और आत्मनिर्भरता की भावना जगाई।
20वीं शताब्दी में राष्ट्रीय आंदोलन का विस्तार हुआ। अब केवल शिक्षित वर्ग ही नहीं, बल्कि किसान, मजदूर, महिलाएँ और आम जनता भी आंदोलन में शामिल होने लगी। महात्मा गांधी के नेतृत्व में आंदोलन और व्यापक हुआ। स्वतंत्रता संग्राम में किसान आंदोलन, मजदूर संघ और महिला संगठन भी सक्रिय हुए।
| संगठन | वर्ष | स्थापक |
|---|---|---|
| प्रार्थना समाज | 1870 | बंबई |
| आर्य समाज | 1875 | दयानंद सरस्वती |
| इंडियन एसोसिएशन | 1876 | सुरेंद्रनाथ बनर्जी |
| कांग्रेस | 1885 | ए.ओ. ह्यूम |
| विशेषता | उदारवादी | उग्रवादी |
|---|---|---|
| तरीका | संवाद, सुधार | आक्रामक संघर्ष |
| माँग | प्रशासनिक सुधार | स्वराज |
| प्रमुख नेता | नौरोजी, गोखले | तिलक, लाजपत राय |
graph TD
A["राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन"] --> B["राष्ट्रीय जागरण"]
B --> B1["अंग्रेज़ी शिक्षा"]
B --> B2["रेलवे, संचार"]
B --> B3["आर्थिक शोषण"]
A --> C["कांग्रेस (1885)"]
C --> C1["ए.ओ. ह्यूम"]
C --> C2["पहला अधिवेशन: डब्ल्यू.सी. बनर्जी"]
A --> D["उदारवादी"]
D --> D1["संवाद और सुधार"]
D --> D2["नौरोजी, गोखले"]
A --> E["उग्रवादी"]
E --> E1["स्वराज की माँग"]
E --> E2["तिलक, लाजपत राय, पाल"]
A --> F["स्वदेशी आंदोलन (1905)"]
F --> F1["बंगाल विभाजन का विरोध"]
F --> F2["विदेशी बहिष्कार"]
19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में भारत में राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ। अंग्रेज़ी शिक्षा, संचार के साधनों और आर्थिक शोषण के कारण भारतीयों में एकता की भावना विकसित हुई। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक संगठित रूप दिया। उदारवादी और उग्रवादी दो धड़ों ने अपने-अपने तरीकों से संघर्ष किया। 1905 के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा दी। धीरे-धीरे आंदोलन में किसान, मजदूर और महिलाएँ भी शामिल हुए, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन जन-आंदोलन बन गया।