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1. परिचय

19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में भारत में एक नया राजनीतिक जागरण हुआ। शिक्षित भारतीयों ने संगठित होकर ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना करना शुरू किया। धीरे-धीरे यह विभिन्न आंदोलनों का रूप लेने लगा, जिनमें राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन हुआ। इस अध्याय में हम राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना, उदारवादी और उग्रवादी धड़ों के विचारों तथा आंदोलनों का अध्ययन करेंगे।

2. राष्ट्रीय जागरण के कारण

19वीं शताब्दी में भारत में राष्ट्रीय जागरण के अनेक कारण थे:

  1. अंग्रेज़ी शिक्षा: अंग्रेज़ी शिक्षा के माध्यम से भारतीयों में स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के विचार आए।
  2. संचार के साधन: रेलवे, डाक और समाचार पत्रों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों को आपस में जोड़ा।
  3. अंग्रेज़ों की आर्थिक नीतियाँ: भारत से धन का बहिर्गमन और उद्योगों का विनाश भारतीयों में असंतोष पैदा कर रहा था।
  4. सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन: इन आंदोलनों ने भारतीयों में आत्म-गौरव और एकता की भावना जगाई।
  5. अंग्रेज़ों का नस्लीय भेदभाव: भारतीयों को नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ता था।

3. राजनीतिक संगठनों की स्थापना

1870 के दशक के बाद भारत में राजनीतिक संगठन बनने लगे। इनमें प्रमुख थे:

  1. प्रार्थना समाज: बंबई (1870) में स्थापित।
  2. आर्य समाज: दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित।
  3. इंडियन एसोसिएशन: सुरेंद्रनाथ बनर्जी द्वारा 1876 में स्थापित।
  4. मद्रास महाजन सभा: 1884 में स्थापित।

इन संगठनों ने विभिन्न क्षेत्रों में कार्य किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर का कोई संगठन नहीं था। इसी आवश्यकता के कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई।

4. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

1885 में ए.ओ. ह्यूम (एलन ऑक्टेवियन ह्यूम), जो सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी थे, के प्रयासों से बंबई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। इसका पहला अधिवेशन बंबई में डब्ल्यू.सी. बनर्जी की अध्यक्षता में हुआ।

कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्य:

  1. सभी क्षेत्रों के भारतीयों को एक मंच पर लाना।
  2. शिक्षित भारतीयों की माँगों को सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना।
  3. सरकार और जनता के बीच संवाद स्थापित करना।

कांग्रेस में प्रारंभ में उदारवादी (मॉडरेट) नेताओं का प्रभुत्व था।

5. उदारवादी और उग्रवादी धड़े

कांग्रेस के इतिहास में दो प्रमुख धड़े थे:

5.1 उदारवादी (मॉडरेट)

उदारवादी नेता अंग्रेज़ों से संवाद और सुधार के माध्यम से आज़ादी चाहते थे। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए लाभदायक हो सकता है, यदि वह निष्पक्ष हो। उनकी माँगें थीं:

प्रमुख उदारवादी नेता: दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता और सुरेंद्रनाथ बनर्जी

5.2 उग्रवादी (एक्स्ट्रीमिस्ट)

20वीं शताब्दी के प्रारंभ में उग्रवादी विचारधारा बढ़ी। उग्रवादियों का मानना था कि संवाद से कुछ नहीं होगा, बल्कि अधिक आक्रामक संघर्ष की आवश्यकता है। उनकी माँगें थीं:

प्रमुख उग्रवादी नेता: बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल। इन तीनों को लाल-बाल-पाल कहा जाता था।

6. स्वदेशी आंदोलन और बंगाल का विभाजन

1905 में लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन कर दिया। इसका उद्देश्य बंगाल में राष्ट्रवाद को कमज़ोर करना था। इस विभाजन के विरुद्ध भारत में व्यापक आंदोलन हुआ। स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर ज़ोर दिया गया।

1911 में बंगाल के विभाजन को वापस ले लिया गया। स्वदेशी आंदोलन ने भारतीयों में एकता और आत्मनिर्भरता की भावना जगाई।

7. राष्ट्रीय आंदोलन का विस्तार

20वीं शताब्दी में राष्ट्रीय आंदोलन का विस्तार हुआ। अब केवल शिक्षित वर्ग ही नहीं, बल्कि किसान, मजदूर, महिलाएँ और आम जनता भी आंदोलन में शामिल होने लगी। महात्मा गांधी के नेतृत्व में आंदोलन और व्यापक हुआ। स्वतंत्रता संग्राम में किसान आंदोलन, मजदूर संघ और महिला संगठन भी सक्रिय हुए।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: प्रमुख राजनीतिक संगठन

संगठन वर्ष स्थापक
प्रार्थना समाज 1870 बंबई
आर्य समाज 1875 दयानंद सरस्वती
इंडियन एसोसिएशन 1876 सुरेंद्रनाथ बनर्जी
कांग्रेस 1885 ए.ओ. ह्यूम

तालिका 2: उदारवादी बनाम उग्रवादी

विशेषता उदारवादी उग्रवादी
तरीका संवाद, सुधार आक्रामक संघर्ष
माँग प्रशासनिक सुधार स्वराज
प्रमुख नेता नौरोजी, गोखले तिलक, लाजपत राय

माइंड मैप

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महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: कांग्रेस और धड़े

कांग्रेस (1885) उदारवादी संवाद, सुधार का मार्ग प्रतिनिधि सभा विस्तार सिविल सेवा में भागीदारी नेता: नौरोजी, गोखले, मेहता उग्रवादी आक्रामक संघर्ष स्वराज की माँग स्वदेशी, बहिष्कार नेता: तिलक, लाजपत राय, पाल लाल-बाल-पाल लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल स्वर्ण नियम (Golden Rule) तरीका + नेता + माँग तीनों याद रखें

आरेख 2: स्वदेशी आंदोलन (1905)

स्वदेशी आंदोलन कारण: 1905 में बंगाल का विभाजन लॉर्ड कर्ज़न द्वारा तरीका विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार प्रभाव एकता और आत्मनिर्भरता परिणाम 1911 में विभाजन वापस लिया गया Golden Rule कारण → तरीका → प्रभाव → परिणाम

सामान्य गलतियाँ

  1. कांग्रेस की स्थापना का वर्ष (1885) को 1887 या 1875 (आर्य समाज) के साथ भ्रमित करना आम गलती है।
  2. ए.ओ. ह्यूम को भारतीय नेता समझ लेना गलत है; वे सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी थे।
  3. उदारवादी और उग्रवादी नेताओं को मिलाना गलत है; गोखले उदारवादी, तिलक उग्रवादी थे।
  4. बंगाल के विभाजन का वर्ष (1905) भूल जाना गलत है।
  5. लाल-बाल-पाल को उदारवादी मान लेना गलत है; वे उग्रवादी नेता थे।
  6. आंदोलन में केवल शिक्षित वर्ग का भाग होना मान लेना गलत है; किसान, मजदूर और महिलाएँ भी शामिल हुए।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. 1885 (कांग्रेस), 1905 (बंगाल विभाजन) के वर्ष निश्चित रूप से याद करें।
  2. उदारवादी बनाम उग्रवादी की तुलनात्मक तालिका बनाएँ।
  3. लाल-बाल-पाल और उनके नाम पूरे लिखने का अभ्यास करें।
  4. स्वदेशी आंदोलन का कारण, तरीका और परिणाम क्रम से लिखें।
  5. राष्ट्रीय जागरण के कारणों को बिंदुवार याद करें।
  6. आंदोलन के विस्तार (किसान, मजदूर, महिलाएँ) को वर्णनात्मक उत्तरों में शामिल करें।

निष्कर्ष

19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में भारत में राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ। अंग्रेज़ी शिक्षा, संचार के साधनों और आर्थिक शोषण के कारण भारतीयों में एकता की भावना विकसित हुई। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक संगठित रूप दिया। उदारवादी और उग्रवादी दो धड़ों ने अपने-अपने तरीकों से संघर्ष किया। 1905 के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा दी। धीरे-धीरे आंदोलन में किसान, मजदूर और महिलाएँ भी शामिल हुए, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन जन-आंदोलन बन गया।