यह अध्याय बताता है कि किस प्रकार ईस्ट इंडिया कंपनी, जो प्रारंभ में केवल एक व्यापारिक संस्था थी, धीरे-धीरे भारत की एक शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बन गई। कंपनी ने अपने व्यापार की सुरक्षा के लिए सेनाएँ खड़ी कीं, स्थानीय शासकों से संधियाँ कीं और युद्ध जीते। इस प्रकार एक व्यापारिक कंपनी का भारत के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक में परिवर्तन इस अध्याय की मुख्य कहानी है।
1600 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूर्वी देशों के साथ व्यापार का अधिकार प्राप्त किया। प्रारंभ में इसका उद्देश्य केवल मसालों जैसे वस्तुओं का व्यापार था। 17वीं शताब्दी में कंपनी ने सूरत, मद्रास (चेन्नई), कलकत्ता (कोलकाता) तथा बंबई (मुंबई) में अपने कारखाने स्थापित किए। इन स्थानों को व्यापारिक स्टेशन या कारखाने कहा जाता था।
धीरे-धीरे कंपनी का व्यापार फूलने लगा। सूती वस्त्र, रेशम, नील और मसाले प्रमुख निर्यात थे। कंपनी ने स्थानीय शासकों से व्यापार करने की अनुमति और विशेषाधिकार प्राप्त किए। जहाँ स्थानीय शासक उन्हें रियायतें देते थे, वहीं कंपनी अपने अधिकारों का विस्तार करने का प्रयास करती रही।
17वीं शताब्दी में कंपनी के व्यापारी माल को अक्सर हमलों का सामना करना पड़ता था। इसलिए कंपनी ने अपने माल की सुरक्षा के लिए सेनाएँ खड़ी करनी शुरू कीं। इन सेनाओं को सिपाहियों की आवश्यकता थी, जो स्थानीय लोगों से भर्ती किए जाते थे। इस प्रकार कंपनी के पास अपनी सैन्य शक्ति आ गई।
कंपनी ने मीर जाफ़र, मीर कासिम जैसे नवाबों के साथ गठबंधन किए। भारतीय नवाबों में आपसी संघर्ष और अस्थिरता का लाभ उठाकर कंपनी ने अपनी स्थिति मजबूत की। अंग्रेज़ों की सेनाओं का प्रशिक्षण आधुनिक था और उनके पास बेहतर तोपखाना था, जिससे उन्हें युद्ध में लाभ मिलता था।
बंगाल भारत के सबसे धनी प्रांतों में से एक था, जिसके नवाब के पास अत्यधिक समृद्धि थी। 1757 में कंपनी ने प्लासी का युद्ध लड़ा, जिसमें रॉबर्ट क्लाइव की सेनाओं ने मीर जाफ़र की मदद से नवाब सिराज़ुद्दौला को हराया। इस युद्ध में निर्णायक भूमिका मीर जाफ़र की साज़िश की थी, जिन्होंने कंपनी की ओर धोखा दिया। युद्ध के बाद मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बनाया गया, लेकिन वह कंपनी का कठपुतली बना रहा।
1764 में बक्सर का युद्ध लड़ा गया, जिसमें कंपनी ने शाह आलम द्वितीय, मीर कासिम और अवध के नवाब शुजाउद्दौला की संयुक्त सेना को हराया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिली, जिसका अर्थ था कर वसूलने का अधिकार।
1765 में कंपनी को बंगाल की दीवानी प्राप्त हुई। अब कंपनी राजस्व वसूली की जिम्मेदारी निभाती थी। प्रारंभ में कंपनी ने यह अधिकार नवाब को सौंपा, लेकिन फिर 1772 में कंपनी ने स्वयं राजस्व वसूली शुरू की।
कंपनी की राजस्व नीति से किसानों और ज़मींदारों पर बोझ बढ़ा। कंपनी ने बंगाल से मिलने वाले राजस्व का उपयोग अपनी सेनाओं, प्रशासन और व्यापार के विस्तार में किया। इससे कंपनी की आमदनी बढ़ी लेकिन भारतीय किसानों की स्थिति कठिन हो गई। कंपनी द्वारा वसूला गया राजस्व उसके अपने माल (जैसे ओपियम) की खरीद में भी लगाया जाता था, जिससे भारत से धन बाहर जाने लगा।
कंपनी ने भारत के अन्य क्षेत्रों में भी अपना विस्तार किया। दक्षिण में टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ों का विरोध किया। टीपू ने आधुनिक तकनीक, तोपखाने और सेना में सुधार किए। उन्होंने मैसूर को आधुनिक बनाने का प्रयास किया। हालाँकि, चार युद्धों के बाद 1799 में टीपू सुल्तान की मृत्यु हो गई और मैसूर अंग्रेज़ों के नियंत्रण में आ गया।
इसी प्रकार मराठों, अवध के नवाबों और हैदराबाद के निज़ाम के साथ संधियाँ की गईं। अंग्रेज़ों ने सहायक संधि (Subsidiary Alliance) की नीति अपनाई, जिसके अंतर्गत स्थानीय शासक अपनी स्वतंत्र सेना नहीं रख सकते थे और उन्हें अंग्रेज़ों के संरक्षण में रहना पड़ता था। इस प्रकार धीरे-धीरे भारत का अधिकांश हिस्सा अंग्रेज़ों के अधीन आ गया।
अंग्रेज़ों ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए अनेक तरीक़े अपनाए:
| युद्ध | वर्ष | परिणाम |
|---|---|---|
| प्लासी का युद्ध | 1757 | सिराज़ुद्दौला की हार, मीर जाफ़र नवाब बना |
| बक्सर का युद्ध | 1764 | शाह आलम, मीर कासिम, शुजाउद्दौला की हार |
| चौथा मैसूर युद्ध | 1799 | टीपू सुल्तान की मृत्यु |
| तरीका | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| युद्ध | सैन्य टकराव | प्लासी, बक्सर |
| सहायक संधि | स्थानीय सेना नहीं रख सकते | हैदराबाद, अवध |
| हड़प नीति | बिना उत्तराधिकारी का राज्य | झांसी, सतारा |
| दीवानी | कर वसूली का अधिकार | बंगाल 1765 |
1600 में स्थापित एक साधारण व्यापारिक कंपनी ने धीरे-धीरे सैन्य शक्ति, कूटनीतिक चालों और आर्थिक अधिकारों के माध्यम से भारत का एक विशाल साम्राज्य बना लिया। प्लासी और बक्सर के युद्धों ने बंगाल को कंपनी के हाथों में सौंप दिया, और दीवानी ने राजस्व का रास्ता खोल दिया। सहायक संधि, हड़प नीति और प्रत्यक्ष शासन ने कंपनी के अधिकार को और मजबूत किया। टीपू सुल्तान जैसे शासकों ने प्रतिरोध किया, परंतु आधुनिक सैन्य तकनीक और आंतरिक संघर्षों के कारण वे सफल नहीं हो सके। इस प्रकार व्यापार से साम्राज्य तक की यह यात्रा भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ थी।