"द साउंड ऑफ़ म्यूज़िक" (The Sound of Music) दो भागों में विभाजित एक प्रेरणादायक पाठ है। पहला भाग "एवलिन ग्लेनी" (Evelyn Glennie) के बारे में है, जो बहरी होने के बावजूद विश्वविख्यात संगीतकार बनीं। दूसरा भाग "उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ" (Bismillah Khan) के बारे में है, जिन्होंने शहनाई को वैश्विक मंच पर पहुँचाया। यह पाठ दिखाता है कि इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और जुनून के बल पर कोई भी बाधा जीती जा सकती है।
एवलिन ग्लेनी का जन्म स्कॉटलैंड में हुआ था। आठ वर्ष की आयु तक उन्होंने ध्वनि की दुनिया का आनंद लिया, परंतु ग्यारह वर्ष की आयु में उनकी श्रवण शक्ति धीरे-धीरे घटने लगी। डॉक्टरों ने बताया कि उनकी सुनने की शक्ति क्षीण होती जा रही है। इस विपत्ति के बावजूद एवलिन ने हार नहीं मानी। अपनी माँ के मार्गदर्शन और अपने गुरु रॉन फोर्ब्स के प्रोत्साहन से उन्होंने संगीत को अपने शरीर के माध्यम से अनुभव करना सीखा। वे ध्वनि को कंपन के रूप में महसूस करने लगीं।
दूसरे भाग में बिस्मिल्लाह खाँ की कहानी है, जो बिहार के डुमराँव गाँव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय ख्याति तक पहुँचे। उन्होंने शहनाई को भारतीय संस्कृति का प्रतीक बनाया और 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर स्वतंत्रता के उपलक्ष्य में शहनाई वादन करके अमर हो गए। यह पाठ हमें सिखाता है कि अपनी प्रतिभा पर विश्वास रखने वाला व्यक्ति किसी भी सीमा से आगे निकल सकता है।
एवलिन का जन्म 19 अगस्त 1965 को स्कॉटलैंड में हुआ। आठ वर्ष की उम्र तक वह सामान्य बच्ची की तरह सुनती थीं। परंतु ग्यारह वर्ष की उम्र में जब वह स्कूल में ऑर्केस्ट्रा में शामिल हुईं, तो शिक्षिका रॉन फोर्ब्स ने देखा कि एवलिन प्रश्नों का उत्तर केवल नेत्रों को देखकर देती थी। पता चला कि उनकी श्रवण शक्ति धीरे-धीरे समाप्त हो रही थी।
डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि उनकी सुनने की शक्ति बढ़ती नहीं बल्कि घटती जा रही है। एक बार सुनने की शक्ति जाती रही, तो फिर लौटती नहीं। एवलिन के माता-पिता को यह खबर सहन करना कठिन था। परंतु एवलिन ने दृढ़ संकल्प से इस विपत्ति का सामना किया। उनकी माँ ने उन्हें एक स्कूल में भेजा, जहाँ उनकी मुलाकात रॉन फोर्ब्स से हुई, जिन्होंने उन्हें ध्वनि को अपने पूरे शरीर से महसूस करना सिखाया।
रॉन फोर्ब्स ने एवलिन को सिखाया कि ध्वनि न केवल कानों से बल्कि हाथों, पेट, चेहरे और पैरों से भी अनुभव की जा सकती है। वे नंगे पैर खड़े होकर तरंगों को महसूस करतीं, अपने हाथों को दीवार पर रखकर संगीत का कंपन अनुभव करतीं। इस प्रकार एवलिन ने ध्वनि के प्रति अपने शरीर को एक संवेदनशील उपकरण बना लिया।
एवलिन ने लंदन के रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूज़िक में प्रवेश लिया और स्नातक की उपाधि पूरी की। वे विश्व की सबसे अच्छी टक्कर-वादक (percussionist) बन गईं। उन्होंने शेफ़ील्ड विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर की उपाधि भी प्राप्त की। एवलिन ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग से यह सीखा कि जो बाधा हमें सबसे बड़ी लगती है, वही हमारा सबसे बड़ा गुरु बन सकती है।
बिस्मिल्लाह खाँ का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमराँव गाँव में हुआ। उनका वास्तविक नाम क़मरुद्दीन था, परंतु उनके पिता ने उन्हें 'बिस्मिल्लाह' नाम दिया। उनके दादा रसूल बख्श खाँ के घर के नाम के अनुसार उनका पालन-पोषण हुआ। बिस्मिल्लाह खाँ को बचपन से ही संगीत का शौक था और वे अपने घर के पास सुनाई देने वाली धुनों को सुनने के लिए मगन रहते थे।
बिस्मिल्लाह खाँ के चाचा अली बख्श उन्हें अपने साथ ले गए। बिस्मिल्लाह ने शहनाई को पहली बार सुना तो उन्हें यह पता चला कि यह वही वाद्य था जिसे सुनकर वे दूर से रोमांचित हो जाते थे। उन्होंने शहनाई बजाने का अभ्यास करना शुरू किया और जल्द ही इसके उस्ताद बन गए। वे सुबह-सुबह गंगा घाट पर जाकर रियाज़ करते थे, जहाँ की प्राकृतिक सुंदरता उनके संगीत में झलकती थी।
15 अगस्त 1947 का दिन बिस्मिल्लाह खाँ के जीवन का स्वर्णिम दिन था। पंडित जवाहरलाल नेहरू के निमंत्रण पर उन्होंने लाल किले पर शहनाई वादन किया, जिससे भारत का स्वतंत्रता दिवस और भी यादगार बन गया। बिस्मिल्लाह खाँ शहनाई को जनमानस से जोड़ने वाले पहले व्यक्ति थे। वे भारत और पाकिस्तान दोनों में लोकप्रिय थे, क्योंकि वे मानते थे कि संगीत कोई सीमा नहीं जानता।
बिस्मिल्लाह खाँ को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' (2001) सहित पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि यदि संगीत और नमाज़ में कोई तनाव आ जाए, तो वे संगीत को त्याग देंगे, क्योंकि संगीत नमाज़ से कम महत्वपूर्ण नहीं है। 21 अगस्त 2006 को इस महान शहनाई वादक का निधन हुआ।
| पात्र | परिचय | प्रमुख गुण |
|---|---|---|
| एवलिन ग्लेनी | स्कॉटलैंड की टक्कर-वादक, बधिर होने के बावजूद विश्व प्रसिद्ध | दृढ़ संकल्प, परिश्रम, संवेदनशीलता |
| रॉन फोर्ब्स | एवलिन की संगीत शिक्षिका | प्रेरणादायक, समर्पित, अनुभवी |
| एवलिन की माँ | एवलिन को स्कूल भेजने वाली सहायक माँ | प्रेमपूर्ण, प्रोत्साहक |
| उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ | प्रसिद्ध शहनाई वादक | देशभक्त, धार्मिक, समर्पित |
| अली बख्श | बिस्मिल्लाह के चाचा | मार्गदर्शक, संगीतज्ञ |
| रसूल बख्श | बिस्मिल्लाह के दादा | संगीत परंपरा के वाहक |
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1965 | एवलिन का स्कॉटलैंड में जन्म |
| आठ वर्ष | ऑर्केस्ट्रा में शामिल होना |
| ग्यारह वर्ष | श्रवण शक्ति घटने का पता चला |
| शेफ़ील्ड विश्वविद्यालय | संगीत में स्नातकोत्तर की उपाधि |
| रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूज़िक | विश्व सर्वश्रेष्ठ टक्कर-वादक बनीं |
| विशेषता | एवलिन ग्लेनी | बिस्मिल्लाह खाँ |
|---|---|---|
| वाद्य यंत्र | टक्कर वाद्य (percussion) | शहनाई |
| बाधा | बधिरता | कोई बाधा नहीं, परंपरा से विरोध |
| सम्मान | विश्व प्रसिद्धि | भारत रत्न, पद्मश्री आदि |
| गुरु | रॉन फोर्ब्स | अली बख्श (चाचा) |
| प्रेरणा | स्टीफन हॉकिंग | गंगा घाट की प्राकृतिक सुंदरता |
"द साउंड ऑफ़ म्यूज़िक" एक प्रेरणादायक पाठ है, जो दो असाधारण संगीतकारों के जीवन के माध्यम से हमें सिखाता है कि सच्ची कला मन से उपजती है, न कि केवल इंद्रियों से। एवलिन ग्लेनी ने बधिरता को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी विशिष्टता बनाया, और बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई को भारतीय संस्कृति का पर्याय बना दिया। यह पाठ हमें दृढ़ संकल्प, कड़ी मेहनत और अपने गुरु के प्रति सम्मान का पाठ पढ़ाता है। चाहे जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, जुनून और समर्पण से हर बाधा को पार किया जा सकता है।