"गिल्लू" हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कवयित्री और गद्य-लेखिका महादेवी वर्मा द्वारा रचित एक अत्यंत मार्मिक एवं संवेदनशील कहानी है। यह कहानी एक छोटी सी गिलहरी के जीवन से जुड़ी है, जिसे लेखिका ने "गिल्लू" नाम दिया। कहानी में महादेवी जी ने प्रकृति के प्रति प्रेम, जीवन के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता का सजीव चित्रण किया है। एक बार कौओं के आक्रमण से घायल हुई नन्ही गिलहरी को लेखिका ने अपने घर में आश्रय दिया और उसकी सेवा की। धीरे-धीरे वह गिलहरी घर का ही अंग बन गई।
कहानी में महादेवी जी ने गिल्लू के माध्यम से यह दर्शाने का प्रयास किया है कि प्राणीमात्र स्वतंत्रता चाहता है। गिल्लू ने अपने पिंजरे की जाली काटकर आज़ादी पाई, परंतु अपने रक्षकों की स्मृति को नहीं भूला। कहानी का अंत अत्यंत मार्मिक है - मृत्यु के समय गिल्लू ने सूर्य की ओर देखा और अपना जीवन संगीत में ही समाप्त किया। यह कहानी पाठकों को पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम तथा जीवन के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है।
महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद में हुआ था। वे हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कवयित्री, कहानीकार, निबंधकार तथा चित्रकार थीं। छायावादी युग की चार प्रमुख स्तंभों में वे एकमात्र कवयित्री थीं। उन्हें "आधुनिक मीरा" तथा "हिंदी का मौन-विराट साहित्यकार" कहा जाता है। उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं - "नीहार", "रश्मि", "नीरजा", "सांध्यगीत" आदि। उनकी प्रमुख गद्य-रचनाएँ हैं - "मेरा परिवार", "स्मृति की रेखाएँ", "अतीत के चलचित्र", "गिल्लू" आदि। महादेवी जी को "ज्ञानपीठ पुरस्कार" सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, प्रकृति-प्रेम और करुणा का गहरा समावेश मिलता है। उनका निधन 11 सितंबर 1987 को हुआ।
कहानी का आरंभ एक नन्हीं गिलहरी के बचाव से होता है। लेखिका के घर के आँगन में कौए नन्ही गिलहरी पर आक्रमण कर रहे थे। महादेवी जी ने उसे कौओं से बचाकर अपने कमरे में लाकर उसकी देखभाल की। पहले गिलहरी अत्यंत कमज़ोर थी, उसे दूध पिलाया गया। धीरे-धीरे वह स्वस्थ हो गई। लेखिका ने उसे "गिल्लू" नाम दिया। गिल्लू घर में स्वतंत्र रूप से घूमने लगी और घरवालों से परिचित हो गई।
एक बार एक पागल कुत्ते के काटने की सूचना पर गिल्लू को निर्जन स्थान पर छोड़ना पड़ा, परंतु वह किसी तरह वापस आ गई। गिल्लू को आज़ादी बहुत प्रिय थी। उसने अपनी खिड़की की जाली काट दी, परंतु बाहर जाने के बाद भी वह कुछ समय बाद लेखिका की अँगुली पकड़कर घर लौट आती थी। एक बार गिल्लू की सहेली (एक कबूतरी) की मृत्यु हो गई, जिससे गिल्लू अत्यंत दुखी हुई। वह कई दिनों तक उसके पास नहीं गई।
गिल्लू जीवन भर लेखिका की संगिनी बनी रही। वह लेखिका की दीवार पर चढ़कर बैठती, उनका स्नान देखती और उनके कार्यों में रुचि लेती। अंततः एक दिन गिल्लू की मृत्यु हो गई। मृत्यु से पहले उसने सूर्य की ओर देखा तथा अपनी प्यारी धुन गुनगुनाती रही। लेखिका ने उसे संगमरमर की शिला पर बैठाकर... उसे अपने घर के पास पेड़ के नीचे गाड़ दिया। कहानी का अंत करुणा से भरा हुआ है।
कहानी का मूलभाव प्रकृति-प्रेम, जीवन के प्रति सम्मान तथा स्वतंत्रता की महत्ता पर आधारित है। महादेवी जी दर्शाना चाहती हैं कि प्राणीमात्र के प्रति प्रेम और करुणा रखना मनुष्य का कर्तव्य है। नन्ही गिलहरी को आश्रय देना तथा उसकी सेवा करना जीवन के प्रति सम्मान का प्रतीक है। कहानी में स्वतंत्रता की चाह को भी चित्रित किया गया है - गिल्लू पिंजरे में बंद होने के बावजूद भी आज़ादी का प्रतीक थी, परंतु उसने अपने रक्षकों के प्रति कृतज्ञता भी बनाए रखी। संदेश यह है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए सभी प्राणियों के प्रति प्रेम, करुणा और कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए।
| पात्र | प्रमुख विशेषता | भूमिका |
|---|---|---|
| गिल्लू | स्वतंत्रता-प्रेमी, कृतज्ञ, संगीत-प्रेमी | कहानी का मुख्य पात्र |
| महादेवी वर्मा | करुणामयी, प्रकृति-प्रेमी | गिल्लू की रक्षक |
| माँ | स्नेहिल, सहायक | गिल्लू को अपनाने वाली |
| परिवार | प्रेमी, सहयोगी | गिल्लू का आश्रय |
| क्रम | घटना | परिणाम |
|---|---|---|
| 1 | कौओं के आक्रमण से बचाव | गिल्लू का घर में आश्रय |
| 2 | दूध से देखभाल | गिल्लू का स्वस्थ होना |
| 3 | जाली काटकर आज़ादी | स्वतंत्रता-प्रेम का परिचय |
| 4 | सहेली की मृत्यु | गिल्लू का दुख |
| 5 | गिल्लू की मृत्यु | करुणा का उद्रेक |
"गिल्लू" महादेवी वर्मा की वह संवेदनशील कहानी है जो पाठकों के हृदय को छू लेती है। नन्ही गिलहरी गिल्लू के माध्यम से लेखिका ने यह दर्शाया है कि प्रेम, करुणा और कृतज्ञता किसी भी जीवन - चाहे वह मनुष्य का हो या प्राणीमात्र का - की सबसे बड़ी पूँजी है। गिल्लू की स्वतंत्रता की चाह, उसकी बुद्धिमत्ता और मृत्यु के समय उसकी शांति कहानी के अमिट प्रसंग हैं। यह कहानी सिखाती है कि प्रकृति के प्रति प्रेम और जीवन के प्रति सम्मान मनुष्यता की असली पहचान है। इसकी सहज भाषा और मार्मिक अंत इसे हिंदी साहित्य की अमर कहानियों में स्थान दिलाता है।