"ग्राम श्री" के पूरक भाग में कवि सुमित्रानंदन पंत गाँव की उन प्राकृतिक छटाओं का विस्तृत वर्णन करते हैं, जो मुख्य भाग में संक्षेप में आई थीं। जहाँ मुख्य भाग में कवि ने गाँव को "धरती की लक्ष्मी" कहकर उसकी समग्र शोभा का चित्रण किया, वहीं पूरक भाग में गाँव के विभिन्न दृश्यों - फसलों, वनों, नदियों, पुष्पों और कृषक जीवन - का सूक्ष्म और विस्तृत चित्रण मिलता है। यह पूरक भाग गाँव की सुंदरता को और अधिक सजीव तथा गहराई से प्रस्तुत करता है।
पूरक भाग में कवि सुबह से सांझ तक गाँव की बदलती छटा का वर्णन करते हैं। वे सरसों के पीले-पीले फूलों, लहलहाती फसलों, बहती नदियों, छायादार वृक्षों और फलों से लदे बगीचों का ऐसा सुंदर चित्रण करते हैं कि पाठक गाँव के प्रति आकर्षित हो उठता है। कवि गाँव की इस प्राकृतिक संपदा को ही सच्ची श्री (समृद्धि) मानते हैं और शहरी ठाठ-बाट को उसके सामने तुच्छ दर्शाते हैं। यह भाग कवि के प्रकृति-प्रेम तथा गाँव के प्रति गहरे अनुराग को पूर्णता प्रदान करता है।
सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 को अल्मोड़ा (उत्तराखंड) के कौसानी गाँव में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्हें "प्रकृति का सुकुमार कवि" कहा जाता है। उनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं - "वीणा", "ग्रंथि", "पल्लव", "गुंजन", "युगांत", "स्वर्णकिरण", "कला और बूढ़ा चाँद" आदि। उनकी कविताओं में प्रकृति-चित्रण, मानवीय संवेदना, कृषक जीवन और दार्शनिक चिंतन का सुंदर समन्वय मिलता है। उन्हें "भारत भारती" के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण (1961) से सम्मानित किया गया। उनका निधन 28 दिसंबर 1977 को इलाहाबाद में हुआ।
ग्राम श्री कविता का पूरक भाग गाँव के सौंदर्य के विस्तृत चित्रण से आरंभ होता है। कवि गाँव की शोभा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि जब फसलें पककर सुनहरी हो जाती हैं, तब गाँव की छटा अद्भुत होती है। गेहूँ की बालें हवा के झोंके से झुकती हैं, मानो वे धरती को प्रणाम कर रही हों। सरसों के पीले फूलों से खेत हँसते प्रतीत होते हैं। धान की क्यारियाँ हरियाली से लहलहाती हैं। कवि इन फसलों को गाँव की संपदा अर्थात् श्री बताते हैं।
पूरक भाग में कवि गाँव के जल-स्रोतों और वन-संपदा का भी वर्णन करते हैं। नदियाँ कल-कल करके बहती हैं और खेतों को सींचकर जीवन प्रदान करती हैं। तालाब और कुएँ गाँव की प्यास बुझाते हैं। छायादार वृक्षों के नीचे चरवाहे और पशु आराम करते हैं। आम, अमरूद और अन्य फलों के वृक्षों से लदे बगीचे गाँव की शोभा बढ़ाते हैं। कवि इन सबको गाँव की प्राकृतिक दौलत मानते हैं।
कविता के पूरक भाग के अंत में कवि गाँव के कृषक की मेहनत की महिमा गाते हैं। किसान सुबह से शाम तक खेतों में परिश्रम करता है और अन्न उगाकर पूरे समाज का पेट भरता है। कवि कहते हैं कि गाँव की यह समृद्धि ही देश की असली संपत्ति है। जो लोग गाँव को तुच्छ समझते हैं, वे गलत हैं - क्योंकि अन्न, जल, हरियाली और शांति सभी गाँव में ही विद्यमान हैं। कविता का पूरक भाग गाँव की जय-जयकार के साथ समाप्त होता है।
ग्राम श्री के पूरक भाग का मूलभाव गाँव की प्राकृतिक समृद्धि और सौंदर्य का गुणगान है। कवि गाँव को सच्ची संपत्ति - श्री - मानते हैं, क्योंकि वहाँ अन्न, जल, वन, फसलें और शांति सब कुछ विद्यमान है। कवि शहरी आडंबर और प्रदूषण की तुलना में गाँव की स्वच्छ हवा, हरियाली और संतोष को श्रेष्ठ मानते हैं। संदेश यह है कि हमें गाँव तथा किसान का सम्मान करना चाहिए और प्रकृति से जुड़कर ही वास्तविक सुख प्राप्त किया जा सकता है। गाँव की धरती ही मनुष्य को अन्न, ज्ञान और समृद्धि का वरदान देती है।
| प्राकृतिक तत्व | वर्णन |
|---|---|
| फसलें | गेहूँ की सुनहरी बालें, सरसों के पीले फूल, धान की हरियाली |
| जल-स्रोत | नदियाँ, तालाब, कुएँ |
| वन-संपदा | छायादार वृक्ष, फलों के बगीचे |
| कृषक | सुबह से शाम तक परिश्रम करने वाला अन्नदाता |
| पहलू | मुख्य भाग | पूरक भाग |
|---|---|---|
| केंद्र | गाँव की समग्र शोभा | गाँव की विस्तृत प्राकृतिक छटा |
| वर्णन-स्तर | सामान्य चित्रण | सूक्ष्म और विस्तृत चित्रण |
| मुख्य तत्व | लक्ष्मी-सरस्वती प्रतीक | फसलें, नदियाँ, वन, कृषक |
| उद्देश्य | परिचय | गहन प्रकृति-चित्रण |
ग्राम श्री कविता का पूरक भाग सुमित्रानंदन पंत के प्रकृति-प्रेम और गाँव के प्रति गहरे अनुराग की सुंदर अभिव्यक्ति है। इस भाग में कवि ने गाँव की फसलों, जल-स्रोतों, वन-संपदा और कृषक के परिश्रम का विस्तृत चित्रण कर गाँव को सच्ची श्री (समृद्धि) सिद्ध किया है। कवि का मानना है कि शहरी ठाठ-बाट से बढ़कर गाँव की हरियाली, स्वच्छ हवा और संतोष ही वास्तविक धन है। यह भाग पाठकों को गाँव और किसान के प्रति सम्मान तथा प्रकृति के साथ सामंजस्य की प्रेरणा देता है और छायावादी प्रकृति-चित्रण की उत्कृष्ट मिसाल प्रस्तुत करता है।