"प्रेमचंद के फटे जूते" कृष्णा सोबती द्वारा रचित एक प्रसिद्ध संस्मरणात्मक निबंध है। इस पाठ में लेखिका ने प्रेमचंद की सादगी, उनके सरल जीवन और दार्शनिक दृष्टिकोण का चित्रण किया है। शीर्षक में ही 'फटे जूते' के माध्यम से प्रेमचंद की गरीबी, सादगी और उदारता का प्रतीक दिखाया गया है। लेखिका बताती हैं कि एक साहित्यकार के रूप में प्रेमचंद के पास पैसा नहीं था, परंतु उनके पास साहित्य और मानवता के प्रति अटूट समर्पण था। यह पाठ पाठकों को बताता है कि वास्तविक महानता धन में नहीं, बल्कि कर्म, सादगी और सिद्धांतों में होती है। प्रेमचंद अपने सिद्धांतों पर आजीवन अडिग रहे और इसीलिए उन्हें 'कथा सम्राट' कहा जाता है।
कृष्णा सोबती का जन्म 18 फरवरी 1925 को गुजरात में हुआ था। वे हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध कथाकार और निबंधकार हैं। उन्होंने अपनी विशिष्ट शैली और भाषा के कारण हिंदी कथा-साहित्य में एक नई धारा का सूत्रपात किया। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं - "मित्रो मरजानी", "डार से बिच्छड़ी", "ज़िन्दगीनामा", "सूरजमुखी अंधेरे के", "दिलोदानिश" आदि। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार (2017) जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए। उनकी रचनाएँ यथार्थवाद, नारी-चेतना और सामाजिक विसंगतियों से भरी हैं। उनका निधन 25 जनवरी 2019 को हुआ।
इस पाठ में कृष्णा सोबती ने प्रेमचंद के जीवन के एक विशेष संस्मरण का वर्णन किया है। लेखिका बताती हैं कि उन्होंने बनारस में प्रेमचंद से भेंट की थी। प्रेमचंद के पास तब फटे जूते थे, जिन्हें पहनकर वे टहल रहे थे। लेखिका को यह देखकर अचरज हुआ कि इतने महान साहित्यकार के जूते कैसे फटे हो सकते हैं। परंतु प्रेमचंद के व्यवहार में कोई शिकायत नहीं थी, वे सहज और प्रसन्न थे।
प्रेमचंद ने लेखिका से विनोदपूर्ण ढंग से बात की। उन्होंने बताया कि वे अपने जूतों से प्रेम करते हैं क्योंकि वे उनके जीवन के साथी रहे हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में बाहरी चीज़ों का महत्व कम और मनुष्य के आंतरिक गुणों का महत्व अधिक होता है। फटे जूते उनकी गरीबी नहीं, बल्कि उनकी सादगी और संतोष की निशानी थे।
लेखिका इस प्रसंग से प्रभावित होकर सोचने लगती हैं कि प्रेमचंद जैसे साहित्यकार, जिन्होंने सामाजिक अन्याय के खिलाफ अपनी लेखनी चलाई, वे स्वयं गरीबी में क्यों रहे? परंतु प्रेमचंद के लिए यह सब बाधा नहीं थी। वे सादगी में ही सुखी थे। यह पाठ प्रेमचंद के व्यक्तित्व के उस पक्ष को दिखाता है, जो धन से परे, मूल्यों और साहित्य के प्रति समर्पित है। फटे जूते प्रतीक बन जाते हैं कि सच्चा साहित्यकार अपने सिद्धांतों के लिए जीता है, न कि धन के लिए।
पाठ का मूलभाव सादगी, संतोष और मूल्यों पर आधारित है। लेखिका प्रेमचंद के माध्यम से दिखाती हैं कि बाहरी दिखावा और भौतिक संपन्नता मनुष्य की महानता का मापदंड नहीं है। सच्ची महानता उसके कर्म, सिद्धांत और संतोष में होती है। फटे जूते प्रतीक हैं कि प्रेमचंद ने सादगी में रहकर भी साहित्य की अमूल्य सेवा की। संदेश यह है कि जीवन में आंतरिक गुणों को महत्व देना चाहिए, भौतिक सुखों को नहीं। संतोष और आत्मसम्मान ही वास्तविक धन हैं।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| लेखिका | कृष्णा सोबती |
| केंद्रीय पात्र | प्रेमचंद |
| मुख्य घटना | बनारस में प्रेमचंद से भेंट |
| प्रतीक | फटे जूते |
| गुण | पाठ में उदाहरण |
|---|---|
| सादगी | फटे जूते पहनकर प्रसन्न रहना |
| संतोष | किसी बात की शिकायत न करना |
| विनोद | जूतों के बारे में हास्यपूर्ण बात |
| मूल्य-प्रेम | सिद्धांतों पर अडिग रहना |
"प्रेमचंद के फटे जूते" केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि सादगी और मूल्यों का आदर्श चित्र है। कृष्णा सोबती ने इस पाठ के माध्यम से सिद्ध किया है कि प्रेमचंद जैसा महान साहित्यकार बाहरी संपन्नता के बिना भी आंतरिक रूप से कितना समृद्ध था। फटे जूते उनकी गरीबी का नहीं, बल्कि उनकी सादगी, संतोष और साहित्य के प्रति समर्पण का प्रतीक हैं। यह पाठ पाठकों को यह सिखाता है कि सच्ची महानता धन-वैभव में नहीं, बल्कि कर्म, सिद्धांत और मानवीय मूल्यों में होती है। यह संदेश आज के भौतिकवादी युग में अत्यंत प्रासंगिक है।