"रीढ़ की हड्डी" हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख कवि और नाटककार जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक कहानी है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने आधुनिक जीवन की उस क्षुद्रता पर तीखा व्यंग्य किया है, जिसमें मनुष्य अपने आत्म-सम्मान और स्वाभिमान को त्यागकर धन और सुख के पीछे भागता है। कहानी का शीर्षक "रीढ़ की हड्डी" प्रतीकात्मक है - यहाँ रीढ़ की हड्डी व्यक्ति के स्वाभिमान, आत्म-गरिमा और मानसिक दृढ़ता का प्रतीक है। कहानी में दिखाया गया है कि जब मनुष्य स्वार्थवश अपना स्वाभिमान खो देता है, तो उसकी रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो जाती है, अर्थात् उसका व्यक्तित्व झुक जाता है।
कहानी का प्रमुख पात्र बादल काका है, जो अपनी बेटी के विवाह के लिए धन जुटाने के लिए अपने स्वाभिमान का बलिदान कर देता है। जयशंकर प्रसाद ने इस कहानी में व्यंग्य के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि स्वतंत्रता और स्वाभिमान ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी है। कहानी पाठकों को आत्म-सम्मान की रक्षा करने तथा दूसरों के आगे घुटने टेकने से बचने की प्रेरणा देती है।
जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1890 को काशी (वाराणसी) में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों - जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा - में सबसे वरिष्ठ थे। उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं - "कामायनी", "आँसू", "लहर", "झरना" आदि। उनकी प्रमुख कहानियाँ हैं - "रीढ़ की हड्डी", "आकाशदीप", "मधुआ", "पाप की परास्त", "छोटा जादूगर" आदि। उन्होंने "चंद्रगुप्त", "ध्रुवस्वामिनी", "स्कंदगुप्त" जैसे प्रसिद्ध नाटक भी लिखे। प्रसाद जी के साहित्य में राष्ट्रीय चेतना, आध्यात्मिकता, इतिहास-चेतना तथा देशभक्ति का गहरा समावेश मिलता है। उनकी भाषा परिष्कृत, भावपूर्ण तथा प्रतीकात्मक है। उनका निधन 15 जनवरी 1937 को हुआ।
कहानी का आरंभ बादल काका के सेठ जी के पास पहुँचने से होता है। बादल काका कभी धनी जमींदार थे, परंतु विलासिता और आलस्य के कारण उनकी दशा बदल गई। उनकी बेटी विवाह योग्य हो गई थी, परंतु विवाह के लिए धन नहीं था। इसी चिंता में वे अपने पुराने परिचित सेठ जी के पास सहायता माँगने जाते हैं। सेठ जी पहले उन्हें टालते हैं, परंतु बाद में कहते हैं कि यदि तुम मेरे यहाँ काम करना स्वीकार कर लो तो मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ। बादल काका विवश होकर अपनी सहमति दे देते हैं।
बादल काका सेठ जी के यहाँ काम करने लगते हैं। धीरे-धीरे उनकी दशा बदल जाती है। वे सेठ जी के समक्ष अपना सिर झुकाते हैं, उनकी इच्छा के अनुसार व्यवहार करते हैं। कहानी में व्यंग्य के रूप में कहा गया है कि बादल काका की रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो गई - अर्थात् उन्होंने अपना स्वाभिमान और आत्म-गरिमा खो दी। वे पहले स्वतंत्र और गौरवपूर्ण जीवन जीते थे, परंतु अब उन्हें दूसरों के सामने झुकना पड़ रहा है। लेखक दिखाता है कि आर्थिक विवशता मनुष्य के चरित्र को किस प्रकार कुचल देती है।
कहानी के अंत में व्यंग्य की तीव्रता और बढ़ जाती है। बादल काका पूर्ण रूप से सेठ जी के आश्रित हो जाते हैं और उनका व्यक्तित्व बिल्कुल झुक जाता है। कहानी का केंद्रीय प्रतीक "रीढ़ की हड्डी" इसी आत्म-सम्मान की हानि को दर्शाता है। लेखक यह सिद्ध करना चाहते हैं कि जो मनुष्य अपनी आज़ादी और स्वाभिमान खो देता है, वह जीवित रहते हुए भी मरा हुआ है। कहानी में बेरोज़गारी, आर्थिक विषमता और मजदूरी के शोषण पर भी गहरा व्यंग्य किया गया है।
कहानी का मूलभाव आत्म-सम्मान, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के महत्व पर आधारित है। लेखक दिखाना चाहते हैं कि मनुष्य के जीवन में धन से बढ़कर आत्म-गरिमा और स्वाभिमान कीमती है। "रीढ़ की हड्डी" प्रतीक के माध्यम से यह बताया गया है कि जिस प्रकार मनुष्य का शरीर रीढ़ की हड्डी के बल पर सीधा खड़ा रहता है, उसी प्रकार व्यक्तित्व भी स्वाभिमान के बल पर गौरवपूर्ण बना रहता है। स्वाभिमान खोने पर व्यक्ति का व्यक्तित्व झुक जाता है। संदेश यह है कि आर्थिक विषमता और विवशता के बावजूद मनुष्य को अपने स्वाभिमान की रक्षा करनी चाहिए। कहानी समाज में मजदूरों और श्रमिकों के शोषण पर भी प्रहार करती है तथा स्वार्थी, शोषक पूँजीपति वर्ग पर व्यंग्य करती है।
| पात्र | प्रमुख विशेषता | भूमिका |
|---|---|---|
| बादल काका | स्वाभिमान खोने वाला विवश व्यक्ति | कहानी का प्रमुख पात्र |
| सेठ जी | चतुर, स्वार्थी, शोषक | धनी व्यापारी, बादल काका का आश्रयदाता |
| बेटी | विवाह योग्य कन्या | संकट का कारण |
| पत्नी | चिंतित गृहिणी | सहायक पात्र |
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| मुख्य संकट | बेटी के विवाह के लिए धन का अभाव |
| समाधान | सेठ जी के यहाँ काम करना |
| प्रतीक | रीढ़ की हड्डी = स्वाभिमान |
| व्यंग्य का लक्ष्य | पूँजीपति वर्ग और आर्थिक शोषण |
| मूलभाव | स्वाभिमान ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी |
"रीढ़ की हड्डी" जयशंकर प्रसाद की वह व्यंग्यात्मक कहानी है जो आधुनिक सभ्यता की क्षुद्रता और आर्थिक विषमता पर गहरा प्रहार करती है। बादल काका की कथा के माध्यम से लेखक यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी उसका स्वाभिमान है। धन और सुख के लिए यदि व्यक्ति अपनी आत्म-गरिमा त्याग देता है, तो उसका जीवन निरर्थक हो जाता है। कहानी का शीर्षक ही इस गहरे सत्य का प्रतीक है। यह कहानी पाठकों को सिखाती है कि विषम परिस्थितियों में भी आत्म-सम्मान की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि स्वाभिमान खोने के बाद मनुष्य जीवित रहते हुए भी मृत होता है।