"तुम कब जाओगे, अतिथि" प्रसिद्ध व्यंग्य-लेखक शरद जोशी द्वारा रचित एक अत्यंत रोचक और व्यंग्यात्मक कहानी है। इस कहानी में लेखक ने एक अतिथि के लंबे समय तक मेज़बान के घर टिके रहने की समस्या को हास्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है। कहानी का नायक एक ऐसा अतिथि है जो मेज़बान के घर कुछ दिनों के लिए आता है, परंतु वह महीनों तक वहाँ रुका रहता है। मेज़बान उसे जाने के लिए कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। कहानी में "अतिथि देवो भव" की परंपरा का विरोधाभास दिखाया गया है - एक ओर भारतीय परंपरा अतिथि को देवता मानती है, तो दूसरी ओर लंबे समय तक रुका अतिथि मेज़बान के लिए बोझ बन जाता है। यह कहानी सामाजिक व्यवहार, आतिथ्य और मानवीय स्वार्थ पर गहरा व्यंग्य करती है।
शरद जोशी का जन्म 17 मई 1931 को मध्य प्रदेश के उज्जैन में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध व्यंग्य-लेखक, संपादक और पटकथा-लेखक थे। उन्हें हिंदी व्यंग्य-साहित्य का शिखर माना जाता है। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं - "मोहन कि बच्ची मोटी है", "मेरी श्रेष्ठ रचनाएँ", "जरा मानिए तो", "बिस्तर का महत्व", "तुम कब जाओगे, अतिथि" आदि। उन्होंने "सारिका" पत्रिका के संपादक के रूप में भी कार्य किया। उनके व्यंग्य में समाज की बुराइयों का सूक्ष्म और हास्यपूर्ण चित्रण होता है। उनकी भाषा सहज, रोचक और संवादात्मक है। उनका निधन 5 सितंबर 1991 को मुंबई में हुआ।
कहानी का आरंभ मेज़बान (लेखक) के घर एक अतिथि के आगमन से होता है। अतिथि कुछ दिनों के लिए आया था, परंतु उसकी अवधि बढ़ती चली गई। दिन बीतते गए, हफ्ते बीत गए, महीने बीत गए, परंतु अतिथि जाने का नाम नहीं ले रहा था। मेज़बान और उसका परिवार परेशान हो गया, परंतु किसी को भी "आप कब जाओगे" पूछने की हिम्मत नहीं हुई।
अतिथि धीरे-धीरे घर में घुल-मिल गया। वह घर की चीज़ों का उपयोग करने लगा, बच्चों के साथ खेलने लगा, यहाँ तक कि घर के मामलों में भी दिलचस्पी लेने लगा। मेज़बान की पत्नी ने कई बार संकेत दिए, परंतु अतिथि समझने का नाटक करता रहा। घर की सामान्य दिनचर्या में अतिथि का हस्तक्षेप बढ़ता गया।
अंततः मेज़बान एक योजना बनाता है। वह अतिथि को एक-एक करके ऐसी बातें बताता है जो उसे रास नहीं आतीं, या फिर उसे किसी कार्य में व्यस्त करता है। परंतु अतिथि सारी योजनाओं को नाकाम कर देता है। मेज़बान और अतिथि के बीच यह मौन संघर्ष हास्य का केंद्र बनता है। कहानी का अंत खुला है - अतिथि अंततः चला जाता है, परंतु इस दौरान मेज़बान को "अतिथि देवो भव" की परंपरा और उसकी जटिलताओं का गहरा अनुभव होता है। यह कहानी भारतीय समाज में अतिथि-सत्कार की परंपरा और लंबे समय तक रुकने वाले अतिथियों की समस्या का सूक्ष्म व्यंग्य-चित्रण है।
कहानी का मूलभाव भारतीय अतिथि-परंपरा की जटिलता पर आधारित है। एक ओर भारतीय संस्कृति अतिथि को देवता मानती है ("अतिथि देवो भव"), तो दूसरी ओर लंबे समय तक रुका अतिथि मेज़बान के जीवन को कठिन बना देता है। लेखक इस विरोधाभास पर सूक्ष्म व्यंग्य करते हैं। संदेश यह है कि अतिथि-सत्कार अच्छी बात है, परंतु उचित समय पर विदा होना भी आवश्यक है। जो मनुष्य दूसरों का अधिकार समझकर लंबे समय तक रुक जाता है, वह बोझ बन जाता है। मेहमाननवाजी और आत्म-सम्मान के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
| पात्र | भूमिका | विशेषता |
|---|---|---|
| मेज़बान | कहानी का वक्ता | झिझकता हुआ, परेशान |
| अतिथि | आगंतुक | लंबे समय तक रुकने वाला |
| पत्नी | मेज़बान की सहायक | संकेत देने वाली |
| परिवार | प्रभावित | अतिथि से घिरा हुआ |
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| अतिथि-परंपरा | अतिथि देवो भव |
| समस्या | अतिथि का लंबा प्रवास |
| संघर्ष | मेज़बान की छुटकारे की कोशिश |
| संदेश | समय पर विदा लेना आवश्यक |
"तुम कब जाओगे, अतिथि" शरद जोशी की अमर व्यंग्य-कहानी है, जो भारतीय समाज की अतिथि-परंपरा की जटिलताओं पर सूक्ष्म व्यंग्य करती है। यह कहानी दिखाती है कि "अतिथि देवो भव" की सुंदर परंपरा तब जटिल हो जाती है जब अतिथि उचित समय से अधिक टिक जाता है। लेखक ने हास्य के माध्यम से मानवीय स्वभाव, झिझक और आत्म-सम्मान के प्रश्नों को उठाया है। कहानी का संदेश स्पष्ट है - आतिथ्य सत्कार करना सद्गुण है, परंतु मेहमाननवाजी और आत्म-सम्मान के बीच संतुलन आवश्यक है। यह कहानी पाठकों को हँसाते-हँसाते सामाजिक सत्य का बोध कराती है।